Saturday, August 20, 2011

इस आंदोलनकारी लोकपाल में क्यों हैं कुछ खास तंत्रों को छूट?


अन्ना हजारे अपने लोकपाल को देश में उसी रूप से लागू करवाने के लिए अनशन कर रहें हैं जिस रूप या मसौदे के साथ उनके साथियों की टीम ने इसे बनाया है. इस लोकपाल बिल में जहां पटवारी से लेकर प्रधानमंत्री तक और दफ्तरों से लेकर न्यायपालिका तक सबको इस दायरे में लाने की बात कहकर इसका प्रचार किया जा रहा है. वहीं इस पर एक प्रश्न उठता है कि इन सबके बीच अन्ना के लोकपाल में एनजीओ, कारपोरेट निजी क्षेत्र और मीडिया को क्यों बाहर रखा गया है? लोकतंत्र में सबसे बड़ी अवधारणा विधाईका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की होती है. यानी जब लोकतंत्र के यह सारे तंत्र अन्ना के जनलोकपाल के सामने हाथ बांधे खड़े होंगे, उस समय यह तीन यानी एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया ही किस हैसियत से हाथ खोलकर अछूती रहेगी?

अन्ना हजारे के पहले अनशन के बाद जब सिविल सोसाइटी यानी जनसाधारण के प्रतिनिधि चुनने की बात आई तो अन्ना के पांच साथियों ने स्वयं को ही चुना. यानी एक तरह से लोग जबरदस्ती भारत की जनता के मनमाने प्रतिनिधि हो गए. इन लोगो ने सरकार के साथ बैठके की और लोकपाल को अंतिम रूप देने की तैयारी की खबरे आम हो गई. जब सब कुछ चल रहा था, तभी अचानक प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाये जाने के लिए सरकार और तथाकथित सिविल सोसाइटी के सदस्यों के बीच खींच तान शुरू हो गई. बहस तो न्यायपालिका के लोकपाल के दायरे में लाए जाने की बात को भी लेकर उठी थी लेकिन फिर सारा मामला प्रधानमंत्री को लोकपाल यानी टीम अन्ना वाले जनलोकपाल के दायरे में लाये जाने पर आकर रुक गई. टीम अन्ना के लोग इस बात पर हल्ला मचाने लगे की हम प्रधानमन्त्री को लोकपाल के दायरे में जरूर लायेंगे. वह लोग बताने लगे की अगर प्रधानमन्त्री इस दायरे में नहीं आये तो भ्रष्टाचार को नहीं रोका जा सकता. यानी सारा बवाल पूरे लोकतंत्र के हर हिस्से को लोकपाल के सामने झुकाने के मुद्दे पर फ़ैल गया.

अब सवाल यह उठता है कि जब जनतंत्र में विधाईका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी मूल व्यवस्था टीम अन्ना के लोकपाल के सामने झुक सकती है. तब इस लोकपाल के दायरे से इन तीन तत्वों एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया को दूर क्यों रखा गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि जब देश के सारे न्यूज़ चैनल इस टीम अन्ना के आंदोलन के भोंपू बनकर हर बात की कवरेज कर रहें हैं. तब उन लोगो ने इस प्रश्न को क्यों नहीं चर्चा या परिचर्चा में उठाया है. या इस बात को जानबूझ बाहर नहीं आने देने के पीछे क्या कुछ निहित स्वार्थ हो सकते हैं?

अगर अन्ना के इस अनशन को शुरू से देखा जाए तो यह पूरा आंदोलन ही अपनी-अपनी एनजीओ चलाने वाले लोगों ने प्रस्तावित किया है. साथ ही इसके जो भी मुख्य चेहरे हैं वह एनजीओ के ही कर्ता-धर्ता हैं. यानी इस सारे हल्ले के जन्म दाता. इस अनशन या आंदोलन जो भी कहा जाए उसको जितने भव्य और आधुनिक रूप से चलाया जा रहा है उसके लिए पैसे दान के रूप में विभिन्न कंपनियों के द्वारा मिल रहें हैं. जिंदल और जे.के. जैसे बड़े व्यापारिक घराने और सीआईआई तथा फिक्की जैसे बड़े व्यापारिक संगठन खुले हाथ से पैसे दान के रूप में इस पूरे कार्यक्रम को दे रहे हैं. इन पैसों से अन्ना के कार्यक्रम स्थल पर पंडाल, डीजे म्यूजिक और साथं ही अन्ना और उनके साथियों के पीने के लिए हाई क्लास ग्लूकोज और सेलाइन वाटर का इंतज़ाम हो रहा है. कारपोरेट सेक्टर जो अधिकतर स्वयं भ्रष्टाचार का पोषक है और पुराने मामलों को छोडकर केवल अभी हाल में ही हुए टू जी घोटाले को देखें तो पता चलेगा इसमें फंसने वाले अधिकतर लोग और कंपनियां कारपोरेट सेक्टर के ही थे. यानी भ्रष्ट तंत्र के लोग भ्रष्टाचार मिटाने के अभियान को चलाने के लिए पैसे दे रहे हैं, बात कुछ समझ में नहीं बैठती है कि ऐसा वह क्यों करेंगे. अब अगर मीडिया को देखा जाए तो वह भी आर्थिक भ्रष्टाचार की तरह समाचार भ्रष्टाचार से पीड़ित दिखती है. किसी भी दर्शक को अन्ना-अन्ना के जाप के अलावा मीडिया ना तो कुछ भी दिखाना चाहती है और ना ही मनवाना. मीडिया के हर रिपोर्टर और प्रस्तुतिकर्ता की कोशिश यही है की हर दर्शक के मन में केवल अन्ना भर दिया जाए. आज हर चैनल और रिपोर्टर खबर की जगह अन्ना के कार्यकर्ता बनकर प्रचार प्रसार कर रहा है. इस तरह मीडिया केवल इस टीम अन्ना के आंदोलन के प्रचार प्रसार में जी जान से जुटी है.

इस प्रकार अगर देखा जाए तो टीम अन्ना के आंदोलन को इतना बड़ा करने में एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया का ही सबसे अहम रोल है. सिविल सोसाइटी के सदस्य और अन्ना के अन्य साथी एनजीओ के कर्ता धर्ता हैं और अब कारपोरेट और मीडिया के सहारे यह लोग देश में इतने बड़े कद के हो गए हैं की यह लोग प्रधानमंत्री और देश की चुनी सरकार के साथ संसद को भी किनारा करते हुए गैर संवैधानिक तरीके अपने कानून को लादना चाहते हैं. तो ऐसे में यह सवाल उठाना आवश्यक है कि क्या अन्ना के इस लोकपाल अनशन में एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया के योगदान के मुआवजे में उन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया है?

भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में कानून बनाने की संसदीय और संवैधनिक प्रक्रिया को एक तथाकथित जन उन्माद के सामने ध्वस्त कर देना क्या उचित होगा. वह भी तब जब इन लोगो की मंशा केवल लोकतंत्र को बंधक बनाने की हो. अगर इन लोगो की मंशा साफ़ होती तो इन लोगो ने केवल अपने समर्थन के नाते एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया जैसे तत्वों को बाहर नहीं किया होता.

आज यह अनशन वाले लोग अपने को इतना बड़ा मान चुके हैं की चुनी हुई सरकारों के औचित्य पर ही प्रश्न उठा देते हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के भाषण के मंच से एक एनजीओ वाले आंदोलन के कार्यकर्ता कहते हैं पटना के गलियों से आवाज़ आती है भैंस, बकरी चराने वाले सरकार चला रहे हैं, और इसी तरह अन्य लोग जगह-जगह कहते हैं की यहाँ तो चुनाव पैसे से जीते जाते हैं. इस तरह के शब्द क्या लोकतंत्र के लिए घातक नहीं है? क्या आज कमजोर वर्ग के लोगों को सरकार में बैठने का हक नहीं है? क्या इनकी नज़र में हर आम भारतीय वोटर घूसखोर है?

अन्ना के इस आंदोलन में मिल रहे जनतंत्र को पंगु बनाने के समर्थन पर सिर्फ एक सवाल उठता है. जब लोकतंत्र के सारे अंग लोकपाल के सामने झुक सकते हैं, तो क्यों केवल एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया को ही इन आदोलन वालों ने दूर रखा है? क्या कुछ छुपा हुआ मुद्दा भी है क्या इसके पीछे?

अन्ना के समर्थक या अन्नाई वैचारिक आतंकवादी.


अन्ना हजारे के आंदोलन के कई समर्थक हैं. यह समर्थक अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने के साथ-साथ अन्ना के आंदोलन के सम्बन्ध में किया जा रहे किसी भी सवाल या विचारक वाद-विवाद को रोकने के लिए भी तत्पर हो गए हैं. कहीं किसी भी मंच पर अगर चाहें वह फेसबुक, ब्लॉग या किसी भी वेबसाईट जैसे वर्चुअल मंच हो या ग़ली कूचे पर अन्ना के आंदोलन के विरुद्ध कोई भी लोकतांत्रिक टिपण्णी होते ही अन्नावादियों का पूरा हुजूम व्यक्तिगत गाली गलौज पर उतर आता है. अन्ना के आंदोलन जिसके उद्देश्य क्या हैं इसी पर संशय बरकरार है. पहला सवाल ही यही उठता है कि अन्ना अपने एनजीओ वाले मित्रों के लोकपाल को असंसदीय और अलोकतान्त्रिक तरीके से देश पर थोपना चाहते हैं. क्योंकि कानून बनाने का अधिकार सिर्फ संवैधानिक व्यवस्था में संसद के पास होता है. तो यह आंदोलन देश विरोधी है या देश हित में यह एक सवाल उठता है. जब इस आंदोलन पर इतना बड़ा सवाल खड़ा है. तब कैसे कोई कह सकता है कि अन्ना का आन्दोलन लोकतान्त्रिक है.

अन्ना हजारे लोकतांत्रिक भारत देश में अनशन कर रहें हैं. इस अनशन के लिए जगह और अनुमति ना देने को लेकर सरकार पर छींटाकशी हो रही है. कोई इसे लोकतंत्र के विरोधी बता रहा है, तो कोई कुछ और कह रहा है. हर और लोकतंत्र की दुहाई अन्ना के समर्थक दे रहे हैं. लोकतंत्र का सबसे बुनियादी हक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या अपनी बात कहने का हक होता है. इसी हक के तहत आंदोलन वगैरह भी किये जाते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जरिये ही हम किसी भी ऐसे मुद्दे या आंदोलन पर भी सवाल कर सकते हैं जो जन आंदोलन की शक्ल में किया जा रहा हो. इस प्रकार के सवालों को लोकतंत्र में आवश्यक माना जाता है. परन्तु तानाशाही में इस प्रकार के प्रश्नोत्तर अवैध या अराजक होते हैं. इसी प्रकार तानाशाही अराजकता की तरह अन्नावादियों जो आतंकवादियों की तरह ही वैचारिक आतंक फैलाने में जुटे गए, अन्ना के आंदोलन पर सवाल करने वालों को यह लोग हर तरीके से समूह में डराने में जुटे हैं.

अन्ना के आंदोलन के निहितार्थ जानने की चेष्टा या कोई वैचारिक बात रखने पर सबसे पहले सवाल करने वाले को भ्रष्ट और कांग्रेस का चमचा घोषित कर दिया जाता है. कुछ लोग तो और बढ़कर कहते हैं की जो अन्ना के साथ नहीं हैं वह भाड़ में जाएँ. इस तरह कि स्वम्भू आताताई टिपण्णी करके यह अन्नावादी क्या साबित करना चाहते हैं कि हर कोई उनके साथ है, और जो नहीं है उसे हम कुचल देंगे. गांधी और गांधीवाद से तुलना करके खुश होने वाले अन्नाई, अपने द्वारा लोगो पर लगाये जा रहे वैचारिक प्रतिबंधो को किस श्रेणी में रखेंगे. क्या यह हिंसा नहीं है? कोई व्यक्ति आवाज़ ना उठा सके क्या यह तानाशाह प्रकार का तांडव नहीं है.

पिछले दो दिन से देश के हर न्यूज़ चैनल पर अन्ना और उनके आंदोलन को लेकर कवरेज की ऐसी होड मची है कि अब टीवी देखने का मन ही नहीं कर रहा है. न्यूज़ चैनलों के लिए क्या देश में बलात्कार बंद हो गए जिसको लेकर कुछ दिन पहले तक वह होड मचाये हुए थे.देश में किसी जगह कोई हत्या नहीं हो रही है. हर चैनल के अन्ना-अन्ना ऐसा परोस रहा है जैसे पत्रकार ना होकर अन्ना के पीआर एजेंट हो गए हैं. अगर अन्ना के द्वारा देश में अपना कानून लाये जाने पर न्यूज़ चैनल इतना सपोर्ट कर रहें हैं तो क्यों नहीं मणिपुर की इरोम शर्मीला चानू के आंदोलन को सपोर्ट करते हैं. समाचार दिखाने का दावा करने वाले चैनल अब समर्थक की भूमिका में आ चुके हैं. वह देश में अन्नाई को इतना भड़का रहें हैं कि वह लोग अपने आप को हर तंत्र और हर प्रश्न से ऊपर मानने लगे हैं. हर बात का जवाब अन्ना अन्ना करके देते हैं. सरकार को भ्रष्ट कहते हैं परन्तु जब इन चैनलों से पूछा जाए की किस आधार यह अपने स्ट्रिंगरो की नियुक्ति करते हैं. स्ट्रिंगरो को सैलरी नहीं मिलती कैमरा नहीं दिया जाता है. यह सब कुछ स्ट्रिंगर खुद इक्कट्ठा करता है और बाद में इसी के सहारे वसूली करता है और चैनल के बड़े पदों की मस्का पालिश करता है. जब चैनल खुद ही वसूली और भ्रष्टाचार को पैदा कर रहें है तो किस मुहँ से लोगो को राय दे रहे हैं कि सरकार भ्रष्ट है और अन्ना सही.

इलेक्ट्रोनिक मीडिया को अब संदेहास्पद नज़र से देखता हूँ और इस अन्नावाद के बाद तो न्यूज़ चैनल शायद ही देखने की हिम्मत हो. हाँ प्रिंट मीडिया जिसे नवदलाल पुराना माध्यम कहते हैं उसने ही पत्रकारिता की साख बरक़रार रही है. अखबार में ही दोनों पक्षों की जानकारी मिल जाती है. अखबार ही हैं जहां पत्रकार और विचारक अन्ना के पक्ष में और विपक्ष में दोनों तरफ के विचार रखते हैं. फिर यह दारोमदार पाठकों पर होता है कि वह किस ओर जाना चाहते हैं. पत्रकारिता अगर जीवित है तो प्रिंट में ही जीवित है और इस बात के लिए प्रिंट मीडिया बधाई की पात्र है.

अन्नावादियों ने इस तरह से विचारों का कर्फ्यू लगाना शुरू कर दिया है कि जैसे अब इस लोकतंत्र पर अन्ना ही हावी होने जा रहें हैं. मौलिक अधिकारों का हनन यह अन्नावादी बहुत खूब कर रहे हैं. इन अन्न्वादियों के भींड में वही तत्व नज़र आ रहें हैं जो भ्रष्टाचार का खुद ही पोषण करते हैं. जिलों में जहां कमीशन देकर ठेका लेने वाले ठेकेदार अन्ना का झंडा थामे हैं. वहीं व्यापार कर से लेकर आयकर तक की चोरी करने करने वाले बड़े सेठ और अधिकारी राजधानियों में अन्ना का झंडा उठाये हैं. अन्नावाद के इस जुलुस में समाज का वही तत्व दिख रहा है, जो राजनीति और पत्रकारिता में सिर्फ अधिकारियों पर दबाव बनाकर अपना काम कराने की जुगत में होता है. जिस तरह के अन्ना वाले तत्व है वह उसी तरह का काम भी कर रहें हैं हर विचार और हर तर्क को यह लोग अन्ना की महानता बखानते हुए रोकना चाहते हैं.

अन्नाई या वैचारिक आतंक का पर्याय बन चुके अन्नावादियों ने एक डर का माहौल पैदा कर दिया है. अन्ना के आंदोलन जिसमे संसद को धता बता हुए अपना क़ानून मनवाना मुख्य उद्देश्य है उसके प्रति किसी भी देशवासी की टिप्पणी इन्हें बर्दाश्त नहीं. अन्ना के अन्नाई देश में एक ऐसा आतंकी माहौल बनाना चाहते हैं जैसे तानाशाहों ने अपने ज़माने में किया. अन्ना का आंदोलन अगर सफल हो गया तब के दौर में अन्नाई के वैचारिक दंगों की कल्पना से ही मन काँप जाता है. अन्ना के समर्थकों आपके अन्नाई वैचारिक आतंकवाद से डर लगता है. अन्ना कृपया इन्हें समझाएं की हम भी देशवासी हैं हमें ना डराएं. समझ नहीं आता यह कौन हैं अन्ना के समर्थक या अन्नाई वैचारिक आतंकवादी.