भारत के पडोसी और सबसे करीबी मित्र देश नेपाल में रविवार 28 अगस्त को डॉ० बाबुराम भट्टराई ने प्रधान मंत्री पद की शपथ ली. डॉ० भट्टराई के प्रधान मंत्री बनने के साथ ही नेपाल के राजनैतिक इतिहास में दूसरी बार किसी माओवादी नेता की ताजपोशी हुई है। डॉ भट्टराई भारत के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रह चुके हैं. जिससे भारत-नेपाल के लगातार तल्ख हो रहे रिश्ते और इसके पीछे मौजूद चीन की साये के मद्देनजर उनका प्रधान मंत्री बनना बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. डॉ० बाबुराम भट्टराई एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए थे. जिन्हें नेपाल की अधिकतर पार्टियों और यहाँ तक मधेशी दलों का भी पूरा समर्थन मिला. उन्हें मिले समर्थन के आधार पर उन्होंने नेपाल संसद में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी नेपाली कांग्रेस के नेता रामचन्द्र पौड्याल को 105 वोटों से हरा दिया. डॉ० बाबुराम भट्टराई को 594 सदस्य वाली नेपाली संसद में 340 सांसदों का समर्थन प्राप्त हुआ.
25 अप्रैल 2005 के बाद जब माओवादियों ने नेपाल में 200 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही की समाप्ति के बाद अपने हथियार रखकर चुनाव प्रक्रिया को अपनाया था, तब से यह दूसरा मौका है जब किसी पूर्व माओवादी सैन्य कमांडर ने प्रधानमंत्री का पद प्राप्त किया है. डॉ० बाबुराम भट्टराई से पूर्व नेपाली माओवादी के सुप्रीम कमांडर पुष्प कमल दहल प्रचंड भी नेपाल के प्रधानमंत्री बन चुके हैं. प्रचंड के कार्यकाल से ही माओवादियों और नेपाल के अन्य राजनैतिक दलों में सत्ता को लेकर खींचतान जारी थी. नेपाल में राजशाही के समाप्ति होने के बाद से ही नए गणतांत्रिक संविधान और स्थायी सरकार के निर्माण को लेकर अन्तर्विरोध जारी रहे हैं. जून में हुई संविधान सभा की बैठक के बाद 3 महीने का समय निर्धारित किया गया था जिसमे सरकार की स्थापना और संविधान के पहले मसौदे को पेश करने की सहमति बनी थी. अब आम सहमति से सरकार के गठन हो जाने के कारण नेपाल की नई सरकार और प्रधानमंत्री की पहली परीक्षा अब संविधान के निर्माण को लेकर ही होगी.
नेपाल के सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस बार वहां हुए चुनावों में भारत की भूमिका बिलकुल शून्य ही रही. जिसका कारण भारत में अन्ना हजारे के अनशन को माना जा रहा है. देश में मचे हल्ले के कारण भारत का नेपाल में प्रधानमंत्री चुनाव में कोई खास ध्यान नहीं रह पाया. नेपाल में नवनियुक्त भारत के राजदूत जयंत प्रसाद प्रधानमंत्री चुनाव से मात्र 4 दिन पूर्व ही नेपाल पहुंचे थे. जिससे कारण वह कुछ खास करने में असफल रहे. नेपाल के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार भारत की और से पहली पसंद नेपाली कांग्रेस के नेता और प्रधानमंत्री पद के दावेदार रामचन्द्र पौड्याल थे. जयंत प्रसाद इस बार भारत की और से खास माने जाने वाले मधेशी दलों को भी ठीक से नियंत्रित कर पाए और मधेशी दलों ने इस बार एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) का साथ दिया जिससे डॉ० बाबुराम भट्टराई का प्रधान मंत्री बनना तय हुआ. नेपाल के चुनावों में मिली जीत के साथ ही इस माओवादी अग्रणी सरकार में मधेशी दलों को पूरा साथ लिया गया है. मधेशी लोकतांत्रिक फोरम जो तराई के मधेशी दलों का एक प्रमुख संगठन हैं. उसके नेता विजय कुमार गच्छदर को प्रधानमंत्री के साथ ही उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री की शपथ दिलाकर माओवादियों ने भारत के राजनैतिक रसूख को एक बड़ा झटका दिया है.
गौरतलब है विजय कुमार गच्छदर ने पिछली बार प्रधानमंत्री पद की दावेदारी भी पेश कर दी थी. जिसके पीछे नेपाल में यह चर्चा जोर पकड़ रही थी कि यह सब भारत के इशारे पर हुआ था. परन्तु इस बार सारी उम्मीदों को किनारे करते हुए माओवादियों से हमेशा विरोध की राजनीति करने वाले लोकतांत्रिक मधेशी फोरम के नेताओं ने इस चुनाव में एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) का साथ दिया. मधेशी दलों के इस रूख ने नेपाल में सकारात्मक इशारा किया है. मधेशी दलों के इस प्रकार साथ आने को लेकर नेपाल के धडों में यह माना जा रहा हैं कि भारत का नेपाल पर प्रभाव कम हुआ है.
नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद भी डॉ० भट्टराई अपनी गाडी स्वयं ही चलाकर ले गए जिससे नेपाल के हलकों में उनकी साम्यवादी सोच के स्पष्ट झलक मिल गई. डॉ० भट्टराई और माओवादी सुप्रीम कमांडर प्रचंड के बीच पिछले कुछ दिनों में एक शीत युद्ध जारी था. जिसका असर एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के द्वारा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार चुने जाने पर भी दिखा. परन्तु एन मौके पर पार्टी के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों ने डॉ० भट्टराई का समर्थन कर उनकी राह आसान कर दी. पार्टी के अंदरूनी हल्कों में और डॉ० भट्टराई के बीच का विवाद समर्थकों और जनता के बीच भी आ चुका है. डॉ० भट्टराई नेपाल में एक निष्पक्ष राष्ट्रवादी के तौर पर देखे जाते हैं. जिनका मुख्य ध्येय नेपाल का विकास और संरक्षण करना माना जा रहा है. नेपाल में प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी डॉ० भट्टराई के लिए आसान नहीं होगी. खास तौर पर तब जब एशिया की दो बड़ी महाशक्तियां भारत और चीन नेपाल में अपने प्रभावों के संवर्धन में लगी हैं. वहीं एशिया में अपने शक्तिसंतुलन के लिए छटपटा रहे अमेरिका का भी नेपाल में बढ़ता रुझान भी कुछ और परिस्थितियां खड़ी कर सकती है. अब नेपाल के नए भविष्य के लिए प्रतीक्षा करने होगी.
यह न्यूज़ श्री प्रभात रंजन दीन के निर्देशन में साप्ताहिक अखबार "कैनविज़ टाइम्स" में छप चुकी है.
good analysis
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