Sunday, October 21, 2012

शौचालय निर्माण के जरिये अपहरण, बलात्कार और छेड़-छाड़ से मुक्ति के स्वप्न दिखाती नौकरशाही।


महिलाओं के साथ छेडछाड, बलात्कार और अपहरण जैसे हो रहे जघन्य अपराधों की रोकथाम बताने वाले उल जलूल बयान व फरमान अक्सर सुनाई देते रहते है। जिनमें परोक्ष रूप से महिलाओं को ही निशाना बनाकर इन अपराधों को रोकने के फरमान दिए जाते हैं। इसी कड़ी में इन अपराधों को नियंत्रित करने की नई और अजीब व्याख्या अब उत्तर प्रदेश की नौकरशाही से सुनने को मिल रही है। केन्द्र सरकार की निर्मल भारत योजना जिसके तहत गांवों में शौचालयों का निर्माण कराया जाना है। इसको लेकर अधिकारी कितने उत्साहित है उसका अंदाजा बहराइच की जिलाधिकारी की बातों से लगाया जा सकता है। जिलाधिकारी किंजल सिंह जो स्वयं एक महिला हैं वह इन महिला अपराधों को शौचालयों के निर्माण द्वारा रोके जाने की बात कहती है। बहराइच जनपद में शुक्रवार 12 अक्टूबर को निर्मल भारत योजना पर आयोजित अपनी एक प्रेस वार्ता में उन्होंने पत्रकारों को बताया कि गांवों में शौचालय के बन जाने के बाद से क़ानून व्यवस्था की स्थिति सुधरेगी और छेडछाड, बलात्कार, अपहरण जैसी घटनाए नियंत्रित हो जायेंगी। जिलाधिकारी किंजल सिंह शौचालयों की आवश्यकता को बताते हुए यह समझाना भूल गई कि अगर इन अपराधों को रोकने की दवा शौचालय बन जाना भर हैं तो यह अपराध उन इलाकों में क्यों होते हैं जहाँ शौचालय पहले से मौजूद हैं। शहरी इलाकों में तो महिलाओं को सबसे अधिक सुरक्षित होना चाहिए जहाँ घर में कम से एक नहीं तो अधिक भी शौचालय मौजूद रहते हैं।
केन्द्र सरकार की निर्मल भारत योजना के तहत गाँव गाँव में शौचालय निर्माण के लिए व्यवस्था दी गई है। जिसमें सरकार से निर्माण हेतु प्रोत्साहन राशि दस हज़ार रूपये है और इसके साथ ही ग्राम, ब्लाक और जिला स्तरीय अधिकारियों द्वारा इस पूरे कार्यक्रम को सफल बनाने की योजना बनाई जा रही है। इसमें ध्यान देने की बात यह है कि जिस योजना के तहत शौचालय बनाकर स्वच्छता से लेकर क़ानून व्यवस्था तक सुधारने के दावे हो रहे हैं। उस योजना को संचालित करने वाली वही नौकरशाही है जिसकी मनरेगा और तमाम ग्रामीण योजनाओं में भ्रष्टाचार की शिकायतों से जिले और राज्य स्तर में फाइलें भरी पड़ी हैं। ऐसे में क़ानून व्यवस्था और उसमें भी खास तौर पर महिला अपराधों को रोकने के सपने इन योजनाओं के जरिये कैसे देखे जा सकते हैं।
यही नहीं जिलाधिकारी द्वारा ग्रामीणों के बौद्धिक स्तर के विकास के लिए शौचालय को जरूरी बताया गया। इस सिद्धांत के अनुसार जिस भी घर में शौचालय हों वहां बौद्धिकता का प्रवाह होना चाहिए। इस थ्योरी के अनुसार शहरी इलाके और कस्बे बौद्धिकता के शिखर और ग्रामीण इलाके कूप मंडूक होने चाहिए। 15 अक्टूबर से जिले में हैंडवाश डे या जिला प्रशासन द्वारा अनुवादित हाथ धुलाई दिवस से चल रहे निर्मल भारत अभियान के तहत अधिकारी शहर के नजदीकी गाँव में एक खास ब्रांड के साबुन से हाथ धोने का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो स्वच्छता से ज्यादा ब्रांडिंग का मामला लग रहा है। जिलाधिकारी के द्वारा निर्मल भारत अभियान को लेकर जो खास उत्साह दिख रहा है। वह एक एलिट नौकरशाही का सन्देश आम जन में पहुंचा रहा है। जहाँ दिल्ली केंद्रित सोच पिछड़े जिले में एकदम से लागू करने की बात बन रही है।
अखिलेश सरकार द्वारा प्रदेश में अनुभवहीन नए अधिकारियों की तेज़ी से उच्च पदों पर नियुक्ति की गई है। इन अधिकारियों का अभी जमीनी हकीकत से बहुत दूर होना ही ऐसे बयानों को जन्म देता है। यह नई नौकरशाही ग्रामीण जनता को सिर्फ इतना ही जानती है जितना उसने हिंदी अखबारों में पढ़ रखा है। जहाँ शौच के लिए गई युवती या महिला के साथ अपहरण और बलात्कार व छेड़छाड़ की खबरें मिल जाती हैं। इस प्रकार के अपराधों में पूरी ग्रामीण व्यवस्था की दबंगई और क्यों सिर्फ महिलाओं के ही साथ ही यह घटनाएं होती हैं। उसे समझने के स्थान पर शौचालय के ना होने को ही इन अपराधों का उत्तरदाई मानकर इसके निर्माण से ही इन अपराधों को रोकने की बात करना नौकरशाही की हवाई सोच दिखाती है। पर यह लोग इस पर सोचना भूल जाते हैं कि खुले में शौच तो पुरुष भी जाते हैं। लेकिन उस समय वहाँ हत्या और मार पिटाई जैसे अपराध क्या उनके साथ नहीं होते हैं। महिला अपराधों को रोकने की सोच से पहले इन अधिकारियों को अपराध के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है।
शौचालय निर्माण करके महिला अपराधों को नियंत्रित करने जैसे दिवास्वप्न देखने वाली नौकरशाही जिसका मात्र एक उदाहरण बहराइच की जिलाधिकारी का बयान है। जबकि ऐसे जमीन से दूर की सोच के अधिकारियों की संख्या प्रदेश में अधिक है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तैनात की गई यह नई उच्च वर्गीय नौकरशाही जमीनी स्तर पर कितनी दूर है। इसका अंदाजा सरकार को लगाना पड़ेगा अन्यथा पिछली बसपा सरकार की तरह नौकरशाही के हवा हवाई कारनामों की तरह इस सरकार को फजीहत उठानी पड़ सकती है।

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