Thursday, December 6, 2012

जय एफडीआई "वाद"।

चलिए अच्छा हुआ नेताजी की पार्टी ने बता दिया कि वह साम्प्रदायिक ताकतों के साथ वोट नहीं देंगे. अब कुछ नासमझ लोग पूछने लगे कि देश में रोज़ी रोटी का सवाल और पूरी व्यवस्था में मिल रहा रोज़गार कैसे "साम्प्रदायिक" हो गया. खैर नेताजी के पास अपने चश्मे हैं. अचानक टाइम मशीन में जाने का मौका मिला तो दिखा कि 2003 में उत्तर प्रदेश की उस समय विधानसभा में वोटिंग किसी साम्प्रदायिक पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधि और अध्यक्ष करा रहे हैं. और उसमें सरकार गलत वोटिंग के बड़े आरोपों के बीच समाजवादी (शब्द के लिए माफ़ी) चोला ओढकर नेता जी का नेतृत्व हासिल कर रहे हैं. साथ ही गठन के बाद भी वही साम्प्रदायिक तरफ वाले स्पीकर महोदय काफी समय तक दायित्व निर्वाह करते रहे. मजा देखिये कि उस दौर में एक बार भी सरकार छोड़ने का विचार या विधानसभा भंग कराने का भी कोई ख्याल तक नहीं आया कि इसका गठन और संचालन साम्प्रदायिक पार्टी के सदस्य की अध्यक्षता में हुआ. चलिए छोडिये इस बात को और बात करते हैं कि कैसे बाबरी मस्जिद के लिए जी जान लगाने वाले नेताजी ने एक झटके में इसके "दोषी" "गुनाहगार" को एक झटके में "शुद्ध" करके अपने में विलय कर लिए (बाद में सियासी अपच के कारण उगलना पड़ा वह अलग बात है). अब इतनी शुद्ध सेक्युलर राजनीति करने वाले कैसे साम्प्रदायिक ताकतों के साथ वोटिंग करते यह तो समस्या थी ही. अरे लेकिन किसी को याद हो तो बता दूँ कि वाम पार्टियां भी इसी तरफ खड़ी थी शायद नेताजी ने उन्हें भी साम्प्रदायिक करार दे दिया हो (उनके एक सांसद कह भी रहे थे कि वाम के राज्य में मुसलमान नीचे गया है, यह अलग बात हैं कि उनके राज्य में 9 दंगे हो चुके हैं). अब एक बात तो पक्का हो गया की झकाझक शुद्ध वाला सेक्युलरवाद केवल नेताजी के ही पास है बाकी सब नक्काल. वैसे अमेरिकी न्युकिलियर डील के समय और अब एफडीआई के तरफ जिस तरह अमेरिका की तरफदारी की गई है उससे सेक्युलरिज्म को नए आयाम मिले हैं. अब कुछ लोग अमेरिका पर कई देशों में विवाद करवाने का दोषी मानते हों तो माने. कुछ भी हो नाक भी रहे और हजामत हो जाये ऐसी खूबसूरत राजनीति केवल "वादी" दाँव से ही आती है. ना यकीन हो तो न्युकिलियर डील, बाहर से समर्थन के बाद तत्काल बढ़ा पेट्रोल और गैस की राशनिग या अब एफडीआई की मंजूरी से लगा सकते हैं....शेष विशेष

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