कुछ कहने सुनने से पूर्व एक बिन मांगी सलाह उन सबको देना चाहूँगा जो “पत्रकारिता” करने के लिए पत्रकारिता में उतरना चाहते हैं. जो नहीं करना चाहते हैं वह केवल अपनी नौकरी या जो कुछ भी सोच समझकर पत्रकार बनने का शौक पाले हैं, वहीँ करें क्योंकि उनका ही बहुमत हो चुका है और रहने वाला भी है. खैर जो बात कहनी थी वह यह है कि दिल्ली नॉएडा जैसे देश के किसी भी जगह में अखबारों व चैनलों के न्यूज़ रूम में बैठकर ज्ञान झाड़ने से पहले एक बार अपने यानी इस देश में चल रहे मीडिया कारखाने का पूरा चक्कर जरूर लगाना चाहिए. मतलब यह है गाँव, क़स्बा और जिला स्तरीय पत्रकारिता के साथ रहकर और उसे कायदे एक बार समझने के बाद ही किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर बात करना ज्यादा अच्छा रहेगा. इससे सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अपनी असलियत और प्रभाव का अंदाजा लगता रहेगा.
खैर इन्ही सबके बीच एक पारिवारिक पडोसी के विवाह समारोह में अपने पत्रकारिता के जलवे के कारण बुलाये गये “शब्द शब्द संघर्ष” टैग लाइन के जिला संवाददाता अपने गुरु के साथ मिल जाते हैं. और वहां उनसे बात शुरू होती है. शब्द संघर्ष वाले जिला संवादाता महोदय ऐसी बातें करने लगते हैं जिससे उनके पत्रकारिता तो छोडिये सामान्य ज्ञान पर भी संदेह होने लगता है. जिला स्तर की पत्रकारिता को केवल अपने धंधों से सींचने वाले लोग पूरी मीडिया के पेशेवर व्यवहार के बारे में उल जलूल तर्क देने लगते है, जिस बारे में उन गुरु चेले को शायद ताउम्र ना पता चले. लेखनी में भी पैसा है और पैसा कैसे हैं कैसे किस जगह क्या लिखा जाना चाहिए यह सब बातें उन्हें जिले स्तर से आगे पता ही नहीं है. उन्हें केवल इतना पता है कि जो लखनऊ या दिल्ली में है वह तनख्वाह पाता है बाकी पत्रकार केवल “धंधो” में जुटा है. रिटेनरशिप और कांट्रेक्ट पर काम करने के बारे में इनके ख्याल पूछने पर इन्हें समझ ही नहीं आता है कि यह होता क्या है, यह अलग बात है कि वह जिले के “जिला संवाददाता” है और खुद लकदक सुविधासंपन्न स्टाफ से भरा पूरा दफ्तर चलाते हैं.
और समझ के इतने कमजोर कि उन्हें यह भी नहीं पता कि दिल्ली और लखनऊ में भी स्ट्रिंगर और उनके जैसे ऐसे वैसे एवइं टाइप लोग भी होते है. पत्रकारिता में चंद नाम उछालकर अपने को महान सिद्ध या यूँ कहने थोपने वाले इन लोगों को देख सुनकर कोफ़्त होती है लेकिन साथ ही तरस भी आता है कि क्या यही पत्रकारिता है जिसका आज समझ के साथ कोई रिश्ता नहीं रह गया है. गुरु चेले की इस जोड़ी जैसे स्थानीय पत्रकारिता के सैम्पल तहलका और इंडिया टुडे जैसी नामवर मैगजीनों के नाम ऐसे लेकर सामने वाले को सुनाते हैं कि गोया यह सब कोई अजूबा हैं. जिनमें कोई इनके पूछे बिना किसी की भर्ती नहीं हो सकती या इनके अलावा कोई लिख नहीं सकता. हाँ यह भी एक अलग बात है कि इन्ही लोगों ने शायद ऐसे जगहों के सिर्फ नाम भुनाए हो तो यह उनके लिए पूज्य होंगे ही.
स्थानीय पत्रकारिता की समझ में स्थानीय पत्थर इतने ज्यादा भरे पड़े हैं जिससे इन्हें केवल यही समझ आता है कि दुनिया बस मेरे इस जिले में है जो मैं कर रहा हूँ वही है अन्यथा सब बेकार. इन लोगों को देखकर सुनकर कुएं के मेढक की कहानी की सत्यता आसानी से पता चल जाती है.
आज के दौर में जब पत्रकारिता और पत्रकार खास तौर पर पहली कड़ी वाले पूरी तरह से संदिग्ध होने के कगार पर खड़ी हैं. वहां “शब्द शब्द संघर्ष” को इस तरह बेमानी करने वाले लोगों और उनकी समझ को क्या कहा जायेगा. मजे की बात यह है कि यह लोग कहते हैं कि अब हम कितना पढ़ें यानी पत्रकार हैं और अखबार मैगज़ीन पढ़ना नहीं चाहते हैं. इस तरह आँख बंद करके अपनी ध्वस्त सोच अगर यह पत्रकारिता करते होंगे तो क्या लिखते होंगे यह सोचकर ही मन डरने लगता है. इसी तरह के कम्पायमान हो चुकी साख को इस तरह के शाब्दिक महारथी कितना धोते होंगे इसका अंदाजा मुश्किल नहीं है.
कुल मिलाकर आज पत्रकारिता का वह दौर है खास तौर पर हिंदी पट्टी में जहाँ संदिग्धता ही हावी है. इसीलिए चाहे न चाहे यह कहना और मानना पड़ता है कि अंग्रेजी पत्रकारिता अपने क्षेत्र और दायरे में काफी बेहतर है. संयोग से मिले इस जोड़ी इस चर्चा को याद करके मन यही कहता है कि यह पत्रकारिता विहीन पत्रकार बनाने की परंपरा हमें कहाँ ले जायेगी.
यह वह स्वर हैं जिनको बोलने की छूट हर जगह नहीं होती. यह स्वर अक्सर या तो सुने ही नहीं जाते या कोई सुनने ही नहीं देता है. हमसे यहाँ इस मेल पर संपर्क किया जा सकता है. harishankar.shahi@gmail.com
Wednesday, December 12, 2012
पत्रकारिता विहीन पत्रकार बनाने की परंपरा हमें कहाँ ले जायेगी.
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Thursday, December 6, 2012
जय एफडीआई "वाद"।
चलिए अच्छा हुआ नेताजी की पार्टी ने बता दिया कि वह साम्प्रदायिक ताकतों के साथ वोट नहीं देंगे. अब कुछ नासमझ लोग पूछने लगे कि देश में रोज़ी रोटी का सवाल और पूरी व्यवस्था में मिल रहा रोज़गार कैसे "साम्प्रदायिक" हो गया. खैर नेताजी के पास अपने चश्मे हैं. अचानक टाइम मशीन में जाने का मौका मिला तो दिखा कि 2003 में उत्तर प्रदेश की उस समय विधानसभा में वोटिंग किसी साम्प्रदायिक पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधि और अध्यक्ष करा रहे हैं. और उसमें सरकार गलत वोटिंग के बड़े आरोपों के बीच समाजवादी (शब्द के लिए माफ़ी) चोला ओढकर नेता जी का नेतृत्व हासिल कर रहे हैं. साथ ही गठन के बाद भी वही साम्प्रदायिक तरफ वाले स्पीकर महोदय काफी समय तक दायित्व निर्वाह करते रहे. मजा देखिये कि उस दौर में एक बार भी सरकार छोड़ने का विचार या विधानसभा भंग कराने का भी कोई ख्याल तक नहीं आया कि इसका गठन और संचालन साम्प्रदायिक पार्टी के सदस्य की अध्यक्षता में हुआ. चलिए छोडिये इस बात को और बात करते हैं कि कैसे बाबरी मस्जिद के लिए जी जान लगाने वाले नेताजी ने एक झटके में इसके "दोषी" "गुनाहगार" को एक झटके में "शुद्ध" करके अपने में विलय कर लिए (बाद में सियासी अपच के कारण उगलना पड़ा वह अलग बात है). अब इतनी शुद्ध सेक्युलर राजनीति करने वाले कैसे साम्प्रदायिक ताकतों के साथ वोटिंग करते यह तो समस्या थी ही. अरे लेकिन किसी को याद हो तो बता दूँ कि वाम पार्टियां भी इसी तरफ खड़ी थी शायद नेताजी ने उन्हें भी साम्प्रदायिक करार दे दिया हो (उनके एक सांसद कह भी रहे थे कि वाम के राज्य में मुसलमान नीचे गया है, यह अलग बात हैं कि उनके राज्य में 9 दंगे हो चुके हैं). अब एक बात तो पक्का हो गया की झकाझक शुद्ध वाला सेक्युलरवाद केवल नेताजी के ही पास है बाकी सब नक्काल. वैसे अमेरिकी न्युकिलियर डील के समय और अब एफडीआई के तरफ जिस तरह अमेरिका की तरफदारी की गई है उससे सेक्युलरिज्म को नए आयाम मिले हैं. अब कुछ लोग अमेरिका पर कई देशों में विवाद करवाने का दोषी मानते हों तो माने. कुछ भी हो नाक भी रहे और हजामत हो जाये ऐसी खूबसूरत राजनीति केवल "वादी" दाँव से ही आती है. ना यकीन हो तो न्युकिलियर डील, बाहर से समर्थन के बाद तत्काल बढ़ा पेट्रोल और गैस की राशनिग या अब एफडीआई की मंजूरी से लगा सकते हैं....शेष विशेष
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