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Wednesday, January 2, 2013

अब जिलों में मर गई है या रोज़ मारी जा रही है स्थानीय पत्रकारिता.



जिलों के स्तर पर होने वाली स्थानीय पत्रकारिता से सोच समझ और किसी भी विजन की उम्मीद तो कभी मिली ही नहीं. लेकिन पत्रकारिता के नाम पर जो तमाशे अक्सर देखने को मिलते हैं वह उसके बारे में मौजूद हर किताबी या पढ़ी लिखी बातों को झुठलाते नज़र आ रहे हैं. वायस आफ वायसलेस यानी जिनकी आवाज़ सत्ता प्रतिष्ठानों तक ना पहुँच रही हो उनकी आवाज़ बनना पत्रकारिता का मूल सिद्धांत माना जाता है. इसी सिद्धांत के बदौलत पत्रकारिता को वह मुकाम हासिल हुआ कि उसे लोकतंत्र के चौथे खम्भे के रूप में गिना या माना जाता है.

इसी लोकतंत्र की सबसे प्रथम इकाई के रूप में गाँव, क़स्बा और जिला आता है. जहाँ की आवाजें अक्सर अनसुनी रह जाती है जिनको मुकाम या जगह दिलवाना पत्रकारिता का कर्म होना चाहिए. लेकिन आज जिन हालातों में जिला पत्रकारिता कम से कम हिंदी पट्टी में चल रही उससे घिन के अलावा और कुछ कहा सोचा व समझा नहीं जा सकता. किसी धरने प्रदर्शन में या किसी भी पीड़ित की आवाज़ को सुनने के बजाय पत्रकारिता के नाम पर नाम भुनाने वाले वहां मौजूद पुलिस या प्रशासन के अधिकारियों से हाथ मिलाते या फिर उनके साथ चिपकते नज़र आते हैं. जिसे वह अपनी शान मानते हैं जो कुछ भी हो लेकिन पर पत्रकारिता तो नहीं ही कही जानी चाहिए.
31 दिसंबर की शाम को बहराइच जनपद के पानी टंकी चौराहे पर अचानक पुलिस की भींड पहुँच जाती है. जिसमें सीओ स्तर के अधिकारी भी मौजूद रहते हैं. और उसके बाद वहां उस चौराहे पर मौजूद ठेले वालों या वहां कुछ समान खरीद आम से दिखने वाले या सीधे शब्दों में कहूँ तो कमजोर दिखने वालों को पुलिस चेकिंग के नाम परेशान किया जाना शुरू होता है. इस प्रकार के अचानक हुए कार्यवाही के तमाशे को भोगकर आस पास और रोज उसी इलाके में खरीदारी करने वाले लोग या दुकानदार थोडा डर और आश्चर्य से चौंक पड़ते हैं. पुलिस की यह सारी कवायद 31 दिसंबर के नाम पर होने वाले शोर शाराबे और उद्दंडता को रोकने की ओर उठाया गया कदम बताया जाता है. लेकिन इस उद्दंडता को रोकने के नाम पर हुई कार्यवाही काफी समय तक लोगों को एक अजीब से आतंक में डालता दिखी.

खैर इसी बीच लगातार कैमरे के फ्लैश चमकते हुए जाने कहाँ कहाँ से तरह तरह के कैमरों के साथ कुछ लड़के पहुचंते हैं. और इस पुलिसिया कार्यवाही की फोटो लेने लगते हैं. पता चलता है कि यह पत्रकार हैं और पुलिस के इस घटनाक्रम को कवर करने आयें हैं. इससे फिलहाल तो एक संतोष जन्म लेता है कि चलिए यह पत्रकार आ पहुंचे है तो कम से कम पुलिस आम जनता को अपनी चेकिंग से परेशान नहीं करेगी. लेकिन परिस्थितियां एकदम अंदाज़े से उलट नज़र आती है. जब यह तथाकथित पत्रकार लोग सिपाही, दरोगा, कोतवाल व सीओ तक मौजूद हर अधिकारी से अपने अपने अखबार और संपर्क के नाम पर हाथ मिलाने में जुट जाते हैं. और बिना किसी पूर्व सूचना के ठेले या होटल मौजूद व्यक्तियों के जेबों में हाथ डालकर चेक कर रही पुलिस के इस कारनामे को उनकी सक्रियता के नाम पर महिमा मंडित करते हुए फोटो खींचकर अपनी पत्रकारिता पूरी करते रहे. इस तथाकथित पत्रकारिता झुण्ड में देश में नामचीन बताने वाले अखबारों से लेकर कल परसों तक बने अखबारों के प्रतिनिधि मौजूद होते है. जिनका मुख्य उद्देश्य केवल पुलिस की झुण्ड में अपनी पहचान बताना ही नज़र आता है.


इस तरह की पत्रकारिता देखकर मन यह कोफ़्त जरूर उठता है कि क्या ऐसे लोगों को पत्रकार माना जाए. और अगर माना न जाए तो आप कर क्या लेंगे, कुछ ऐसी ही स्थिति इस समय जिला स्तरीय स्थानीय पत्रकारिता की हो रही है. जिलों में काम करने के नाम पर जितने कम पैसे और संसाधन दिए जाते हैं और उसके बावजूद बढ़ रही असंख्य संख्या कम से शुचिता वाली पत्रकारिता की ओर तो नहीं ही ले जा सकती है. लेकिन यह जो कुछ भी पत्रकारिता के नाम पर हो रहा है उसे क्या कहा जाए. लोगों की आवाज़ बनने वाली पत्रकारिता उसी आवाज़ को दबाने वाले अधिकारी वर्ग की चापलूसी में जुटी हुई है.

अखबार लेखनी क्षमता नहीं एजेंसी विज्ञापन देखने लगे हैं. न्यूज़ चैनल कैमरा और मुफ्त में जितना ज्यादा मिल सके उतनी फुटेज को खोज रहे हैं. ऐसे में पत्रकारिता में समझ रखने वाले का स्थान कम से कम जिला स्तरीय पत्रकारिता में नहीं है. अपनी लगभग 2 साल और 15 जिलों की स्थानीय पत्रकारिता को समझकर और कहीं कहीं तो उनके बीच घुसकर रिसर्च करने के दौर में पाया कि अधिकाँश जगह तो अब पत्रकारिता साफ हो चुकी है. इक्का दुक्का जो लोग वाकई पत्रकारिता को मानते हैं उन्हें स्थानीय पत्रकारिता की यह बाढ़ एक बेकार की वस्तु से ज्यादा नहीं मानती है. और उनका मुकाम हाशिया पर बना दिया गया है. अब तो जिला स्तरीय पत्रकारिता में अखबार या चैनल की लग्गीयाँ एक औज़ार है जिनसे अधिकारियों और नेताओं में पकड़ बनाई जाए. मजे की बात तो यह देखने को मिलती है कि जिन जिला स्तरीय पत्रकारों के पास खुद लिखने पढ़ने की समझ नहीं है और जो इसका प्रयोग केवल हित साधने के लिए करते हैं. उनके पास लडको की कमी नहीं है जो पत्रकार बनने या यूँ कहिएं कि इसी हाथ मिलाने वाली पत्रकारिता के एक अंग बनने को व्याकुल हैं.

 
सरकारी अधिकारियों में अब वही पत्रकार है जो रोज सुबह शाम उनके यहाँ दरबार लगाता है, और जैसे पुराने जमाने में दरबारी फायदा उठाते वैसे ही फायदा उठाने और कानाफूसी करने का काम स्थानीय पत्रकारिता की आत्मा बन चुका है. इस तरह की स्थितियां दुःख तो देती है, लेकिन सच्चाई भी यही है. बहरहाल बहराइच के एक चौराहे पर लगे पत्रकारिता के मजमे को देखकर समझ नहीं आता है कि क्या कहा जाए. अब जिलों में मर गई है या रोज़ मारी जा रही है पत्रकारिता.

Wednesday, December 12, 2012

पत्रकारिता विहीन पत्रकार बनाने की परंपरा हमें कहाँ ले जायेगी.

कुछ कहने सुनने से पूर्व एक बिन मांगी सलाह उन सबको देना चाहूँगा जो “पत्रकारिता” करने के लिए पत्रकारिता में उतरना चाहते हैं. जो नहीं करना चाहते हैं वह केवल अपनी नौकरी या जो कुछ भी सोच समझकर पत्रकार बनने का शौक पाले हैं, वहीँ करें क्योंकि उनका ही बहुमत हो चुका है और रहने वाला भी है. खैर जो बात कहनी थी वह यह है कि दिल्ली नॉएडा जैसे देश के किसी भी जगह में अखबारों व चैनलों के न्यूज़ रूम में बैठकर ज्ञान झाड़ने से पहले एक बार अपने यानी इस देश में चल रहे मीडिया कारखाने का पूरा चक्कर जरूर लगाना चाहिए. मतलब यह है गाँव, क़स्बा और जिला स्तरीय पत्रकारिता के साथ रहकर और उसे कायदे एक बार समझने के बाद ही किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर बात करना ज्यादा अच्छा रहेगा. इससे सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अपनी असलियत और प्रभाव का अंदाजा लगता रहेगा.

खैर इन्ही सबके बीच एक पारिवारिक पडोसी के विवाह समारोह में अपने पत्रकारिता के जलवे के कारण बुलाये गये “शब्द शब्द संघर्ष” टैग लाइन के जिला संवाददाता अपने गुरु के साथ मिल जाते हैं. और वहां उनसे बात शुरू होती है. शब्द संघर्ष वाले जिला संवादाता महोदय ऐसी बातें करने लगते हैं जिससे उनके पत्रकारिता तो छोडिये सामान्य ज्ञान पर भी संदेह होने लगता है. जिला स्तर की पत्रकारिता को केवल अपने धंधों से सींचने वाले लोग पूरी मीडिया के पेशेवर व्यवहार के बारे में उल जलूल तर्क देने लगते है, जिस बारे में उन गुरु चेले को शायद ताउम्र ना पता चले. लेखनी में भी पैसा है और पैसा कैसे हैं कैसे किस जगह क्या लिखा जाना चाहिए यह सब बातें उन्हें जिले स्तर से आगे पता ही नहीं है. उन्हें केवल इतना पता है कि जो लखनऊ या दिल्ली में है वह तनख्वाह पाता है बाकी पत्रकार केवल “धंधो” में जुटा है. रिटेनरशिप और कांट्रेक्ट पर काम करने के बारे में इनके ख्याल पूछने पर इन्हें समझ ही नहीं आता है कि यह होता क्या है, यह अलग बात है कि वह जिले के “जिला संवाददाता” है और खुद लकदक सुविधासंपन्न स्टाफ से भरा पूरा दफ्तर चलाते हैं.

और समझ के इतने कमजोर कि उन्हें यह भी नहीं पता कि दिल्ली और लखनऊ में भी स्ट्रिंगर और उनके जैसे ऐसे वैसे एवइं टाइप लोग भी होते है. पत्रकारिता में चंद नाम उछालकर अपने को महान सिद्ध या यूँ कहने थोपने वाले इन लोगों को देख सुनकर कोफ़्त होती है लेकिन साथ ही तरस भी आता है कि क्या यही पत्रकारिता है जिसका आज समझ के साथ कोई रिश्ता नहीं रह गया है. गुरु चेले की इस जोड़ी जैसे स्थानीय पत्रकारिता के सैम्पल तहलका और इंडिया टुडे जैसी नामवर मैगजीनों के नाम ऐसे लेकर सामने वाले को सुनाते हैं कि गोया यह सब कोई अजूबा हैं. जिनमें कोई इनके पूछे बिना किसी की भर्ती नहीं हो सकती या इनके अलावा कोई लिख नहीं सकता. हाँ यह भी एक अलग बात है कि इन्ही लोगों ने शायद ऐसे जगहों के सिर्फ नाम भुनाए हो तो यह उनके लिए पूज्य होंगे  ही.

स्थानीय पत्रकारिता की समझ में स्थानीय पत्थर इतने ज्यादा भरे पड़े हैं जिससे इन्हें केवल यही समझ आता है कि दुनिया बस मेरे इस जिले में है जो मैं कर रहा हूँ वही है अन्यथा सब बेकार. इन लोगों को देखकर सुनकर कुएं के मेढक की कहानी की सत्यता आसानी से पता चल जाती है.

आज के दौर में जब पत्रकारिता और पत्रकार खास तौर पर पहली कड़ी वाले पूरी तरह से संदिग्ध होने के कगार पर खड़ी हैं. वहां “शब्द शब्द संघर्ष” को इस तरह बेमानी करने वाले लोगों और उनकी समझ को क्या कहा जायेगा. मजे की बात यह है कि यह लोग कहते हैं कि अब हम कितना पढ़ें यानी पत्रकार हैं और अखबार मैगज़ीन पढ़ना नहीं चाहते हैं. इस तरह आँख बंद करके अपनी ध्वस्त सोच अगर यह पत्रकारिता करते होंगे तो क्या लिखते होंगे यह सोचकर ही मन डरने लगता है. इसी तरह के कम्पायमान हो चुकी साख को इस तरह के शाब्दिक महारथी कितना धोते होंगे इसका अंदाजा मुश्किल नहीं है.

कुल मिलाकर आज पत्रकारिता का वह दौर है खास तौर पर हिंदी पट्टी में जहाँ संदिग्धता ही हावी है. इसीलिए चाहे न चाहे यह कहना और मानना पड़ता है कि अंग्रेजी पत्रकारिता अपने क्षेत्र और दायरे में काफी बेहतर है. संयोग से मिले इस जोड़ी इस चर्चा को याद करके मन यही कहता है कि यह पत्रकारिता विहीन पत्रकार बनाने की परंपरा हमें कहाँ ले जायेगी.