जिलों के स्तर पर होने वाली स्थानीय
पत्रकारिता से सोच समझ और किसी भी विजन की उम्मीद तो कभी मिली ही नहीं. लेकिन
पत्रकारिता के नाम पर जो तमाशे अक्सर देखने को मिलते हैं वह उसके बारे में मौजूद
हर किताबी या पढ़ी लिखी बातों को झुठलाते नज़र आ रहे हैं. “वायस
आफ वायसलेस” यानी
जिनकी आवाज़ सत्ता प्रतिष्ठानों तक ना पहुँच रही हो उनकी आवाज़ बनना पत्रकारिता का
मूल सिद्धांत माना जाता है. इसी सिद्धांत के बदौलत पत्रकारिता को वह मुकाम हासिल
हुआ कि उसे लोकतंत्र के चौथे खम्भे के रूप में गिना या माना जाता है.
इसी लोकतंत्र की सबसे प्रथम इकाई के
रूप में गाँव, क़स्बा और जिला आता है. जहाँ की आवाजें अक्सर अनसुनी रह जाती है
जिनको मुकाम या जगह दिलवाना पत्रकारिता का कर्म होना चाहिए. लेकिन आज जिन हालातों
में जिला पत्रकारिता कम से कम हिंदी पट्टी में चल रही उससे घिन के अलावा और कुछ
कहा सोचा व समझा नहीं जा सकता. किसी धरने प्रदर्शन में या किसी भी पीड़ित की आवाज़
को सुनने के बजाय पत्रकारिता के नाम पर नाम भुनाने वाले वहां मौजूद पुलिस या प्रशासन
के अधिकारियों से हाथ मिलाते या फिर उनके साथ चिपकते नज़र आते हैं. जिसे वह अपनी
शान मानते हैं जो कुछ भी हो लेकिन पर पत्रकारिता तो नहीं ही कही जानी चाहिए.
31 दिसंबर की शाम को बहराइच जनपद के
पानी टंकी चौराहे पर अचानक पुलिस की भींड पहुँच जाती है. जिसमें सीओ स्तर के
अधिकारी भी मौजूद रहते हैं. और उसके बाद वहां उस चौराहे पर मौजूद ठेले वालों या
वहां कुछ समान खरीद आम से दिखने वाले या सीधे शब्दों में कहूँ तो कमजोर दिखने
वालों को पुलिस चेकिंग के नाम परेशान किया जाना शुरू होता है. इस प्रकार के अचानक
हुए कार्यवाही के तमाशे को भोगकर आस पास और रोज उसी इलाके में खरीदारी करने वाले
लोग या दुकानदार थोडा डर और आश्चर्य से चौंक पड़ते हैं. पुलिस की यह सारी कवायद 31
दिसंबर के नाम पर होने वाले शोर शाराबे और उद्दंडता को रोकने की ओर उठाया गया कदम
बताया जाता है. लेकिन इस उद्दंडता को रोकने के नाम पर हुई कार्यवाही काफी समय तक
लोगों को एक अजीब से आतंक में डालता दिखी.
खैर इसी बीच लगातार कैमरे के फ्लैश
चमकते हुए जाने कहाँ कहाँ से तरह तरह के कैमरों के साथ कुछ “लड़के”
पहुचंते हैं. और इस पुलिसिया कार्यवाही की फोटो लेने लगते हैं. पता चलता है कि यह
पत्रकार हैं और पुलिस के इस घटनाक्रम को कवर करने आयें हैं. इससे फिलहाल तो एक
संतोष जन्म लेता है कि चलिए यह “पत्रकार”
आ पहुंचे है तो कम से कम पुलिस आम जनता को अपनी “चेकिंग”
से परेशान नहीं करेगी. लेकिन परिस्थितियां एकदम अंदाज़े से उलट नज़र आती है. जब यह
तथाकथित “पत्रकार”
लोग सिपाही, दरोगा, कोतवाल व सीओ तक मौजूद हर अधिकारी से अपने अपने अखबार और
संपर्क के नाम पर हाथ मिलाने में जुट जाते हैं. और बिना किसी पूर्व सूचना के ठेले
या होटल मौजूद व्यक्तियों के जेबों में हाथ डालकर चेक कर रही पुलिस के इस कारनामे
को उनकी सक्रियता के नाम पर महिमा मंडित करते हुए फोटो खींचकर अपनी पत्रकारिता
पूरी करते रहे. इस तथाकथित पत्रकारिता झुण्ड में देश में नामचीन बताने वाले
अखबारों से लेकर कल परसों तक बने अखबारों के प्रतिनिधि मौजूद होते है. जिनका मुख्य
उद्देश्य केवल पुलिस की झुण्ड में अपनी पहचान बताना ही नज़र आता है.
इस तरह की पत्रकारिता देखकर मन यह
कोफ़्त जरूर उठता है कि क्या ऐसे लोगों को पत्रकार माना जाए. और अगर माना न जाए तो
आप कर क्या लेंगे, कुछ ऐसी ही स्थिति इस समय जिला स्तरीय स्थानीय पत्रकारिता की हो
रही है. जिलों में काम करने के नाम पर जितने कम पैसे और संसाधन दिए जाते हैं और
उसके बावजूद बढ़ रही असंख्य संख्या कम से शुचिता वाली पत्रकारिता की ओर तो नहीं ही
ले जा सकती है. लेकिन यह जो कुछ भी पत्रकारिता के नाम पर हो रहा है उसे क्या कहा
जाए. लोगों की आवाज़ बनने वाली पत्रकारिता उसी आवाज़ को दबाने वाले अधिकारी वर्ग की
चापलूसी में जुटी हुई है.
अखबार लेखनी क्षमता नहीं एजेंसी
विज्ञापन देखने लगे हैं. न्यूज़ चैनल कैमरा और मुफ्त में जितना ज्यादा मिल सके
उतनी फुटेज को खोज रहे हैं. ऐसे में पत्रकारिता में समझ रखने वाले का स्थान कम से
कम जिला स्तरीय पत्रकारिता में नहीं है. अपनी लगभग 2 साल और 15 जिलों की स्थानीय
पत्रकारिता को समझकर और कहीं कहीं तो उनके बीच घुसकर रिसर्च करने के दौर में पाया
कि अधिकाँश जगह तो अब पत्रकारिता साफ हो चुकी है. इक्का दुक्का जो लोग वाकई
पत्रकारिता को मानते हैं उन्हें स्थानीय पत्रकारिता की यह बाढ़ एक बेकार की वस्तु
से ज्यादा नहीं मानती है. और उनका मुकाम हाशिया पर बना दिया गया है. अब तो जिला
स्तरीय पत्रकारिता में अखबार या चैनल की “लग्गीयाँ”
एक औज़ार है जिनसे अधिकारियों और नेताओं में पकड़ बनाई जाए. मजे की बात तो यह देखने
को मिलती है कि जिन जिला स्तरीय पत्रकारों के पास खुद लिखने पढ़ने की समझ नहीं है
और जो इसका प्रयोग केवल हित साधने के लिए करते हैं. उनके पास “लडको”
की कमी नहीं है जो पत्रकार बनने या यूँ कहिएं कि इसी हाथ मिलाने वाली पत्रकारिता
के एक अंग बनने को व्याकुल हैं.
सरकारी अधिकारियों में अब वही
पत्रकार है जो रोज सुबह शाम उनके यहाँ दरबार लगाता है, और जैसे पुराने जमाने में
दरबारी फायदा उठाते वैसे ही फायदा उठाने और कानाफूसी करने का काम स्थानीय
पत्रकारिता की आत्मा बन चुका है. इस तरह की स्थितियां दुःख तो देती है, लेकिन
सच्चाई भी यही है. बहरहाल बहराइच के एक चौराहे पर लगे पत्रकारिता के मजमे को देखकर
समझ नहीं आता है कि क्या कहा जाए. अब जिलों में मर गई है या रोज़ मारी जा रही है
पत्रकारिता.

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