

भ्रष्टाचार को लेकर एक बार उच्चतम न्यायालय ने एक टिप्पणी की थी जिसमें उसने कहा था कि निचले कार्यालयों में कुछ सड़ रहा है। उच्चतम न्यायलय की यह टिप्पणी जिलों में पत्रकारिता के नाम पर जो कुछ चल रहा है, उस परिपेक्ष्य में काफी खरी उतरती है। किसी भी व्यवस्था या कार्यप्रणाली में जिले को एक प्राथमिक ईकाई के रूप में माना जाता है। परन्तु जब बात लोकतंत्र के अन्दर की किसी व्यवस्था की हो तो उस उस समय जिलों का महत्व काफी बढ़ ज़ाता है। इसी लोकतंत्र के चैथे खम्भे के रूप में विख्यात पत्रकारिता के गिरते स्तर खास तौर पर जिलों में गिरते स्तर और अवांछित लोगो की बढ़त से यह खम्भा अब घुनता जा रहा है।
जिलों में आज पत्रकार के नाम पर जो लोग दिखाई पड़ते हैं। उनमें से अधिकतर को पत्रकारिता या तो अपने धंधों के ऊँच-नीच को बचाने का माध्यम होती है। या अधिकारियों के पास बैठ उठकर दलाली करने का आसान तरीका। इस प्रकार के लोगो के बीच, जो बचे-खुचे शुद्ध शाश्वत पत्रकार होते हैं उन्हे इन दलालो और सेठो के बीच अपनी पहचान के लिए एक अलग जद्दोज़हद करनी पड़ती है। पत्रकारिता के र्शीष पदो पर बैठे लोग खास तौर पर इलेक्ट्रानिक चैनलो के लोग जिलों को एक बेकार की चीज समझकर अपने पत्रकार बनाने के अधिकार ऐसे लोगो को देना पसंद करते हैं जो पत्रकारिता को छोड़कर अधिकतर चीजों में माहिर होते हैं।
पत्रकार बनने के लिए जहां चैनलो और अखबार के अधिकारियों चापलूसी को प्रमुखता दी जाती है। वहीं अखबार के लोग अखबार अपने जिलें में मंगाने के लिए ऐजेंसी लेने का दबाव डालकर पैसे लेते हैं। तो वहीं इलेक्ट्रानिक चैनल में आई0डी0 देने की सिक्यूरीटी के नाम पर पैसे लिए जाते हैं। आज की दुनिया में जब लोग अपने परिवार पर पैसे खर्च करने में नफ़ा-नुक्सान देखते हैं। तो पत्रकार बनने के लिए कोई क्यों पैसे लेने की जगह पैसे देगा। इस प्रकार के पैसे देकर पत्रकार बनने वाले लोग क्या पत्रकारिता के मापदण्डो को पूरा कर सकते हैं। एक बार एक ऐसे ही तथाकथित पत्रकार जो एक ऐसे अखबार के नाम से जुड़े हैं, जो आज मात्र विज्ञापन छापने के लिए निकलता है। उन्होनें हमें बताया कि लखनऊ चलकर अखबार लेकर आना है अगर कोई 30 हजार मांगेगा तो मैं 50 हजार देकर अखबार ले आऊँगा। यानि जितना बड़ा अखबार उतना पैसा खर्च करने को यह सज्जन तैयार थे। ऊपर से बड़ी बात यह कि इन्होने अपने जीवन में सूचना विभाग की विज्ञप्ति छोड़कर कभी कोई समाचार स्वंय नही लिखा है। पैसे की इस प्रकार बोली लगने के बाद इससे कमाई का रास्ता भी देखा जाता है।
जिलों की पत्रकारिता में अब समाचार की समझ का नितांत अभाव साफ नजर आता जा रहा है। खबर के नाम पर या तो दुर्घटना या क्राइम से संबंधित वही चीजें दिखती है या इन पत्रकारो द्वारा दिखाईं जाती है, जिनसे प्रशासन पर दबाव बन सके। पत्रकार अब खबर को र्सिफ इसलिए पकड़ते हैं कि जिलों के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के चैम्बरों में बैठने को मिले। इसमें प्रिन्ट मीडीया के कुछ लोग तो थेाड़ा ही सही कार्य करते हैं या उपर के दबाव के चलते उनको करना पड़ता है। परन्तु इलेक्ट्रानिक चैनेल के नाम पर तो अधिकतर वीडीयोग्राफी करके पैसा कमाया जाता है। जो कल तक शादी विवाह में वीडीयो कैमरे चलाकर पैसे कमाते थे आज वह पत्रकार बनकर थानेदारो से ट्रांसफर पोस्टिंग का पैसा वसूलते हैं। चैनल के पत्रकार अपना एक गठजोड़ बनाकर आलाअधिकारियों के पास बैठकर काम करवाते हैं। साथ ही अब गठजोड करके यह लोग जिलों में भूमाफियाओं को भी कहीं कहीं मात करने में जुट जाते हैं। जहां भी कहीं कीमती जमीन का मामला होता है यह लोग दबाव बनाकर कमाने की कोशिश में लग जाते हैं। ऐसा नही है यह सारे कार्यो की उपर के लोगो को खबर नही होती। एक बार ऐसे ही एक स्ट्रिंगर के बारे में हमने अपने एक परिचित उसी चैनल के बड़े प्रदेश चीफ जो निश्कलंक पत्रकारिता का दम भरते हैं उनको बताया तो कार्यवाही तो दूर उन्होंनें उससे कुछ पूछा भी नहीं।
इन सब बातो से एक चीज जो सबसे अधिक उठकर ऊपर आती है कि जिलों में पत्रकारिता का स्तर इतना गिर चुका है कि अब आम लोग इसे पत्रकारिता कम दलाली अधिक मानने लगे हैं। जिलों के यह तथाकथित पत्रकार इलेक्ट्रानिक और अखबार के माध्यम से ठेको और सरकारी कार्यों में खुले-आम हस्तक्षेप करके उसे अपने पक्ष में करते हैंे। अखबारो और चैनलो के प्रबंधको द्वारा जिले पर पत्रकारो को उचित पारिश्रमिक ना देना भी इस पेशे में दलालांे के आने को प्रोत्साहित करता है। जहां इलेक्ªानिक चैनलों के द्वारा अपने स्ट्रिंगरो को पैसा ना के बराबर दिया जाता हैं। वहीं विसुअल लेने और घटना कवर करने के नाम पैसा खर्च भी कराया जाता है। इतना खर्च के बाद भी जिलों में इलेक्ट्रानिक पत्रकारो की बाढ़ जन जागरण को नही थानो और अधिकारियों के बीच इन इलेक्ट्रानिक पत्रकारो की धमक की पहचान हैं। इलेक्ट्रानिक चैनलो के पत्रकार बनने के लिए ना तो उचित समझ चाहिए, बस 40 हजार का कैमरा और चैनल के प्रमुखो को देने के लिए पैसा चाहिए। इन तथाकथित पत्रकारो की प्रश्न पूछने की समझ को देखकर अच्छे -अच्छे लोगो इनके पत्रकार होने की समझ पर ही शंका हो जाती है।
ऐसा नही है यह हाल र्सिफ इलेक्ट्रानिक मीड़ीया का है। कमोबेश यही स्थिति प्रिन्ट पत्रकारिता में भी हाजिर हैं। यहां पत्रकारिता का मूल गुण अखबार का र्सकुलेशन और विज्ञापन होता है। इन दोनो से कोई भी अखबार अछुता नही हैं। कम र्सकुलेश वाले अखबार के पत्रकार तो मात्र विज्ञापन के कमीशन को मेहनताने के रूप में पाते हैं। साथ ही इन्हे अखबार की ऐजेंसी भी लेनी पड़ती है, जिससे अखबार जिले में आये। छोटे अखबारों के यह महान पत्रकार लेाग खबर की कटिंग से व्यवस्था के तहत होने वाली कार्यवाही से डराकर अधिकारियों से विज्ञापन और अपना फायदा वसूलते हैं। ऐसे ही एक पत्रकार बंधु के दफ्तर में लिखी जा रही खबर के वाक्यो और शब्दो में सांमजस्य ना होने पर हमने टोका तो उन्होंने जवाब दिया अरे भाई कुछ भी लिखो क्या करना है खबर पर अधिकारी कार्यवाही कर ही देते हैं। इससे ज्यादा क्या चाहिए। यह तो छोटे अखबारो की बात है परन्तु बड़े अखबार भी इनसे कम नही हैं। इसके पत्रकार अपने अखबार की पहँुच और प्रभाव के चलते कई बड़े धडो या यू कहें लेागो को प्रसिद्ध करने के नाम पर भी झोली भरते हैं। साथ ही दबाव बनाकर अपने अनेक गलत सही काम कराये जाते है। इन बडे अखबारो में भी पत्रकारो की सैलरी चर्तुथ श्रेणी कर्मचारी से भी कम होती हैं।
यह सब बातें एक चीज साफ दिखती है कि अख्बार या चैनलो के प्रमुख लोग पत्रकारिता में बढ़ रही संडाध के जिम्मेदार हैं। एक बार एक अखबार में काम मांगने गये एक पत्रकार को अखबार के एक सज्जन ने कहा जिलों में अखबार ले जाओ और लूटो-खाओ। इसी प्रकार जिले में पत्रकारो का एक सशक्त ग्रुप पूरे जिले के पुलिस महकमें को कब्जे में रखने की पत्रकारिता करता है। इस प्रकार की मानसिकता और कार्यप्रणाली क्या पत्रकारिता को लकवासग्रस्त नही करेगा। अन्त में यही कहा जा सकता है कि बहुत कुछ सड़ रहा है जिलों की पत्रकारिता में।