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Saturday, June 23, 2012

बधाई दें या मातम करें इन नए नौकर “शाहों” की कुर्बानियों का.


हर वर्ष की तरह इस बार भी जब संघ लोक सेवा आयोग की नौकरियों यानी सिविल सेवा में चयनित हुए लोगों की सूची निकली तो प्रतिभागियों में तो खुशी का माहौल था ही, मीडिया भी काफी दिनों तक इन चयनित नौकरशाहों के बारे में एक से एक जानकारी सामने लाकर इन्हें आदर्श बनाया ही जाता रहा. सिविल सेवा में चुने गए इन लोगों में कोई डाक्टर थे तो कोई इंजिनियर, ऐसे लोग जिनके पास वह पढ़ाई करने का मौका था जो शायद इस देश के अधिकतर बच्चों का सपना होता है. फिर क्या कारण हो जाते हैं कि मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी उपयोगी और व्यावसायिक शिक्षा के रास्ते को छोड़कर यह लोग सरकारी नौकरियों में चले आ रहे हैं.
इस प्रश्न पर एक धड़ा बहुत खुश होता है और कहता है कि देश की सरकारी सेवा में आकर इन उच्च शिक्षित लोगों के द्वारा नए आयाम बनाए जायेंगे. सिविल सेवा पर हर्षित गान करने वाले यह लोग तमाम तरह के उद्धरणों से इन नए नौकर शाहों का अभिनन्दन राष्ट्रनायकों की तरह करने लगते हैं. परन्तु बात की जाए देश की आवश्यकता की तो देश में एक सरकारी महिला अधिकारी की अपेक्षा सबसे अधिक आवश्यकता एक डाक्टर वह भी महिला डाक्टर की है. परन्तु इस वर्ष संघ लोक सेवा आयोग की टापर जो महिला भी हैं और डाक्टर भी उन्होंने अपना पेशा नहीं चुना आखिर क्या कारण थे. इन सारे गानों धूम के बीच कुछ ऐसी ही बातें सोचने पर मजबूर कर देती है कि यह नए लोग वही होंगे जो हर वर्ष ऐसे ही हर्ष गान के बीच ही चुने जाते हैं और उसके बाद देश की सर्वोच्च नौकरशाही के पदों पर बैठने के बाद जनता के उतने ही बड़े शोषक हो जाते हैं जैसे कभी औपनिवेशिक दौर में अंग्रेज अधिकारी होते थे. अगर इन बातों पर हज़ारों उद्धरणों के बीच कुछ पर ध्यान दें तो चाहें उत्तर प्रदेश करोडो रूपये के एनआरएचएम घोटाले में पकडे गए अपने लोक सेवा बैच के टापर आईएएस प्रदीप शुक्ल हो यां छत्तीसगढ़ में एक आदिवासी महिला सोनी सोरी के साथ अमानुषिक व्यवहार करने वाले आईपीएस अंकित गर्ग हों. यह सब इन्ही संघ लोक सेवा आयोग की नौकरियों से निकले भूरे अंग्रेज हैं. तो फिर नौकरशाही में सफलता को लेकर इतना उत्साह क्यों मनाया जाए.
अगर जनता के मांस की बात करें तो इस देश में नौकरशाही के इस वर्ग में शामिल होने को लेकर बहुत अधिक उत्साह हमेशा से रहा है. भारतीयों में अंग्रेज ज़माने के अधिकारियों के प्रति काफी भय और सर्व शक्तिशाली होने की जो छवि बनी उसी के साये में भारत की स्वतंत्रता के बाद की नौकरशाही चली और चलती ही गई. मनोवैज्ञानिकों का एक सिद्धांत इस पर ठीक बैठता है कि मनुष्य जिस भी संस्था या व्यक्ति द्वारा शोषित होता है या डर महसूस करता है वह उसी संस्था या व्यक्ति के रूप को पाना चाहता है. नौकरशाही को लेकर पीढ़ियों से ऐसी ही मानसिकता विरासत में मिलती चली आ रही है. आज भी देश के हर कोने में तमाम लोग मिल जायेंगे जो आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को राजा या बादशाह की उपाधि आसानी से दे देंगे और इस दबदबे में शामिल होना चाहेंगे.
तमाम तरह की उपमाओं से दूर अगर इन अधिकारी बनने को लालायित वर्ग के बारे में ही देखा जाए तो साफ़ पता चलेगा कि किसी भी जिले में तैनात एक डाक्टर जो व्यावसायिक शिक्षा के सबसे अच्छी जरूरत को पूरा करता है जिसकी मनुष्य को सबसे अधिक जरूरत है, वह जिले के कलेक्टर के सामने हाथ बांधे खड़ा होता है. कलेक्टर सर्वोच्च हो जाता है और डाक्टर जो मानवों को जीवन देता है या दे सकता है वह उसका अधीनस्थ. यही हाल इंजीनियरिंग में दक्ष लोगों का भी है, तो ऐसे में इन सभी का झुकाव इस नौकरी के प्रति होना वैसे भी स्वाभाविक है.
इसी के साथ भारतीय समाज में परिवार का सामाजिक स्तर उठाने की ग्रंथि में भी इस सेवा का अहम योगदान हो जाता है. किसी परिवार का लड़का या लड़की अगर इन सेवाओं में चुन लिया जाता है तो उसके पास चापलूसों मुसाहिबों की भींड लग जाती है साथ ही सिफारिशी खत और रिश्तेदारों में नयी नौकरशाही का ऐसा जन्मोत्सव मनाया जाता है जैसे प्राचीन काल में किसी देश को जीतने पर मिला करता था.
ऐसे माहौल में बधाइयों के तमाम प्रवचनों के कुछ वर्ष के बाद यह अधिकारी वर्ग वैसा ही होता है जैसे इन सेवा के पूर्वज अंग्रेज रहे थे. गरीब से गरीब परिवार से आने वाला आईएएस कभी यह सवाल नहीं उठाता है कि क्यों पूरे सेवा काल में उसका एक सेवक उसके राशन कार्ड में जगह पाने का हक़दार हो जाता है, कभी कोई आईपीएस सवाल नहीं उठाता है कि उसके लिए इतने फालोवर नौकर किसलिए रखे जाते हैं. भारतीय संविधान का विधान इन नौकरशाहों के दरवाजों पर क्यों दम तोड़ देता है जहाँ इनके लिए समता का अधिकार रखने वाला दूसरा भारतीय जनता की सरकार के टैक्स के पैसे से मिलने वाली तनख्वाह को पाने के लिए इनकी गुलामी करता है. क्या इन नए अधिकारीयों को मिलने वाली सरकारी गाडियां मेमसाहबों को खरीददारी कराने और बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना बंद कर देंगी, क्या इन अधिकारीयों के दफ्तरों में यह कुर्सी पर और जनता सामने जमीन पर फ़रियाद करती दिखना बंद कर देंगी. अगर यह सब नहीं हुआ और ना ही होगा तो फिर क्यों बधाई दें इन नए नौकरशाहों का क्यों ना मातम करें इनकी इन कुर्बानियों का.