यह वह स्वर हैं जिनको बोलने की छूट हर जगह नहीं होती. यह स्वर अक्सर या तो सुने ही नहीं जाते या कोई सुनने ही नहीं देता है. हमसे यहाँ इस मेल पर संपर्क किया जा सकता है. harishankar.shahi@gmail.com
Wednesday, December 12, 2012
पत्रकारिता विहीन पत्रकार बनाने की परंपरा हमें कहाँ ले जायेगी.
खैर इन्ही सबके बीच एक पारिवारिक पडोसी के विवाह समारोह में अपने पत्रकारिता के जलवे के कारण बुलाये गये “शब्द शब्द संघर्ष” टैग लाइन के जिला संवाददाता अपने गुरु के साथ मिल जाते हैं. और वहां उनसे बात शुरू होती है. शब्द संघर्ष वाले जिला संवादाता महोदय ऐसी बातें करने लगते हैं जिससे उनके पत्रकारिता तो छोडिये सामान्य ज्ञान पर भी संदेह होने लगता है. जिला स्तर की पत्रकारिता को केवल अपने धंधों से सींचने वाले लोग पूरी मीडिया के पेशेवर व्यवहार के बारे में उल जलूल तर्क देने लगते है, जिस बारे में उन गुरु चेले को शायद ताउम्र ना पता चले. लेखनी में भी पैसा है और पैसा कैसे हैं कैसे किस जगह क्या लिखा जाना चाहिए यह सब बातें उन्हें जिले स्तर से आगे पता ही नहीं है. उन्हें केवल इतना पता है कि जो लखनऊ या दिल्ली में है वह तनख्वाह पाता है बाकी पत्रकार केवल “धंधो” में जुटा है. रिटेनरशिप और कांट्रेक्ट पर काम करने के बारे में इनके ख्याल पूछने पर इन्हें समझ ही नहीं आता है कि यह होता क्या है, यह अलग बात है कि वह जिले के “जिला संवाददाता” है और खुद लकदक सुविधासंपन्न स्टाफ से भरा पूरा दफ्तर चलाते हैं.
और समझ के इतने कमजोर कि उन्हें यह भी नहीं पता कि दिल्ली और लखनऊ में भी स्ट्रिंगर और उनके जैसे ऐसे वैसे एवइं टाइप लोग भी होते है. पत्रकारिता में चंद नाम उछालकर अपने को महान सिद्ध या यूँ कहने थोपने वाले इन लोगों को देख सुनकर कोफ़्त होती है लेकिन साथ ही तरस भी आता है कि क्या यही पत्रकारिता है जिसका आज समझ के साथ कोई रिश्ता नहीं रह गया है. गुरु चेले की इस जोड़ी जैसे स्थानीय पत्रकारिता के सैम्पल तहलका और इंडिया टुडे जैसी नामवर मैगजीनों के नाम ऐसे लेकर सामने वाले को सुनाते हैं कि गोया यह सब कोई अजूबा हैं. जिनमें कोई इनके पूछे बिना किसी की भर्ती नहीं हो सकती या इनके अलावा कोई लिख नहीं सकता. हाँ यह भी एक अलग बात है कि इन्ही लोगों ने शायद ऐसे जगहों के सिर्फ नाम भुनाए हो तो यह उनके लिए पूज्य होंगे ही.
स्थानीय पत्रकारिता की समझ में स्थानीय पत्थर इतने ज्यादा भरे पड़े हैं जिससे इन्हें केवल यही समझ आता है कि दुनिया बस मेरे इस जिले में है जो मैं कर रहा हूँ वही है अन्यथा सब बेकार. इन लोगों को देखकर सुनकर कुएं के मेढक की कहानी की सत्यता आसानी से पता चल जाती है.
आज के दौर में जब पत्रकारिता और पत्रकार खास तौर पर पहली कड़ी वाले पूरी तरह से संदिग्ध होने के कगार पर खड़ी हैं. वहां “शब्द शब्द संघर्ष” को इस तरह बेमानी करने वाले लोगों और उनकी समझ को क्या कहा जायेगा. मजे की बात यह है कि यह लोग कहते हैं कि अब हम कितना पढ़ें यानी पत्रकार हैं और अखबार मैगज़ीन पढ़ना नहीं चाहते हैं. इस तरह आँख बंद करके अपनी ध्वस्त सोच अगर यह पत्रकारिता करते होंगे तो क्या लिखते होंगे यह सोचकर ही मन डरने लगता है. इसी तरह के कम्पायमान हो चुकी साख को इस तरह के शाब्दिक महारथी कितना धोते होंगे इसका अंदाजा मुश्किल नहीं है.
कुल मिलाकर आज पत्रकारिता का वह दौर है खास तौर पर हिंदी पट्टी में जहाँ संदिग्धता ही हावी है. इसीलिए चाहे न चाहे यह कहना और मानना पड़ता है कि अंग्रेजी पत्रकारिता अपने क्षेत्र और दायरे में काफी बेहतर है. संयोग से मिले इस जोड़ी इस चर्चा को याद करके मन यही कहता है कि यह पत्रकारिता विहीन पत्रकार बनाने की परंपरा हमें कहाँ ले जायेगी.
Thursday, December 6, 2012
जय एफडीआई "वाद"।
Sunday, October 21, 2012
शौचालय निर्माण के जरिये अपहरण, बलात्कार और छेड़-छाड़ से मुक्ति के स्वप्न दिखाती नौकरशाही।
Saturday, June 23, 2012
बधाई दें या मातम करें इन नए नौकर “शाहों” की कुर्बानियों का.
Thursday, February 23, 2012
आखिर क्यों प्रयोग करूँ अपने मत? अगर हमारा अधिकार तो हमें ही सोचकर प्रयोग करने दीजिए?

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान नेताओं के भाषणों और अपने अपने वादों तथा उनके समीकरणों से ज्यादा शोर अगर किसी बात का था तो वह शोर मतदान करने के लिए होने वाली जागरूकता का ही था. तमाम होर्डिंग्स, बैनर पोस्टर, टीवी चैनलों तथा जिलों-जिलों, कस्बों-कस्बों में मतदान जागरूकता रैलियां और अभियान चलाये गए. सरकारी गैर सरकारी तथा प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के हर समूहों द्वारा इस मतदान में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जा रहा था. लगातार चल रहे इन कार्यक्रमों के द्वारा ऐसा महसूस कराया जा रहा था जैसे अगर आपने मतदान नहीं किया तो कोई बहुत बड़ा पाप कर देंगे या अपना अधिकार खो देंगे. मतदान कराने के लिए इतनी सक्रियता का दिखाई देना एक तरफ तो अच्छा लगता है. परन्तु दूसरी तरफ यह बिलकुल ऐसा लगता है जैसे हम बाजार में खड़े हैं और कम्पनी अपने उत्पाद को बेचने के लिए अपनी ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रही है. आखिर क्या हो गया जो चुनाव आयोग जिसका काम निष्पक्ष चुनाव करना है वह और पक्षपात से भरी सारी पार्टियां एकदम से मतदान कराने के लिए कमर कसकर तैयार हो गईं. सारे दलों के एक साथ एक सुर से चुनाव आयोग के साथ मिलकर खड़े होने की स्थिति बिलकुल वैसे ही लगती है कि जब बाजार में ग्राहक आये ही ना और दुकाने खुली हुई हों इसीलिए उस समय संतुलन के लिए सारे व्यवसाई एक जुट होकर ग्राहक को बाजार में लाने के लिए हर सुविधा देने को तैयार हों, और ग्राहक के लिए सारी सुविधा दे रहे हों.
इन सारे अभियानों के साथ ऐसा भी नहीं है कि चुनाव आयोग ने सारी तैयारी पूरी कर रखी हो और देश के हर कोने में सबको मतदाता पहचान कार्ड मिल गए हों और सही मिल गए हों. दूसरों की बात क्या कहें अभी तक हमें खुद अपना मतदाता पहचान पत्र नहीं मिला है जबकि कई बार कोशिश कर चुका हूँ, कुछ ना कुछ गलतियाँ मिल ही जाती हैं. इसी तरह लाखो लोग ऐसे हैं जो या वोटर लिस्ट में मरे दर्शाये गए हैं जबकि उनकी आत्मा सदेह पोलिंग बूथ पर टहलती मिली, इसी प्रकार का एक उदाहरण चर्चित हुआ जब वाराणसी के कैंट विधानसभा के प्रत्याशी अफलातून के प्रस्तावक जब वोट डालने गए तो वह ही वोटर लिस्ट में मृत मिले जबकि वह सदेह पोलिंग एजेंट थे. ऐसी तमाम गडबडियों को किनारे करते हुए बस हर तरफ बस एक ही शोर कि आपने मतदान किया आपने वोट दिया. इस तरह की जल्दबाजी यह सोचने पर मजबूर करती है ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों इतना प्रचार किया जा रहा है?
चुनावों में जो भी दल मैदान में उतरे हैं उनमे चाहें सपा हो बसपा हो भाजपा या कांग्रेस हो हर दल ने कभी ना कभी सरकार बनाई है या सरकार में शामिल रहा है, और साथ ही हमेशा से कई चुनाव क्षेत्रों से उनके लोग सांसद या विधायक रहे हैं. इसी के साथ राजनीति के जड़ में घुस चुका भ्रष्टाचार, गुंडई, काला धन जैसे मुद्दों का कीड़ा सबमे वही छेद छोटे या बड़े आकार में कर चुका है. यहाँ आकार से मतलब उनकी संख्या के अनुसार आकार से है. अब जब राजनीति के परिदृश्य में यही कलाकार हैं जो सब के सब अंदर से खोखले है और मजे की बात यह है की जनता में चुनाव लड़ने सम्बन्धी कोई जागरूकता नहीं है. यानी किसी भी ऐसे प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता है जिसको ईमानदार या शरीफ कहा जाए. ऐसे में केवल मतदाता को जागरूक करने से क्या हो जायेगा? जागरूकता के नारे में साफ़ कहा जाता है कि आप अपने मत का प्रयोग कीजिये नहीं तो गलत आदमी चुन लिया जाएगा. अब इस सारे कार्यक्रमों में यह नहीं बताया जाता है कि जब सब गलत है तो फिर वोट करने का क्या मकसद रह जाएगा और क्यों मजबूरी है कि गलत लोगों में से कम गलत को चुना जाए. वोटर जागरूकता अभियान से कभी कभी मन में यह ख्याल आता है कि अगर कभी चुनना पड़े तो भांग, धतूरे, सिगरेट, तम्बाकू, शराब, ड्रग्स में से कौन सा नशा “अच्छा नशा है” इसका चुनाव कैसे करूँगा.
खैर हम तो मानते हैं कि यह सब जागरूकता अभियान क्यों हुए इसके कारण तलाशने के लिए ज्यादा परेशान होने कि जरूरत नहीं है, क्योंकि कारण आसानी के साथ ही दिख जाता है. देखा जाए तो इस बार के चुनावों में कांग्रेस मजबूत होकर अपने लिए मतदाता तलाश रही तो सपा कांग्रेस के बढ़ने से बने कारण से अपने परम्परागत वोट बैंक घटने पर परेशान है. वहीँ बीजेपी के मुख्य वोट बैंक माने जाने वाले सवर्ण मतदाता का बहुत कम संख्या में घर से निकलना और खास तौर पर सवर्ण महिला मतदाताओं को घर से न निकलना बड़ी चिंता का विषय है, जबकि सवर्ण मतदाता के पास कांग्रेस का विकल्प हो. मायावती जो सबसे सुरक्षित होकर अपने कैडर के वोट बैंक के सहारे हमेशा आगे बढती है उन्हें भी अन्य जातियों का सहयोग तो चाहिए ही होगा. अब अगर ऐसी ही परिस्थितियाँ सामने हो तो उस समय सारे दल जो राजनीति के दलदल में सरकार का पुल बनाकर उस पार जाना चाहते हैं उन्हें दलदल भरने के लिए वोट चाहिए और चूँकि सबके दलदल का आकार एक ही बराबर हैं तो जाहिर सी बात है की मतदाताओं या गड्ढे में गिरने वालों की संख्या तो चाहिए ही होगी. अब इसी संख्या की तलाश में हर पार्टी नए मतदाताओं को बढ़ाना चाह रही तो इसी अंदरखाने में मची राजनैतिक एकजुटता के लिए ही तमाम मतदाता जागरूकता अभियान चल रहे हैं और लोगों को वोट डालने के बारे में बताया जा रहा है. जैसा की प्रचलित में इन अभियानों में वोट ना डालने को बड़े गुनाह के रूप में दर्शाने की छुपी कोशिश हो रही है.
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परन्तु विचारों के अनुसार ही माने तो अगर कोई भी व्यक्ति वोट नहीं डालता है तो यह लोकतंत्र के प्रति कैसे गलत हो जाएगा. जिस राजनैतिक व्यस्वथा सोच की जगह सत्ता हावी है. ऐसी व्यवस्था जहाँ प्रत्याशी घोषित करने से पहले कोई भी पार्टी जो बड़ी जनहितैषी बनती है वह कभी किसी जनता से नहीं पूछती है कि बताओ इसे तुम्हारा प्रतिनिधि बना रहे हैं, यह बनने लायक है भी या नहीं. यानी कोई प्रत्याशी तय करने का तरीका नहीं है. बस चार लोगों को थोप दिया गया और चुनने के लिए जबरदस्ती धकेला जाने लगा. तो भाई इसी पर हमारा यह सवाल है. आखिर क्यों प्रयोग करूँ अपने मत? अगर हमारा अधिकार तो हमें ही सोचकर प्रयोग करने दीजिए? सोचिये हो सकता है यही सवाल सबके मन में भी कहीं ना खिन तो उठ ही रहा होगा.
Thursday, February 16, 2012
कितना सफल हो सकता है कांग्रेस का यू.पी. में बेनी प्रसाद वर्मा पर लगा दाँव.
उत्तर प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस पार्टी के खोये वैभव को पाने के लिए कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी जबरदस्त चुनावी दौरों और एक ही दिन में कई कई जनसभाओं को संबोधित कर रहे हैं इसी के साथ ही वह अपने मंच पर तमाम नेताओं को लेकर दिखते हैं जिनके द्वारा चुनावों के समीकरण साधे जा सकते हैं. इन्ही दिखने वाले चेहरों में सबसे प्रमुख रूप से जिस नेता का नाम सामने आता है वह केंद्रीय इस्पात मंत्री और कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य बेनी प्रसाद वर्मा का नाम है. बेनी प्रसाद वर्मा पर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने इस 2012 के विधानसभा चुनावों में काफी ज्यादा विश्वास दिखा रहे हैं. राहुल गांधी की चुनाव यात्राओं के दौरान विशेष रूप से पूर्वांचल और अवध तथा बुंदेलखंड के इलाकों में बेनी प्रसाद वर्मा की मौजूदी आवश्यक रूप से बनी रहती है, साथ ही मंच से बेनी प्रसाद वर्मा के भाषणों और उनके सञ्चालन के तरीकों पर भी काफी छूट रहती है. कांग्रेस पार्टी के पूर्वांचल और अवध के इलाकों में चुनावों में उम्मीदवारों की घोषणा में बेनी प्रसाद वर्मा का पूरी तरह से प्रभाव बना रहा जिससे उनके मनपसंद लोगो को ही कांग्रेस का चुनावों में प्रत्याशी बनाया गया. टिकट बंटवारे में बेनी प्रसाद वर्मा के वर्चस्व के चलते पार्टी कार्यकर्ताओं का गुस्सा सडको और यहाँ तक की राहुल गांधी की सभाओं में भी खुलेआम हो चुका है.
समाजवादी पार्टी से बगावत करके और अपने स्वयं की पार्टी बनाकर 2007 के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह पराजित हो चूके बेनी प्रसाद वर्मा जो अपने समर्थकों में बेनी बाबू के नाम से प्रसिद्ध हैं, उन पर अब कांग्रेस को इस विधानसभा चुनाव में विजयश्री दिलाने और खास तौर पर राहुल गांधी के विश्वास की जबरदस्त जिम्मेदारी दिखाई पड़ रही है. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले बेनी प्रसाद वर्मा कांग्रेस ने अपनी राजनीति की शुरुआत ही कांग्रेस के एकछत्र राज्य के विरोध से जन्मी जयप्रकाश नारायण की राजनैतिक विचारधारा से की थी. कांग्रेस विरोध की इस विचारधारा को काफी समय तक संभाले रहने वाले बेनी बाबू ने 1974 से लेकर 1992 तक भारतीय क्रांति पार्टी, जनता पार्टी, भारतीय लोक दल, लोकदल और जनता दल तक सोशलिस्ट आंदोलनों के विभिन्न मंचों पर साथ रहे और यहीं उनकी दोस्ती पश्चिम उत्तर प्रदेश के एक और जमीन से जुड़े सोशलिस्ट नेता मुलायम सिंह यादव से हुई. जहाँ इन दोनों दोस्तों ने जनता दल और अन्य सोशलिस्ट दलों के लोगो के साथ मिलकर 1992 में समाजवादी पार्टी की नींव रखी और साथ इस नई पार्टी को सजाया और उत्तर प्रदेश की राजनीति में गर्म धर्म की राजनीति को अपने अनुकूल किया. 1974 से 1992 तक बेनी प्रसाद वर्मा उत्तर प्रदेश की विधानसभाओं के सदस्य रहे और इस बीच दो बार सोशलिस्ट सरकारों में मंत्री भी रहे. 1992 में मुलायम सिंह यादव के साथ अब्ने नए दल समाजवादी पार्टी के साथ बेनी बाबू ने मुलायम सिंह यादव के मुस्लिम यादव समीकरण को विस्तृत करते हुए पिछडों की अन्य जाति “कुर्मी” को भी इसमें जोड़ा.
बेनी प्रसाद वर्मा और मुलायम सिंह यादव की इस जोड़ी ने 1993-94 दलित वर्ग के दल के रूप में उभरी बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर प्रदेश में गैर बीजेपी की सरकार बनाई और हिन्दुत्ववादी राजनीती के दुसरे विकल्प बने. इस सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे बेनी प्रसाद वर्मा पर तब तक क्षेत्रवाद के आरोप लगने लगे और लोक निर्माण मंत्री रहते हुए प्रदेश के सड़कों के अधिकतर पैसे को अपने गृह जनपद और चुनाव क्षेत्र बाराबंकी में सडको के जाल बिछाने के लिए लगाने का आरोप लगा और अपने क्षेत्र को प्रदेश से ऊपर मानने के आरोप में वह घिर गये. इसके बाद तो प्रदेश की राजनीति से ऊपर देश की राजनीति की ओर बढ़ रही समाजवादी पार्टी के केन्द्रीय चेहरे के रूप में बेनी प्रसाद वर्मा ने 1996 में बहराइच जनपद की कैसरगंज लोकसभा से चुनाव जीतकर 11 वी लोकसभा में पहुँच गये. जहाँ कांग्रेस की खराब हालत ने गठबंधन और कई छोटे बड़े दलों के साथ मिलकर सरकार बनी जिसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था. यह वह दौर था जब 1991 से गाँधी परिवार कांग्रेस से दूर हो गया था. इस बीच दो बार प्रधानमंत्री बदले जाने और कुल दो साल चली इस लोकसभा में बेनी प्रसाद वर्मा ने कई मंत्रालयों के साथ ही केन्द्रीय कैबिनेट संचार मंत्री का भी पद संभाला. जिसके बाद उन्होंने अपने क्षेत्र कैसरगंज और बाराबनी कन्पद में संचार सुविधाओं का जल बिछा दिया. 1998 में सरकार गिरने और मध्यावधि चुनाव के बाद भले ही बेनी प्रसाद वर्मा दुबारा मंत्री नहीं बन पाए, लेकिन वह लगातार 1998 से 2004 तक 12 वीं, 13 वीं और 14 वीं लोकसभा में समाजवादी पार्टी से कैसरगंज लोकसभा से चुने जाते रहे. इस दौर में बेनी प्रसाद वर्मा की भूमिका बहुत हद सीमित हो चुकी थी या यूँ कहें की उन्होंने स्वयं को बाराबंकी और बहराइच के बीच ही सीमित कर लिया था.
बेनी बाबू की राजनीती में सबसे बड़ा बदलाव 1993-94 के बाद 2004 में दुबारा मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव और दूसरी बार प्रदेश की सत्ता में आई समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान आया. इसी सरकार के दौरान पुराने दोस्तों मुलायम और बेनी के रिश्ते में खटास आने लगी और मुखर राजनीति से दूर हो चुके बेनी प्रसाद वर्मा को समाजवादी पार्टी में उनसे काफी बाद में प्रवेश पाए लोगों के बड़े नेताओं के बढते कद और अपने को पीछे छूटने के फर्क ने बेनी बाबू और समाजवादी पार्टी में दरार को बढाने में भूमिका निभाई. अमर सिंह, आज़म खान, और स्वयं मुलायम सिंह यादव के परिवार के लोगों में उनके भाइयों रामगोपाल यादव और शिवपाल यादव फिर उसके बाद उनके पुत्र अखिलेश यादव के बढ़ रहे रुतबे ने समाजवादी पार्टी संस्थापकों में रहे बेनी बाबू को कहीं पीछे छूट जाने का दर्द दे दिया. हालाँकि मुलायम सरकार में बेनी वर्मा के बेटे और पहली बार विधायक बने राकेश वर्मा को कैबिनेट मंत्री का पद मिल गया, परन्तु यह सबकाफी कुछ वैसा नहीं रहा जैसा हो सकता था.
इस खटास के बीच ही बेनी वर्मा के राजनैतिक क्षेत्र बहराइच में 2005 एक क्षेत्रीय समाजवादी नेता की हत्या ने बेनी बाबू को राजनैतिक चुनौती दे दी. इस हत्याकांड हो अपनी प्रतिष्ठा से जोडते हुए बेनी प्रसाद वर्मा ने समाजवादी पार्टी से बहराइच सदर विधानसभा से विधायक और तत्कालीन मुलायम सरकार के काबिना श्रम मंत्री डॉ० वकार अहमद शाह पर इस हत्या में शामिल लोगो को बचाने के आरोप लगते हुए उन पर परोक्ष रूप से इसमें शामिल होने तक के आरोप लगाये. इस पहले आरोप के बाद शुरू हुए आरोपों और प्रत्यारोपों के सिलसिले ने एक लंबा समय लिया. इसी बीच राजनीति में अपने से काफी जूनियर श्रम मंत्री वक़ार अहमद शाह को उनके लगातार विरोध के बाद भी पार्टी से ना निकाले जाने और अन्य कई मुद्दों पर बढ़ रहे अपमान को महसूस करते हुए बेनी प्रसाद वर्मा ने बागी तेवर अपना लिए और अपने लिए नए ठिकाने और पानी ताकत को दिखाने के लिए समाजवादी क्रांति दल के नाम से एक नए राजनैतिक पार्टी का गठन किया.
उत्तर प्रदेश में पिछडों की राजनीति में यादव बिरादरी के 13% मतों के बाद 12% मत के साथ कुर्मी बिरादरी ही दूसरी सबसे बड़ी बिरादरी और राजनैतिक ताकत है. परन्तु जहाँ एक ओर यादवों के नेता के रूप में मुलायम सिंह यादव जाने जाते हैं वहीँ दूसरी ओर अभी तक कोई भी ऐसा बड़ा सर्वमान्य नाम सामने नहीं आ सका है जिसे कुर्मी बिरादरी का नेता माना जा सके. अपनी इसी कुर्मी बिरादरी की राजनैतिक शक्ति को साथ लेकर 2007 के विधानसभा चुनावों में बेनी प्रसाद वर्मा ने समाजवादी पार्टी के अपने करीबियों को तोड़कर बनाये गये समाजवादी क्रांति दल के साथ उतर गये. बेनी बाबू ने डॉ० वकार को हराने के लिए एक और पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान जिनका बहराइच की मुस्लिम राजनीति के साथ जिले के राजनैतिक धरातल पर अच्छी पकड़ के लिए जाने जाते हैं को भी अपने साथ लिया. आरिफ मोहम्मद खान की पत्नी रेशमा आरिफ को बहराइच विधानसभा से प्रत्याशी भी बनाया गया. इसी के साथ ही बेनी ने स्वयं फैजाबाद जनपद की अयोध्या विधानसभा से अपनी नई पार्टी से चुनाव भी लड़ा. परन्तु सारे प्रयत्नो के बेकार जाते हुए बेनी प्रसाद वर्मा का समाजवादी क्रांति दल पूरी तरह से इन चुनावों में हार गया. जिसमे स्वयं बेनी प्रसाद वर्मा और उनके पुत्र राकेश वर्मा तथा बहराइच से रेशमा आरिफ सहित सारे उम्मीदवार बुरी तरह से चुनाव हार गये. इस करारी हार के बाद राजनैतिक हलकों में बेनी प्रसाद वर्मा के राजनैतिक समाप्ति की भविष्यवाणी होने लगी और बेनी भी नेपथ्य में कहीं चले गये.
राजनीति के पुराने मंझे हुए खिलाड़ी बेनी प्रसाद वर्मा ने कुछ समय अज्ञातवास में रहने के उपरान्त अचानक ही कांग्रेस पार्टी में जाने का फैसला कर लिए. जीवन भर जिस कांग्रेस की राजनीति के खिलाफ खड़े रहे बेनी बाबू के कांग्रेस में जाने को लेकर काफी चर्चा भी हुई. कांग्रेस में शांत पड़े बेनी प्रसाद वर्मा को उनके मनमाफिक चुनाव क्षेत्र कैसरगंज की जगह जब कांग्रेस ने गोंडा लोकसभा से 2009 के लोकसभा चुनावों का प्रत्याशी बनाया तो भी उनके ना जीत पाने की चर्चा फैली. लेकिन कांग्रेस सर्कार द्वारा चुनाव से पूर्व हुई किसानो की ऋण माफ़ी और मनरेगा की लहर पर सवार होकर बेनी बाबू सहित आस पास के कई क्षेत्रों में कांग्रेसियों की जीत हुई. इसी जीत के बाद बेनी प्रसाद वर्मा की राजनीति की नई पारी शुरू हुई. उत्तर प्रदेश में वापसी का सपना देख रही कांग्रेस और उससे भी बढ़कर बिहार में राहुल गांधी की असफलता के बाद उनके राजनैतिक मैनेजरों ने बेनी प्रसाद वर्मा की उत्तर प्रदेश में अनुकूलता को अपनाने का दाँव खेला. इसी के साथ ही कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने बेनी वर्मा को अपने यू.पी. मिशन 2012 में पूरी तरह अपना लिया. जिसके साथ ही उन्हें पूर्व में मिले राज्यमंत्री के पद को बढाकर कैबिनेट तक पहुँचाया गया इसी के साथ उनका प्रवेश कांग्रेस वर्किंग कमिटी में भी हुआ.
राहुल गांधी के मिशन 2012 में प्रमुख रणनीतिकार बनकर उभरे बेनी प्रसाद वर्मा विभिन्न दलों में मौजूद अपने ताकतवर नेताओं को कांग्रेस में जोड़ा और इसके साथ ही उन्हें विधानसभा में उम्मीदवारी भी प्रदान कर दी गई. इन नेताओं के जीतने के जज्बे और हौंसले के साथ इस विधानसभा में कांग्रेस को सीटों की बढोत्तरी के रूप में दिलवाने का दावा भी राहुल के सामने आया. परन्तु ऐसा नहीं है की बेनी प्रसाद वर्मा के इस कदम का हर तरफ स्वागत हुआ. कांग्रेस पार्टी में जब राहुल गांधी ने अपनी नवंबर में दुसरे चरण की यात्रा शुरू की तो बाराबंकी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर और सिद्धार्थनगर तक हर जनपद की कई विधानसभाओं में पुराने या यूँ कहें जड़ से कांग्रेसी नेताओं ने राहुल की हर सभा के रास्ते और सभा मंच पर टिकट बंटवारे के खिलाफ प्रदर्शन किये. बहराइच में तत्कालीन कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने बेनी प्रसाद वर्मा पर तमाम आरोप भी लगाये थे जिसके चलते उन्हें बाद में पार्टी से निकाल भी दिया गया. इसी प्रकार बलरामपुर की उतरौला जनसभा में कार्यकताओं ने इतना विरोध किया कि बेनी प्रसाद वर्मा को मंच से उतरना ही पड़ा, उन्हें बोलने का मौका ही नहीं मिला. कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इस प्रकार का रोष आज भी बरकरार है और कई बार कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के समुख दिख भी चूका है. बेनी प्रसाद वर्मा के पूर्वी उत्तर प्रदेश में मिले अधिक प्रभाव से कई नेता जहाँ अंदर खाने में नाराज़ हैं वहीँ यह भी चर्चा है कि कही बेनी कांग्रेस का हाल अपने पुराने दल समाजवादी क्रांति दल के जैसे ना कर दें.
बहरहाल कुछ भी हो बेनी प्रसाद वर्मा पर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी का पूरा भरोसा दिख रहा है. कांग्रेस को इन विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत का दारोमदार तो है ही इसी के साथ ही बेनी पर कांग्रेसियों को खास तौर पर निचले कार्यकर्ताओं में विश्वास बढाने की जरूरत है. अन्यथा जिस तरह से कार्यकताओं की जगह बेनी के पसंद के लोगों कों पार्टी में प्राथमिकता दी जा रही है उससे कहीं कांग्रेस का बेनी प्रसाद वर्मा पर लगा यह दाँव उल्टा ही ना पड़ जाए.



