Thursday, February 16, 2012

कितना सफल हो सकता है कांग्रेस का यू.पी. में बेनी प्रसाद वर्मा पर लगा दाँव.


उत्तर प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस पार्टी के खोये वैभव को पाने के लिए कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी जबरदस्त चुनावी दौरों और एक ही दिन में कई कई जनसभाओं को संबोधित कर रहे हैं इसी के साथ ही वह अपने मंच पर तमाम नेताओं को लेकर दिखते हैं जिनके द्वारा चुनावों के समीकरण साधे जा सकते हैं. इन्ही दिखने वाले चेहरों में सबसे प्रमुख रूप से जिस नेता का नाम सामने आता है वह केंद्रीय इस्पात मंत्री और कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य बेनी प्रसाद वर्मा का नाम है. बेनी प्रसाद वर्मा पर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने इस 2012 के विधानसभा चुनावों में काफी ज्यादा विश्वास दिखा रहे हैं. राहुल गांधी की चुनाव यात्राओं के दौरान विशेष रूप से पूर्वांचल और अवध तथा बुंदेलखंड के इलाकों में बेनी प्रसाद वर्मा की मौजूदी आवश्यक रूप से बनी रहती है, साथ ही मंच से बेनी प्रसाद वर्मा के भाषणों और उनके सञ्चालन के तरीकों पर भी काफी छूट रहती है. कांग्रेस पार्टी के पूर्वांचल और अवध के इलाकों में चुनावों में उम्मीदवारों की घोषणा में बेनी प्रसाद वर्मा का पूरी तरह से प्रभाव बना रहा जिससे उनके मनपसंद लोगो को ही कांग्रेस का चुनावों में प्रत्याशी बनाया गया. टिकट बंटवारे में बेनी प्रसाद वर्मा के वर्चस्व के चलते पार्टी कार्यकर्ताओं का गुस्सा सडको और यहाँ तक की राहुल गांधी की सभाओं में भी खुलेआम हो चुका है.

समाजवादी पार्टी से बगावत करके और अपने स्वयं की पार्टी बनाकर 2007 के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह पराजित हो चूके बेनी प्रसाद वर्मा जो अपने समर्थकों में बेनी बाबू के नाम से प्रसिद्ध हैं, उन पर अब कांग्रेस को इस विधानसभा चुनाव में विजयश्री दिलाने और खास तौर पर राहुल गांधी के विश्वास की जबरदस्त जिम्मेदारी दिखाई पड़ रही है. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले बेनी प्रसाद वर्मा कांग्रेस ने अपनी राजनीति की शुरुआत ही कांग्रेस के एकछत्र राज्य के विरोध से जन्मी जयप्रकाश नारायण की राजनैतिक विचारधारा से की थी. कांग्रेस विरोध की इस विचारधारा को काफी समय तक संभाले रहने वाले बेनी बाबू ने 1974 से लेकर 1992 तक भारतीय क्रांति पार्टी, जनता पार्टी, भारतीय लोक दल, लोकदल और जनता दल तक सोशलिस्ट आंदोलनों के विभिन्न मंचों पर साथ रहे और यहीं उनकी दोस्ती पश्चिम उत्तर प्रदेश के एक और जमीन से जुड़े सोशलिस्ट नेता मुलायम सिंह यादव से हुई. जहाँ इन दोनों दोस्तों ने जनता दल और अन्य सोशलिस्ट दलों के लोगो के साथ मिलकर 1992 में समाजवादी पार्टी की नींव रखी और साथ इस नई पार्टी को सजाया और उत्तर प्रदेश की राजनीति में गर्म धर्म की राजनीति को अपने अनुकूल किया. 1974 से 1992 तक बेनी प्रसाद वर्मा उत्तर प्रदेश की विधानसभाओं के सदस्य रहे और इस बीच दो बार सोशलिस्ट सरकारों में मंत्री भी रहे. 1992 में मुलायम सिंह यादव के साथ अब्ने नए दल समाजवादी पार्टी के साथ बेनी बाबू ने मुलायम सिंह यादव के मुस्लिम यादव समीकरण को विस्तृत करते हुए पिछडों की अन्य जाति कुर्मी को भी इसमें जोड़ा.

बेनी प्रसाद वर्मा और मुलायम सिंह यादव की इस जोड़ी ने 1993-94 दलित वर्ग के दल के रूप में उभरी बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर प्रदेश में गैर बीजेपी की सरकार बनाई और हिन्दुत्ववादी राजनीती के दुसरे विकल्प बने. इस सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे बेनी प्रसाद वर्मा पर तब तक क्षेत्रवाद के आरोप लगने लगे और लोक निर्माण मंत्री रहते हुए प्रदेश के सड़कों के अधिकतर पैसे को अपने गृह जनपद और चुनाव क्षेत्र बाराबंकी में सडको के जाल बिछाने के लिए लगाने का आरोप लगा और अपने क्षेत्र को प्रदेश से ऊपर मानने के आरोप में वह घिर गये. इसके बाद तो प्रदेश की राजनीति से ऊपर देश की राजनीति की ओर बढ़ रही समाजवादी पार्टी के केन्द्रीय चेहरे के रूप में बेनी प्रसाद वर्मा ने 1996 में बहराइच जनपद की कैसरगंज लोकसभा से चुनाव जीतकर 11 वी लोकसभा में पहुँच गये. जहाँ कांग्रेस की खराब हालत ने गठबंधन और कई छोटे बड़े दलों के साथ मिलकर सरकार बनी जिसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था. यह वह दौर था जब 1991 से गाँधी परिवार कांग्रेस से दूर हो गया था. इस बीच दो बार प्रधानमंत्री बदले जाने और कुल दो साल चली इस लोकसभा में बेनी प्रसाद वर्मा ने कई मंत्रालयों के साथ ही केन्द्रीय कैबिनेट संचार मंत्री का भी पद संभाला. जिसके बाद उन्होंने अपने क्षेत्र कैसरगंज और बाराबनी कन्पद में संचार सुविधाओं का जल बिछा दिया. 1998 में सरकार गिरने और मध्यावधि चुनाव के बाद भले ही बेनी प्रसाद वर्मा दुबारा मंत्री नहीं बन पाए, लेकिन वह लगातार 1998 से 2004 तक 12 वीं, 13 वीं और 14 वीं लोकसभा में समाजवादी पार्टी से कैसरगंज लोकसभा से चुने जाते रहे. इस दौर में बेनी प्रसाद वर्मा की भूमिका बहुत हद सीमित हो चुकी थी या यूँ कहें की उन्होंने स्वयं को बाराबंकी और बहराइच के बीच ही सीमित कर लिया था.

बेनी बाबू की राजनीती में सबसे बड़ा बदलाव 1993-94 के बाद 2004 में दुबारा मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव और दूसरी बार प्रदेश की सत्ता में आई समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान आया. इसी सरकार के दौरान पुराने दोस्तों मुलायम और बेनी के रिश्ते में खटास आने लगी और मुखर राजनीति से दूर हो चुके बेनी प्रसाद वर्मा को समाजवादी पार्टी में उनसे काफी बाद में प्रवेश पाए लोगों के बड़े नेताओं के बढते कद और अपने को पीछे छूटने के फर्क ने बेनी बाबू और समाजवादी पार्टी में दरार को बढाने में भूमिका निभाई. अमर सिंह, आज़म खान, और स्वयं मुलायम सिंह यादव के परिवार के लोगों में उनके भाइयों रामगोपाल यादव और शिवपाल यादव फिर उसके बाद उनके पुत्र अखिलेश यादव के बढ़ रहे रुतबे ने समाजवादी पार्टी संस्थापकों में रहे बेनी बाबू को कहीं पीछे छूट जाने का दर्द दे दिया. हालाँकि मुलायम सरकार में बेनी वर्मा के बेटे और पहली बार विधायक बने राकेश वर्मा को कैबिनेट मंत्री का पद मिल गया, परन्तु यह सबकाफी कुछ वैसा नहीं रहा जैसा हो सकता था.

इस खटास के बीच ही बेनी वर्मा के राजनैतिक क्षेत्र बहराइच में 2005 एक क्षेत्रीय समाजवादी नेता की हत्या ने बेनी बाबू को राजनैतिक चुनौती दे दी. इस हत्याकांड हो अपनी प्रतिष्ठा से जोडते हुए बेनी प्रसाद वर्मा ने समाजवादी पार्टी से बहराइच सदर विधानसभा से विधायक और तत्कालीन मुलायम सरकार के काबिना श्रम मंत्री डॉ० वकार अहमद शाह पर इस हत्या में शामिल लोगो को बचाने के आरोप लगते हुए उन पर परोक्ष रूप से इसमें शामिल होने तक के आरोप लगाये. इस पहले आरोप के बाद शुरू हुए आरोपों और प्रत्यारोपों के सिलसिले ने एक लंबा समय लिया. इसी बीच राजनीति में अपने से काफी जूनियर श्रम मंत्री वक़ार अहमद शाह को उनके लगातार विरोध के बाद भी पार्टी से ना निकाले जाने और अन्य कई मुद्दों पर बढ़ रहे अपमान को महसूस करते हुए बेनी प्रसाद वर्मा ने बागी तेवर अपना लिए और अपने लिए नए ठिकाने और पानी ताकत को दिखाने के लिए समाजवादी क्रांति दल के नाम से एक नए राजनैतिक पार्टी का गठन किया.

उत्तर प्रदेश में पिछडों की राजनीति में यादव बिरादरी के 13% मतों के बाद 12% मत के साथ कुर्मी बिरादरी ही दूसरी सबसे बड़ी बिरादरी और राजनैतिक ताकत है. परन्तु जहाँ एक ओर यादवों के नेता के रूप में मुलायम सिंह यादव जाने जाते हैं वहीँ दूसरी ओर अभी तक कोई भी ऐसा बड़ा सर्वमान्य नाम सामने नहीं आ सका है जिसे कुर्मी बिरादरी का नेता माना जा सके. अपनी इसी कुर्मी बिरादरी की राजनैतिक शक्ति को साथ लेकर 2007 के विधानसभा चुनावों में बेनी प्रसाद वर्मा ने समाजवादी पार्टी के अपने करीबियों को तोड़कर बनाये गये समाजवादी क्रांति दल के साथ उतर गये. बेनी बाबू ने डॉ० वकार को हराने के लिए एक और पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान जिनका बहराइच की मुस्लिम राजनीति के साथ जिले के राजनैतिक धरातल पर अच्छी पकड़ के लिए जाने जाते हैं को भी अपने साथ लिया. आरिफ मोहम्मद खान की पत्नी रेशमा आरिफ को बहराइच विधानसभा से प्रत्याशी भी बनाया गया. इसी के साथ ही बेनी ने स्वयं फैजाबाद जनपद की अयोध्या विधानसभा से अपनी नई पार्टी से चुनाव भी लड़ा. परन्तु सारे प्रयत्नो के बेकार जाते हुए बेनी प्रसाद वर्मा का समाजवादी क्रांति दल पूरी तरह से इन चुनावों में हार गया. जिसमे स्वयं बेनी प्रसाद वर्मा और उनके पुत्र राकेश वर्मा तथा बहराइच से रेशमा आरिफ सहित सारे उम्मीदवार बुरी तरह से चुनाव हार गये. इस करारी हार के बाद राजनैतिक हलकों में बेनी प्रसाद वर्मा के राजनैतिक समाप्ति की भविष्यवाणी होने लगी और बेनी भी नेपथ्य में कहीं चले गये.

राजनीति के पुराने मंझे हुए खिलाड़ी बेनी प्रसाद वर्मा ने कुछ समय अज्ञातवास में रहने के उपरान्त अचानक ही कांग्रेस पार्टी में जाने का फैसला कर लिए. जीवन भर जिस कांग्रेस की राजनीति के खिलाफ खड़े रहे बेनी बाबू के कांग्रेस में जाने को लेकर काफी चर्चा भी हुई. कांग्रेस में शांत पड़े बेनी प्रसाद वर्मा को उनके मनमाफिक चुनाव क्षेत्र कैसरगंज की जगह जब कांग्रेस ने गोंडा लोकसभा से 2009 के लोकसभा चुनावों का प्रत्याशी बनाया तो भी उनके ना जीत पाने की चर्चा फैली. लेकिन कांग्रेस सर्कार द्वारा चुनाव से पूर्व हुई किसानो की ऋण माफ़ी और मनरेगा की लहर पर सवार होकर बेनी बाबू सहित आस पास के कई क्षेत्रों में कांग्रेसियों की जीत हुई. इसी जीत के बाद बेनी प्रसाद वर्मा की राजनीति की नई पारी शुरू हुई. उत्तर प्रदेश में वापसी का सपना देख रही कांग्रेस और उससे भी बढ़कर बिहार में राहुल गांधी की असफलता के बाद उनके राजनैतिक मैनेजरों ने बेनी प्रसाद वर्मा की उत्तर प्रदेश में अनुकूलता को अपनाने का दाँव खेला. इसी के साथ ही कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने बेनी वर्मा को अपने यू.पी. मिशन 2012 में पूरी तरह अपना लिया. जिसके साथ ही उन्हें पूर्व में मिले राज्यमंत्री के पद को बढाकर कैबिनेट तक पहुँचाया गया इसी के साथ उनका प्रवेश कांग्रेस वर्किंग कमिटी में भी हुआ.

राहुल गांधी के मिशन 2012 में प्रमुख रणनीतिकार बनकर उभरे बेनी प्रसाद वर्मा विभिन्न दलों में मौजूद अपने ताकतवर नेताओं को कांग्रेस में जोड़ा और इसके साथ ही उन्हें विधानसभा में उम्मीदवारी भी प्रदान कर दी गई. इन नेताओं के जीतने के जज्बे और हौंसले के साथ इस विधानसभा में कांग्रेस को सीटों की बढोत्तरी के रूप में दिलवाने का दावा भी राहुल के सामने आया. परन्तु ऐसा नहीं है की बेनी प्रसाद वर्मा के इस कदम का हर तरफ स्वागत हुआ. कांग्रेस पार्टी में जब राहुल गांधी ने अपनी नवंबर में दुसरे चरण की यात्रा शुरू की तो बाराबंकी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर और सिद्धार्थनगर तक हर जनपद की कई विधानसभाओं में पुराने या यूँ कहें जड़ से कांग्रेसी नेताओं ने राहुल की हर सभा के रास्ते और सभा मंच पर टिकट बंटवारे के खिलाफ प्रदर्शन किये. बहराइच में तत्कालीन कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने बेनी प्रसाद वर्मा पर तमाम आरोप भी लगाये थे जिसके चलते उन्हें बाद में पार्टी से निकाल भी दिया गया. इसी प्रकार बलरामपुर की उतरौला जनसभा में कार्यकताओं ने इतना विरोध किया कि बेनी प्रसाद वर्मा को मंच से उतरना ही पड़ा, उन्हें बोलने का मौका ही नहीं मिला. कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इस प्रकार का रोष आज भी बरकरार है और कई बार कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के समुख दिख भी चूका है. बेनी प्रसाद वर्मा के पूर्वी उत्तर प्रदेश में मिले अधिक प्रभाव से कई नेता जहाँ अंदर खाने में नाराज़ हैं वहीँ यह भी चर्चा है कि कही बेनी कांग्रेस का हाल अपने पुराने दल समाजवादी क्रांति दल के जैसे ना कर दें.

बहरहाल कुछ भी हो बेनी प्रसाद वर्मा पर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी का पूरा भरोसा दिख रहा है. कांग्रेस को इन विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत का दारोमदार तो है ही इसी के साथ ही बेनी पर कांग्रेसियों को खास तौर पर निचले कार्यकर्ताओं में विश्वास बढाने की जरूरत है. अन्यथा जिस तरह से कार्यकताओं की जगह बेनी के पसंद के लोगों कों पार्टी में प्राथमिकता दी जा रही है उससे कहीं कांग्रेस का बेनी प्रसाद वर्मा पर लगा यह दाँव उल्टा ही ना पड़ जाए.

Sunday, November 6, 2011

अन्तराष्ट्रीय परिदृश्य पर राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण हो रहे नेपाल के तराई के जिलों में दूतावासों के द्वारा शुरू हो रहा है राजनैतिक खेल।

इसी वर्ष नेपाल के तराई के ही जिले के एक कार्यक्रम में पूर्व
भारतीय राजदूत को दिखाए गए थे काले झंडे। साथ ही कुछ
दिन पूर्व ही अमेरिकी दूतावास के प्रमुख सुरक्षा अधिकारी ने इसी
इलाके का किया था दौरा।

नेपाल की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले तराई के इलाके के प्रमुख जिलेबांके के जिला मुख्यालय और मध्य-पश्चिम नेपाल के प्रमुख शहर नेपालगंज में 2 नवंबर बुधवार को आयोजितएक कार्यक्रम में नेपाल में भारत के राजदूत जयंत प्रसाद मुख्य अथिति के रूप में शामिलहुए थे। इस कार्यक्रम का आयोजन नेपाल पत्रकार महासंघ ने किया था। इस कार्यक्रम मेंभारतीय राजदूत जयंत प्रसाद ने धम्बोजी हाई स्कूल नाम के एक विद्यालय का उदघाटन भी कियाऔर साथ ही नेपाल पत्रकार महासंघ के सेमीनार को भी संबोधित किया। यह सारा कार्यक्रमउत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद से लगने वाली भारत-नेपाल सीमा से के करीब हुआ था। अपनेसंबोधन में श्री प्रसाद ने भारत और नेपाल के अटूट संबंधो के बारे में बताया और कहाकि भारत नेपाल के सम्बन्ध छोटे छोटे विवादों से नहीं बिगड सकते हैं। श्री प्रसाद नेनेपाल के प्रधानमंत्री की हाल में हुई आधिकारिक भारत यात्रा को भी सफल बताते हुए कहाकि प्रधानमन्त्री डॉ० बाबुराम भट्टाराई की इस यात्रा से न केवल पूर्ण रूप से सफल रहीवहीँ इस यात्रा ने संबंधो के नए द्वार भी खोले हैं। श्री प्रसाद ने नेपाली प्रधानमंत्रीके भारत दौरे पर किये गए समझौतों को लेकर नेपाल के माओवादी राजनैतिक गलियारों में होरही हलचल पर भी इशारा करते हुए कहा कि कुछ छोटी छोटी राजनैतिक बातें भारत-नेपाल संबंधोपर असर नहीं डाल सकता है।

नेपाल में भारत के राजदूत के इस तराई के इलाके में दौरे को काफी महत्वपूर्ण मानाजा रहा है और इसके कई अन्य निहितार्थ भी निकाले जा रहे हैं। गौरतलब है कि इसी वर्ष29 मार्च नेपालके तराई के ही जिले और इसी बांके जनपद के बगल के जिले बर्दिया में हुए कार्यक्रम मेंनेपाल में पूर्व भारतीय राजदूत राकेश सूद को नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) केकार्यकर्ताओं ने काले झंडे दिखाए थे। जबकि इस बार भारतीय राजदूत का सम्मान हुआ यह तबहुआ जब नेपाल पत्रकार महासंघ में माओवादी समर्थकों का दबदबा इस चुनाव से हो चुका है।भारत के राजदूत के तराई में हुए इस दौरे के इस बात में भी खास मायने निकाले जा रहेहै कि अभी कुछ ही दिन पूर्व अमेरिका के विदेश मंत्रालय के कूटनीतिक सुरक्षा विभाग केसुरक्षा अधिकारी केन्ट पी जॉन ने अपने कई अन्य साथियों के दल के साथ इसी इलाके मेंनेपाली अधिकारियों से मुलाकात की थी। अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों ने नेपाल के अधिकारियोंसे बात करके तराई में सुरक्षा गतिविधियों के हाल चाल लिए थे। गौरतलब है कि नेपाल कीतराई के 25 में से 22 जिले भारत के साथ सीमा का साझा करते हैं। इसी को लेकर अमेरिकी विदेश मंत्रालयके कर्मचारियों की गतिविधि के प्रतिउत्तर में भारतीय राजदूत का दौरा देखा जा रहा है।

भारत और चीन के मध्य बफर स्टेट के रूप में स्थित नेपाल के राजनैतिक हालात लगातारमहत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। एशिया की दो बड़ी आर्थिक और सामरिक महाशक्तियों भारत औरचीन के बीच पहले से नेपाल में प्रभाव जमाने की होड के बीच चीन के बढते प्रभाव के मद्देनजरअमेरिका ने भी नेपाल में अपनी पैनी नजर गडा दी है। जिससे भारत और नेपाल के बीच पुरानेरिश्तों से इतर अब नए तरीकों से संतुलन साधने की जरूरत समझी जा रही है। इसी को देखतेहुए नेपाल के तराई के यह इलाके जो मधेशी समुदाय के बाहुल्य के इलाके हैं। यहाँ इस प्रकारके दौरों के द्वारा कई नए समीकरण बनने और बनाने की कोशिश शुरू हो चुकी है।

Sunday, September 4, 2011

नेपाल की सत्ता पर एक बार फिर पहुँचे पूर्व माओवादी सैन्य कमांडर।


भारत के पडोसी और सबसे करीबी मित्र देश नेपाल में रविवार 28 अगस्त को डॉ० बाबुराम भट्टराई ने प्रधान मंत्री पद की शपथ ली. डॉ० भट्टराई के प्रधान मंत्री बनने के साथ ही नेपाल के राजनैतिक इतिहास में दूसरी बार किसी माओवादी नेता की ताजपोशी हुई है। डॉ भट्टराई भारत के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रह चुके हैं. जिससे भारत-नेपाल के लगातार तल्ख हो रहे रिश्ते और इसके पीछे मौजूद चीन की साये के मद्देनजर उनका प्रधान मंत्री बनना बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. डॉ० बाबुराम भट्टराई एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए थे. जिन्हें नेपाल की अधिकतर पार्टियों और यहाँ तक मधेशी दलों का भी पूरा समर्थन मिला. उन्हें मिले समर्थन के आधार पर उन्होंने नेपाल संसद में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी नेपाली कांग्रेस के नेता रामचन्द्र पौड्याल को 105 वोटों से हरा दिया. डॉ० बाबुराम भट्टराई को 594 सदस्य वाली नेपाली संसद में 340 सांसदों का समर्थन प्राप्त हुआ.

25 अप्रैल 2005 के बाद जब माओवादियों ने नेपाल में 200 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही की समाप्ति के बाद अपने हथियार रखकर चुनाव प्रक्रिया को अपनाया था, तब से यह दूसरा मौका है जब किसी पूर्व माओवादी सैन्य कमांडर ने प्रधानमंत्री का पद प्राप्त किया है. डॉ० बाबुराम भट्टराई से पूर्व नेपाली माओवादी के सुप्रीम कमांडर पुष्प कमल दहल प्रचंड भी नेपाल के प्रधानमंत्री बन चुके हैं. प्रचंड के कार्यकाल से ही माओवादियों और नेपाल के अन्य राजनैतिक दलों में सत्ता को लेकर खींचतान जारी थी. नेपाल में राजशाही के समाप्ति होने के बाद से ही नए गणतांत्रिक संविधान और स्थायी सरकार के निर्माण को लेकर अन्तर्विरोध जारी रहे हैं. जून में हुई संविधान सभा की बैठक के बाद 3 महीने का समय निर्धारित किया गया था जिसमे सरकार की स्थापना और संविधान के पहले मसौदे को पेश करने की सहमति बनी थी. अब आम सहमति से सरकार के गठन हो जाने के कारण नेपाल की नई सरकार और प्रधानमंत्री की पहली परीक्षा अब संविधान के निर्माण को लेकर ही होगी.

नेपाल के सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस बार वहां हुए चुनावों में भारत की भूमिका बिलकुल शून्य ही रही. जिसका कारण भारत में अन्ना हजारे के अनशन को माना जा रहा है. देश में मचे हल्ले के कारण भारत का नेपाल में प्रधानमंत्री चुनाव में कोई खास ध्यान नहीं रह पाया. नेपाल में नवनियुक्त भारत के राजदूत जयंत प्रसाद प्रधानमंत्री चुनाव से मात्र 4 दिन पूर्व ही नेपाल पहुंचे थे. जिससे कारण वह कुछ खास करने में असफल रहे. नेपाल के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार भारत की और से पहली पसंद नेपाली कांग्रेस के नेता और प्रधानमंत्री पद के दावेदार रामचन्द्र पौड्याल थे. जयंत प्रसाद इस बार भारत की और से खास माने जाने वाले मधेशी दलों को भी ठीक से नियंत्रित कर पाए और मधेशी दलों ने इस बार एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) का साथ दिया जिससे डॉ० बाबुराम भट्टराई का प्रधान मंत्री बनना तय हुआ. नेपाल के चुनावों में मिली जीत के साथ ही इस माओवादी अग्रणी सरकार में मधेशी दलों को पूरा साथ लिया गया है. मधेशी लोकतांत्रिक फोरम जो तराई के मधेशी दलों का एक प्रमुख संगठन हैं. उसके नेता विजय कुमार गच्छदर को प्रधानमंत्री के साथ ही उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री की शपथ दिलाकर माओवादियों ने भारत के राजनैतिक रसूख को एक बड़ा झटका दिया है.

गौरतलब है विजय कुमार गच्छदर ने पिछली बार प्रधानमंत्री पद की दावेदारी भी पेश कर दी थी. जिसके पीछे नेपाल में यह चर्चा जोर पकड़ रही थी कि यह सब भारत के इशारे पर हुआ था. परन्तु इस बार सारी उम्मीदों को किनारे करते हुए माओवादियों से हमेशा विरोध की राजनीति करने वाले लोकतांत्रिक मधेशी फोरम के नेताओं ने इस चुनाव में एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) का साथ दिया. मधेशी दलों के इस रूख ने नेपाल में सकारात्मक इशारा किया है. मधेशी दलों के इस प्रकार साथ आने को लेकर नेपाल के धडों में यह माना जा रहा हैं कि भारत का नेपाल पर प्रभाव कम हुआ है.

नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद भी डॉ० भट्टराई अपनी गाडी स्वयं ही चलाकर ले गए जिससे नेपाल के हलकों में उनकी साम्यवादी सोच के स्पष्ट झलक मिल गई. डॉ० भट्टराई और माओवादी सुप्रीम कमांडर प्रचंड के बीच पिछले कुछ दिनों में एक शीत युद्ध जारी था. जिसका असर एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के द्वारा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार चुने जाने पर भी दिखा. परन्तु एन मौके पर पार्टी के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों ने डॉ० भट्टराई का समर्थन कर उनकी राह आसान कर दी. पार्टी के अंदरूनी हल्कों में और डॉ० भट्टराई के बीच का विवाद समर्थकों और जनता के बीच भी आ चुका है. डॉ० भट्टराई नेपाल में एक निष्पक्ष राष्ट्रवादी के तौर पर देखे जाते हैं. जिनका मुख्य ध्येय नेपाल का विकास और संरक्षण करना माना जा रहा है. नेपाल में प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी डॉ० भट्टराई के लिए आसान नहीं होगी. खास तौर पर तब जब एशिया की दो बड़ी महाशक्तियां भारत और चीन नेपाल में अपने प्रभावों के संवर्धन में लगी हैं. वहीं एशिया में अपने शक्तिसंतुलन के लिए छटपटा रहे अमेरिका का भी नेपाल में बढ़ता रुझान भी कुछ और परिस्थितियां खड़ी कर सकती है. अब नेपाल के नए भविष्य के लिए प्रतीक्षा करने होगी.


यह न्यूज़ श्री प्रभात रंजन दीन के निर्देशन में साप्ताहिक अखबार "कैनविज़ टाइम्स" में छप चुकी है.


Saturday, August 20, 2011

इस आंदोलनकारी लोकपाल में क्यों हैं कुछ खास तंत्रों को छूट?


अन्ना हजारे अपने लोकपाल को देश में उसी रूप से लागू करवाने के लिए अनशन कर रहें हैं जिस रूप या मसौदे के साथ उनके साथियों की टीम ने इसे बनाया है. इस लोकपाल बिल में जहां पटवारी से लेकर प्रधानमंत्री तक और दफ्तरों से लेकर न्यायपालिका तक सबको इस दायरे में लाने की बात कहकर इसका प्रचार किया जा रहा है. वहीं इस पर एक प्रश्न उठता है कि इन सबके बीच अन्ना के लोकपाल में एनजीओ, कारपोरेट निजी क्षेत्र और मीडिया को क्यों बाहर रखा गया है? लोकतंत्र में सबसे बड़ी अवधारणा विधाईका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की होती है. यानी जब लोकतंत्र के यह सारे तंत्र अन्ना के जनलोकपाल के सामने हाथ बांधे खड़े होंगे, उस समय यह तीन यानी एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया ही किस हैसियत से हाथ खोलकर अछूती रहेगी?

अन्ना हजारे के पहले अनशन के बाद जब सिविल सोसाइटी यानी जनसाधारण के प्रतिनिधि चुनने की बात आई तो अन्ना के पांच साथियों ने स्वयं को ही चुना. यानी एक तरह से लोग जबरदस्ती भारत की जनता के मनमाने प्रतिनिधि हो गए. इन लोगो ने सरकार के साथ बैठके की और लोकपाल को अंतिम रूप देने की तैयारी की खबरे आम हो गई. जब सब कुछ चल रहा था, तभी अचानक प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाये जाने के लिए सरकार और तथाकथित सिविल सोसाइटी के सदस्यों के बीच खींच तान शुरू हो गई. बहस तो न्यायपालिका के लोकपाल के दायरे में लाए जाने की बात को भी लेकर उठी थी लेकिन फिर सारा मामला प्रधानमंत्री को लोकपाल यानी टीम अन्ना वाले जनलोकपाल के दायरे में लाये जाने पर आकर रुक गई. टीम अन्ना के लोग इस बात पर हल्ला मचाने लगे की हम प्रधानमन्त्री को लोकपाल के दायरे में जरूर लायेंगे. वह लोग बताने लगे की अगर प्रधानमन्त्री इस दायरे में नहीं आये तो भ्रष्टाचार को नहीं रोका जा सकता. यानी सारा बवाल पूरे लोकतंत्र के हर हिस्से को लोकपाल के सामने झुकाने के मुद्दे पर फ़ैल गया.

अब सवाल यह उठता है कि जब जनतंत्र में विधाईका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी मूल व्यवस्था टीम अन्ना के लोकपाल के सामने झुक सकती है. तब इस लोकपाल के दायरे से इन तीन तत्वों एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया को दूर क्यों रखा गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि जब देश के सारे न्यूज़ चैनल इस टीम अन्ना के आंदोलन के भोंपू बनकर हर बात की कवरेज कर रहें हैं. तब उन लोगो ने इस प्रश्न को क्यों नहीं चर्चा या परिचर्चा में उठाया है. या इस बात को जानबूझ बाहर नहीं आने देने के पीछे क्या कुछ निहित स्वार्थ हो सकते हैं?

अगर अन्ना के इस अनशन को शुरू से देखा जाए तो यह पूरा आंदोलन ही अपनी-अपनी एनजीओ चलाने वाले लोगों ने प्रस्तावित किया है. साथ ही इसके जो भी मुख्य चेहरे हैं वह एनजीओ के ही कर्ता-धर्ता हैं. यानी इस सारे हल्ले के जन्म दाता. इस अनशन या आंदोलन जो भी कहा जाए उसको जितने भव्य और आधुनिक रूप से चलाया जा रहा है उसके लिए पैसे दान के रूप में विभिन्न कंपनियों के द्वारा मिल रहें हैं. जिंदल और जे.के. जैसे बड़े व्यापारिक घराने और सीआईआई तथा फिक्की जैसे बड़े व्यापारिक संगठन खुले हाथ से पैसे दान के रूप में इस पूरे कार्यक्रम को दे रहे हैं. इन पैसों से अन्ना के कार्यक्रम स्थल पर पंडाल, डीजे म्यूजिक और साथं ही अन्ना और उनके साथियों के पीने के लिए हाई क्लास ग्लूकोज और सेलाइन वाटर का इंतज़ाम हो रहा है. कारपोरेट सेक्टर जो अधिकतर स्वयं भ्रष्टाचार का पोषक है और पुराने मामलों को छोडकर केवल अभी हाल में ही हुए टू जी घोटाले को देखें तो पता चलेगा इसमें फंसने वाले अधिकतर लोग और कंपनियां कारपोरेट सेक्टर के ही थे. यानी भ्रष्ट तंत्र के लोग भ्रष्टाचार मिटाने के अभियान को चलाने के लिए पैसे दे रहे हैं, बात कुछ समझ में नहीं बैठती है कि ऐसा वह क्यों करेंगे. अब अगर मीडिया को देखा जाए तो वह भी आर्थिक भ्रष्टाचार की तरह समाचार भ्रष्टाचार से पीड़ित दिखती है. किसी भी दर्शक को अन्ना-अन्ना के जाप के अलावा मीडिया ना तो कुछ भी दिखाना चाहती है और ना ही मनवाना. मीडिया के हर रिपोर्टर और प्रस्तुतिकर्ता की कोशिश यही है की हर दर्शक के मन में केवल अन्ना भर दिया जाए. आज हर चैनल और रिपोर्टर खबर की जगह अन्ना के कार्यकर्ता बनकर प्रचार प्रसार कर रहा है. इस तरह मीडिया केवल इस टीम अन्ना के आंदोलन के प्रचार प्रसार में जी जान से जुटी है.

इस प्रकार अगर देखा जाए तो टीम अन्ना के आंदोलन को इतना बड़ा करने में एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया का ही सबसे अहम रोल है. सिविल सोसाइटी के सदस्य और अन्ना के अन्य साथी एनजीओ के कर्ता धर्ता हैं और अब कारपोरेट और मीडिया के सहारे यह लोग देश में इतने बड़े कद के हो गए हैं की यह लोग प्रधानमंत्री और देश की चुनी सरकार के साथ संसद को भी किनारा करते हुए गैर संवैधानिक तरीके अपने कानून को लादना चाहते हैं. तो ऐसे में यह सवाल उठाना आवश्यक है कि क्या अन्ना के इस लोकपाल अनशन में एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया के योगदान के मुआवजे में उन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया है?

भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में कानून बनाने की संसदीय और संवैधनिक प्रक्रिया को एक तथाकथित जन उन्माद के सामने ध्वस्त कर देना क्या उचित होगा. वह भी तब जब इन लोगो की मंशा केवल लोकतंत्र को बंधक बनाने की हो. अगर इन लोगो की मंशा साफ़ होती तो इन लोगो ने केवल अपने समर्थन के नाते एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया जैसे तत्वों को बाहर नहीं किया होता.

आज यह अनशन वाले लोग अपने को इतना बड़ा मान चुके हैं की चुनी हुई सरकारों के औचित्य पर ही प्रश्न उठा देते हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के भाषण के मंच से एक एनजीओ वाले आंदोलन के कार्यकर्ता कहते हैं पटना के गलियों से आवाज़ आती है भैंस, बकरी चराने वाले सरकार चला रहे हैं, और इसी तरह अन्य लोग जगह-जगह कहते हैं की यहाँ तो चुनाव पैसे से जीते जाते हैं. इस तरह के शब्द क्या लोकतंत्र के लिए घातक नहीं है? क्या आज कमजोर वर्ग के लोगों को सरकार में बैठने का हक नहीं है? क्या इनकी नज़र में हर आम भारतीय वोटर घूसखोर है?

अन्ना के इस आंदोलन में मिल रहे जनतंत्र को पंगु बनाने के समर्थन पर सिर्फ एक सवाल उठता है. जब लोकतंत्र के सारे अंग लोकपाल के सामने झुक सकते हैं, तो क्यों केवल एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया को ही इन आदोलन वालों ने दूर रखा है? क्या कुछ छुपा हुआ मुद्दा भी है क्या इसके पीछे?

अन्ना के समर्थक या अन्नाई वैचारिक आतंकवादी.


अन्ना हजारे के आंदोलन के कई समर्थक हैं. यह समर्थक अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने के साथ-साथ अन्ना के आंदोलन के सम्बन्ध में किया जा रहे किसी भी सवाल या विचारक वाद-विवाद को रोकने के लिए भी तत्पर हो गए हैं. कहीं किसी भी मंच पर अगर चाहें वह फेसबुक, ब्लॉग या किसी भी वेबसाईट जैसे वर्चुअल मंच हो या ग़ली कूचे पर अन्ना के आंदोलन के विरुद्ध कोई भी लोकतांत्रिक टिपण्णी होते ही अन्नावादियों का पूरा हुजूम व्यक्तिगत गाली गलौज पर उतर आता है. अन्ना के आंदोलन जिसके उद्देश्य क्या हैं इसी पर संशय बरकरार है. पहला सवाल ही यही उठता है कि अन्ना अपने एनजीओ वाले मित्रों के लोकपाल को असंसदीय और अलोकतान्त्रिक तरीके से देश पर थोपना चाहते हैं. क्योंकि कानून बनाने का अधिकार सिर्फ संवैधानिक व्यवस्था में संसद के पास होता है. तो यह आंदोलन देश विरोधी है या देश हित में यह एक सवाल उठता है. जब इस आंदोलन पर इतना बड़ा सवाल खड़ा है. तब कैसे कोई कह सकता है कि अन्ना का आन्दोलन लोकतान्त्रिक है.

अन्ना हजारे लोकतांत्रिक भारत देश में अनशन कर रहें हैं. इस अनशन के लिए जगह और अनुमति ना देने को लेकर सरकार पर छींटाकशी हो रही है. कोई इसे लोकतंत्र के विरोधी बता रहा है, तो कोई कुछ और कह रहा है. हर और लोकतंत्र की दुहाई अन्ना के समर्थक दे रहे हैं. लोकतंत्र का सबसे बुनियादी हक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या अपनी बात कहने का हक होता है. इसी हक के तहत आंदोलन वगैरह भी किये जाते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जरिये ही हम किसी भी ऐसे मुद्दे या आंदोलन पर भी सवाल कर सकते हैं जो जन आंदोलन की शक्ल में किया जा रहा हो. इस प्रकार के सवालों को लोकतंत्र में आवश्यक माना जाता है. परन्तु तानाशाही में इस प्रकार के प्रश्नोत्तर अवैध या अराजक होते हैं. इसी प्रकार तानाशाही अराजकता की तरह अन्नावादियों जो आतंकवादियों की तरह ही वैचारिक आतंक फैलाने में जुटे गए, अन्ना के आंदोलन पर सवाल करने वालों को यह लोग हर तरीके से समूह में डराने में जुटे हैं.

अन्ना के आंदोलन के निहितार्थ जानने की चेष्टा या कोई वैचारिक बात रखने पर सबसे पहले सवाल करने वाले को भ्रष्ट और कांग्रेस का चमचा घोषित कर दिया जाता है. कुछ लोग तो और बढ़कर कहते हैं की जो अन्ना के साथ नहीं हैं वह भाड़ में जाएँ. इस तरह कि स्वम्भू आताताई टिपण्णी करके यह अन्नावादी क्या साबित करना चाहते हैं कि हर कोई उनके साथ है, और जो नहीं है उसे हम कुचल देंगे. गांधी और गांधीवाद से तुलना करके खुश होने वाले अन्नाई, अपने द्वारा लोगो पर लगाये जा रहे वैचारिक प्रतिबंधो को किस श्रेणी में रखेंगे. क्या यह हिंसा नहीं है? कोई व्यक्ति आवाज़ ना उठा सके क्या यह तानाशाह प्रकार का तांडव नहीं है.

पिछले दो दिन से देश के हर न्यूज़ चैनल पर अन्ना और उनके आंदोलन को लेकर कवरेज की ऐसी होड मची है कि अब टीवी देखने का मन ही नहीं कर रहा है. न्यूज़ चैनलों के लिए क्या देश में बलात्कार बंद हो गए जिसको लेकर कुछ दिन पहले तक वह होड मचाये हुए थे.देश में किसी जगह कोई हत्या नहीं हो रही है. हर चैनल के अन्ना-अन्ना ऐसा परोस रहा है जैसे पत्रकार ना होकर अन्ना के पीआर एजेंट हो गए हैं. अगर अन्ना के द्वारा देश में अपना कानून लाये जाने पर न्यूज़ चैनल इतना सपोर्ट कर रहें हैं तो क्यों नहीं मणिपुर की इरोम शर्मीला चानू के आंदोलन को सपोर्ट करते हैं. समाचार दिखाने का दावा करने वाले चैनल अब समर्थक की भूमिका में आ चुके हैं. वह देश में अन्नाई को इतना भड़का रहें हैं कि वह लोग अपने आप को हर तंत्र और हर प्रश्न से ऊपर मानने लगे हैं. हर बात का जवाब अन्ना अन्ना करके देते हैं. सरकार को भ्रष्ट कहते हैं परन्तु जब इन चैनलों से पूछा जाए की किस आधार यह अपने स्ट्रिंगरो की नियुक्ति करते हैं. स्ट्रिंगरो को सैलरी नहीं मिलती कैमरा नहीं दिया जाता है. यह सब कुछ स्ट्रिंगर खुद इक्कट्ठा करता है और बाद में इसी के सहारे वसूली करता है और चैनल के बड़े पदों की मस्का पालिश करता है. जब चैनल खुद ही वसूली और भ्रष्टाचार को पैदा कर रहें है तो किस मुहँ से लोगो को राय दे रहे हैं कि सरकार भ्रष्ट है और अन्ना सही.

इलेक्ट्रोनिक मीडिया को अब संदेहास्पद नज़र से देखता हूँ और इस अन्नावाद के बाद तो न्यूज़ चैनल शायद ही देखने की हिम्मत हो. हाँ प्रिंट मीडिया जिसे नवदलाल पुराना माध्यम कहते हैं उसने ही पत्रकारिता की साख बरक़रार रही है. अखबार में ही दोनों पक्षों की जानकारी मिल जाती है. अखबार ही हैं जहां पत्रकार और विचारक अन्ना के पक्ष में और विपक्ष में दोनों तरफ के विचार रखते हैं. फिर यह दारोमदार पाठकों पर होता है कि वह किस ओर जाना चाहते हैं. पत्रकारिता अगर जीवित है तो प्रिंट में ही जीवित है और इस बात के लिए प्रिंट मीडिया बधाई की पात्र है.

अन्नावादियों ने इस तरह से विचारों का कर्फ्यू लगाना शुरू कर दिया है कि जैसे अब इस लोकतंत्र पर अन्ना ही हावी होने जा रहें हैं. मौलिक अधिकारों का हनन यह अन्नावादी बहुत खूब कर रहे हैं. इन अन्न्वादियों के भींड में वही तत्व नज़र आ रहें हैं जो भ्रष्टाचार का खुद ही पोषण करते हैं. जिलों में जहां कमीशन देकर ठेका लेने वाले ठेकेदार अन्ना का झंडा थामे हैं. वहीं व्यापार कर से लेकर आयकर तक की चोरी करने करने वाले बड़े सेठ और अधिकारी राजधानियों में अन्ना का झंडा उठाये हैं. अन्नावाद के इस जुलुस में समाज का वही तत्व दिख रहा है, जो राजनीति और पत्रकारिता में सिर्फ अधिकारियों पर दबाव बनाकर अपना काम कराने की जुगत में होता है. जिस तरह के अन्ना वाले तत्व है वह उसी तरह का काम भी कर रहें हैं हर विचार और हर तर्क को यह लोग अन्ना की महानता बखानते हुए रोकना चाहते हैं.

अन्नाई या वैचारिक आतंक का पर्याय बन चुके अन्नावादियों ने एक डर का माहौल पैदा कर दिया है. अन्ना के आंदोलन जिसमे संसद को धता बता हुए अपना क़ानून मनवाना मुख्य उद्देश्य है उसके प्रति किसी भी देशवासी की टिप्पणी इन्हें बर्दाश्त नहीं. अन्ना के अन्नाई देश में एक ऐसा आतंकी माहौल बनाना चाहते हैं जैसे तानाशाहों ने अपने ज़माने में किया. अन्ना का आंदोलन अगर सफल हो गया तब के दौर में अन्नाई के वैचारिक दंगों की कल्पना से ही मन काँप जाता है. अन्ना के समर्थकों आपके अन्नाई वैचारिक आतंकवाद से डर लगता है. अन्ना कृपया इन्हें समझाएं की हम भी देशवासी हैं हमें ना डराएं. समझ नहीं आता यह कौन हैं अन्ना के समर्थक या अन्नाई वैचारिक आतंकवादी.

Saturday, June 4, 2011

यह है बाबा रामदेव, योग गुरु, एक नेता या ड्रामा करने वाले नाटककार.


पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के रामलीला मैदान में एक लीला चल रही है। यह लीला भी रामलीला की तरह से एक नाटक ही है। परन्तु एक फर्क है रामलीला में जहां धार्मिक भावना का जुडाव है और नितिज्ञान है। वही इस समय के नाटक में केवल सत्ता लोलुपता और बड़ा बनने की महत्वकांक्षा है। इस महत्वाकांक्षी ड्रामे के प्रणेता बाबा रामदेव हैं जो योग गुरु के नाम से पुरे विश्व में मशहूर हैं। योग गुरु के रूप में मशहूर होने वाले बाबा रामदेव को अचानक देश से प्रेम जागा और उन्होंने देश के कई महत्वपूर्ण मुद्दों को छुआ। यह मुद्दे अपने आप में काफ़ी बड़े थे और हैं इसमें कोई दो राय नहीं है। परन्तु उन मुद्दों में बाबा रामदेव को सबसे पसंदीदा मुद्दे स्विस बैंको में जमा भारतीय रिश्वतखोरो का पैसा वापस लाना और ५००, १००० के नोटों का चलन बंद करना रहा। इधर बीत कुछ समय में भारत में जिस तरीके से मीडिया के द्वारा एक से एक बड़े घोटालों का जब खुलासा हुआ तब भ्रष्टाचार की लपट ने पुरे देश के जनमानस को गर्म कर दिया। लोगो ने इन घोटालों को देखते हुए इन सबो से छुटकारा पाने के लिए छटपटाना शुरू कर दिया।
जनता की इसी छटपटाहट को भुनाने और जनता में चेहरा चमकाने को बाबा रामदेव निकल पड़े। उन्होंने पुरे देश में जमकर यात्राएं की इन यात्राओं के पीछे बाबा ने योग सिखाने के नाम पर एक नकाब ओढा और योग सीखकर निरोग होने आई जनता को उन्होंने अपने गुरु के रूप में दिए भाषणों में घुट्टी पिलाना शुरू कर दिया। बाबा रामदेव धीरे धीरे पुरे देश में भ्रष्टाचार के विरोध में खड़े होने वाले अकेले योद्धा के रूप में दिखने लगे थे। तभी अचानक अन्ना हजारे ने बीच में आक़र बाबा के सारे पके पकाए कार्यक्रम में सेंधमारी कर दी। अन्ना ने भ्रष्टाचार की मारी आम जनता को भ्रष्टाचार मिटाने का शिगूफा छेड दिया। जनता ने अन्ना का जाप करना शुरू कर दिया और उन्हें महान मानना शुरू कर दिया। बाबा रामदेव जो इस मुद्दे को लेकर पूरी तैयारी कर रहे थे जनता में उतरने के लिए उन्हें पीछे हटना पड़ा। अन्ना हजारे भ्रष्टाचार मिटाने के सबसे बड़े नायक बन गए, और जनता उन्हें तारणहार के रूप मानने लगी। परन्तु लोकपाल विधेयक जिसके सहारे अन्ना देश से भ्रष्टाचार मिटाना चाहते थे। वह एक दुरूह प्रक्रिया में फंसकर कहीं हल्का हो गया और जनता ने उसे भूलना भी शुरू कर दिया।
लोकपाल की देरी और जनता के द्वारा इसको भूलते जाने की बातों ने बाबा रामदेव को नया मौका दे दिया। बाबा रामदेव अपने पुराने भ्रष्टाचार मिटाओ के मुद्दे के जिन्दा होने की संभावना को लेकर दुबारा मैदान में कूद गए। अब चूँकि भ्रष्टाचार का मुद्दा अन्ना पहले ही ले उड़े तो उस मुद्दे में खुच खास ना बचा होने के कारण बाबा ने दूसरी ओर नज़र डाला। यहाँ पर उनको एक ऐसा मुद्दा दिखा जिसको लेकर पूरा देश काफ़ी समय से बातें कह रहा है। वह मुद्दा था स्विस बैंको में जमा काला धन। तो बाबा ने अब देर ना करते हुए अपने इसी मुद्दे को तूल देते हुए ४ जून के धरने का एलान कर दिया। बाबा के पीछे खड़ी उनके शिष्यों की फौज और हाल में ही अन्ना की मार झेल चुकी सरकार ने बाबा से बचने के लिए हर प्रकार का मन मनौवल करना शुरू कर दिया। परन्तु इस मुद्दे से मसीहा बनने की इच्छा रखने वाले रामदेव ४ जून को अनशन में आ जुटे। सुबह ४ बजे के योग से शुरू हुए इस अनशन में प्रतिपल बाबा का नजरिया बदलता रहा कभी सरकार के साथ तो कभी सरकार के विरोध में बाबा दिखाई दिए।
इस सारे ड्रामे के बीच असली रोमांचक क्षण तो तब आया जब केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने शाम को पत्रकारों को बाबा रामदेव की वह चिट्ठी दिखाई जिसमे सरकार द्वारा उनकी मांगे मान लेने की सूरत में यह अनशन केवल प्रतिकताम्क रूप से करने और दोपहर तक समाप्त करने का वायदा किया गया। अब रामदेव के इस चिट्ठी के जारी होते ही हडकंप मचा गया। जो न्यूज़ चैनल सुबह से उन्हें मसीहा बनाने में तूले थे वह उन्हें इस चिट्ठी के बाद झूठा कहने में उतनी ही तन्मयता से जुट गए। केंद्र सरकार के मंत्रियों के इस प्रकार के बाबा के चिट्ठी खोल देने से बाबा कैम्प में बौखलाहट मच गयी। जब हर ओर यह सवाल उठने लगे कि अगर बाबा ने पहले से ही अपने अनशन को फिक्स कर रखा था तो यह बात जनता को बाबा ने स्वयं क्यों नहीं बताई। बाबा के ऊपर इस प्रकार के बढते दबाव से बाबा रामदेव की बौखलाहट बढती गयी और बाबा ने अनशन बढाने और तरह की धमकियाँ मंच से सरकार को दें डाली। बाबा की बौखलाहट यह साफ़ बता रही है की मामला तो कुछ और ही है।
बाबा का यह सारा अनशन का ड्रामा केवल उनके महिमामंडन के लिए था काले धन के लिए कम। क्योंकि इतना तो बाबा रामदेव भी जानते हैं विदेशो से काला धन लाना इतना आसान तो नहीं है। लेकिन प्रचार के भूखे बाबा जो खुद अपने संगठन में बिकवाली और भ्रष्टाचार को रोक नयी पाए वह देश के भ्रष्टाचार को क्या रोकेंगे। यह बात समझ से परे है.

अगर भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर खूब तमाशा होता है, तो भ्रष्टाचार अच्छा है ना.


टी०वी० पर एक विज्ञापन देखने को मिलता है। जिसमे बच्चों को कपडे पर कीचड के दाग लगने के डर को खत्म करने के लिए दाग लगने के फायदे बताये जाते हैं और अंत में पंच लाइन बोली जाती है "की अगर दाग लगने से खुशी मिलती हो तो दाग अच्छे है ना" यह विज्ञापन एक कपडे धोने का पाउडर बनाने वाली कंपनी का होता है जो अपने फायदे यानी दाग लगने पर कपडे धोने के लिए बिकने वाले पाउडर के आद में दाग के फायदे बच्चो को समझाने में जुटी है। कंपनी के लोग यह मानते होंगे की बच्चे भोले होते हैं और यह विज्ञापन देखकर कीचड में दौड लगाकर और गंदे गड्ढे में घुसकर या बालपन की गर्ल फ्रेंड की साइकिल को छूकर अपने कपड़ों में दाग लगवाकर खुशी ढूंढ लेंगे। जिससे बाद में उनके अभिभावक बच्चो के कपडे धुलने के लिए पाउडर खरीदकर कंपनी का मुनाफा बढ़ाकार कंपनी को भी खुश कर देंगे। यानी इस सारे बेचने और खरीदने या बाजारीकरण नियमावली में अगर कपडे धोने वाली कंपनी को फायदा चाहिए तो उसे मात्र दाग में खुशी ढूँढने वाले बच्चे और फिर पाउडर खरीदने वाले माँ बाप चाहिए।
वाशिंग पाउडर के विज्ञापन ने इस समय देश के बड़े नारे को बहुत बेहतरीन आइडिया दिया है। वह नारा है "भ्रष्टाचार मिटाओ और काला धन देश में लाओ" इस नारे को लेकर कोई साबुन कंपनी तो नहीं परन्तु देश में दो तारणहार लोगो ने अपना नाम खूब फैलाया (उत्पाद के रूप में बेचा) कुछ दिन पहले जब भारत में विश्व कप का जूनून उतरा ही था और आईपीएल का चढ़ने वाला था उसी समय टाइमिंग का ध्यान रखकर एक बुज़ुर्ग सज्जन अवतरित हुए जिन्होंने भ्रष्टाचार को धुलकर मिटाने का प्रण लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया। यह सज्जन यानी श्री अन्ना हजारे जी के अनशन को लेकर देश में जबरदस्त लहर चली। आखिर चले भी क्यों ना उस समय जनता जी, कामनवेल्थ गेम, आदर्श हाउसिंग जैसे तमाम घोटाले के दाग को लेकर उबल ही रही थी। तब अन्ना जी इन दागो को धोने के लिए अपने पाउडर यानी जनलोकपाल को जनता के सामने पेश किया। जनता भी उस टी०वी० वाले बच्चे की तरह पाउडर कंपनी की बातों को मानकर दाग से खेलने लगी की अब तो पाउडर है ही भ्रष्टाचार धो जाएगा। इसी तरह सरे दाग वाले बच्चे जंतर-मंतर जो उस समय बहुत बड़ा कपडे धोने का घाट बना था वहां इकठ्ठा हो गए। इसी के साथ तरह तरह के नारे देश भर में लगने लगे। अन्ना जी के पाउडर जन लोकपाल को लेकर सरकार जो तैयार बैठी उसने अन्ना जी को लोकपाल पाउडर बनाने के लिए न्योता दे दिया और अन्ना जी अपने कंपनी के कुछ चुनिन्दा डाइरेक्टरो के साथ उस पाउडर बनाने के लिए चले गए। अन्ना जी के पाउडर के बनने में काफ़ी समय लगने और केवल उनके चुनिन्दा बन्ना लोगो के उनके साथ होने से जनता धीरे धीरे भ्रष्टाचार रुपी दाग के साथ फिर से जीने की आदि होती चली गयी। साथ एक अनंत इन्तेज़ार में डूब गयी की कब अन्ना आयेंगे और लोकपाल पाउडर लायेंगे और भ्रष्टाचार मिटायेंगे।
इस भ्रष्टाचार के दाग को धोने के लिए आज यानी जून से बाबा रामदेव ने नया पाउडर लाने को कहा है। साथ बाबा ने नए दाग यानी विदेशो से काला धन लाने को भी धो देने को बताया है। रामदेव के सारे कार्यक्रम या यूँ कहे भ्रष्टाचार मिटाने के उनके कारनामे का सारा विज्ञापन एक आधुनिकतम स्टूडियों में चल रहा है। जहां उन्होंने भ्रष्टाचार मिटाने के उत्पाद के साथ अपने पुराने या मदर उत्पाद योग को भी बेचना जारी रखा हैं। रादेव यह जानते हैं कि अगर वह अपने मदर उत्पाद को छोड देंगे तो जनता भी छूट जायेगी इसीलिए रामदेव अपने उस उत्पाद को हमेशा साथ लेकर ही चलते हैं। बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार मिटाने के अभियान में उन्होंने यह नहीं बताया की जो काले धन का दाग विदेश में हैं यानी दूसरे देश में हैं उसे भारत में वह कैसे मगायेंगे। उस देश पर क्या बाबा हमला करवाएंगे या कुछ और क्योंकि वहां का सारा पैसा तो वहां के बैंकिंग नियमों से बंधा है। भारत में तो उनकी कंपनी चूँकि योग के उत्पाद बेचती है और उनका पूरा बाजार कुछ ऐसे ही लोगो पर निर्भर जिन्हें अपने कपड़ो में भ्रष्टाचारी दाग लगवाना अच्छा लगता है। यानी विज्ञापन के वह बच्चे जो दाग को पसंद करते हैं पाउडर के साथ। बाबा के पुरे संगठन को हमेशा से ऐसे भ्रष्टाचार पसंद लोगो का ही समर्थन मिला है। दूसरी तरफ उनके संगठन के सारे पदाधिकारी भी सेठो के ही किनारे घूमकर अपने कपडे भी भ्रष्टाचारी दाग से गंदे करवाकर वह आनंद लेना चाहते हैं जैसा इस वाशिंग पाउडर के विज्ञापन में कंपनी बच्चे को दिलवाती है।
हमारे देश में भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर जो इस वाशिंग पाउडर की कंपनी की तर्ज़ पर आंदोलन चल रहे हैं। उससे भ्रष्टाचार कितना मिटेगा यह तो नहीं कह सकते परन्तु हाँ यह जरूर हैं दाग को अच्छा बताकर भ्रष्टाचार में लिप्त होना और बाद में पाउडर बेचकर नाम कमाना ही इस सारे काम के पीछे दीखता है। यानी जब भ्रष्टाचार के नाम पर खोब तमाशा होकर नाम बिकता ही है तो भ्रष्टाचार अच्छा है ना।