Saturday, May 28, 2011

नेपाल के राजनैतिक हालात में अस्थिरता की संभावना, 28 मई के बाद शुरू होगा नेपाल की सड़को पर राजनैतिक घमासान।


भारत के सबसे करीबी और सबसे सौहार्दपूर्ण पड़ोसी देश नेपाल के अंदरूनी राजनैतिक हालात बिगड़ने की संभावना सच होने के कगार पर पहँुच चुकी है। नेपाल में माओवादीयों के लम्बे आंदोलन के बाद 200 वर्ष से ज्यादा पुरानी राज़शाही का समापन तो हो गया। परन्तु माओवादीयों के पास प्रजातंत्र के कुशल संचालन के लिए कोई ढा़ंचा ना होने से आज नेपाल में सत्ता संचालन का संकट खड़ा हो गया है। नेपाल में संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा का र्निमाण किया गया था। जिसके समय को बार-बार बढ़ाया जाता रहा था। इस संविधान सभा की अंतिम तिथि 28 मई है। परन्तु अभी तक ना तो कोई संविधान का मसौदा सामने आया है, और ना ही जल्द आने की कोई उम्मीद है। इस बार नेपाल के दलों ने इस संविधान सभा के कार्यकाल को पुनः बढ़ाये ज़ाने से स्पष्ट इंकार कर दिया है। इससे वहां के राजनैतिक माहौल में गर्मी बढने के आसार नज़र आ रहें हैं।

नेपाल की संसद में सबसे अधिक सभासद वाले दल एकीकृत नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (यू0एन0सी0पी0एन0) के नेताओं में आपस में ही काफी मतभेद बने हुए हैं। यह मतभेद अब खूनी रूप लें सकनें को तैयार हैं। नेपाल के सूत्रो से प्राप्त जानकारी के अनुसार हाल ही में एक यूएनसीपीएन कार्यकर्ता ने यह कहकर सनसनी फ़ैला दी थी कि माओवादीयों के र्शीष नेता प्रचण्ड अपनी ही पार्टी के ही वरिष्ठ नेता बाबूराम भट्टाराई को जान से मारवाना चाहतें हैं। माओवादी नेताओं के अन्दरूनी सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार अब माओवादी अन्दर ही अन्दर तीन धडो में बंट चुके हैं। जिसमें प्रचण्ड, मोहन वैद्य और बाबूराम भट्टाराई के अलग गुट आकार ले चुके हैं। प्रचण्ड़ भट्टाराई को भारत के ऐजेण्ट के रूप में देखते हैं, तो माहन वैद्य को संगठन पर कब्जा करने वाले के रूप मानते हैं।

इसी प्रकार नेपाल की सेना में कम्यूनिस्ट पार्टी की जनयुद्ध के समय बनी पीपुल्स आर्मी के समायोजन को लेकर एक नई छिड़ी हुई है। नेपाल की सेना में 19200 के करीब पीपुल्स आर्मी के लोगों के समायोजन से सेना के उच्चाधिकारी सहमत नहीं हैं। नेपाल की सेना जो राष्ट्र समर्पित सेना मानी जाती है। उस सेना में देश के अतिरिक्त पार्टी को प्राथमिकता देने वाले लोगों की भर्ती से सेना की व्यवस्था चरमराने की आशंका बलवती हो जायेगी। इसी के साथ ही नेपाल की सेना में चीन के तरफ़ झुकाव रखने वाले लोगों की बढ़त से भारत की सुरक्षा को भी पर्याप्त खतरा उत्पन्न हो सकता है। अभी हाल ही में माओवादी सरकार द्वारा बुलावे पर चीन के एक जनरल ने नेपाल का दौरा भी किया था। नेपाल की सेना के प्रति कुछ लोग यह भी आरोप लगाते रहते हैं कि नेपाल सेना के जनरल को भारत का भी मानद जनरल होता है। अतः नेपाल की सेना को भारत अपने नियंत्रण में चाहता है। साथ सेना का भी झुकाव भारत के प्रति ही अधिक माना जाता है।

नेपाल राजनैतिक और भैगोलिक रूप से दो सबसे प्रबल विरोधियों के बीच बसा हुआ एक शान्त देश है। राजनीति के हिसाब से बफ़र स्टेट का दर्ज़ा प्राप्त इस देश की स्थिति भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अतः 28 मई के बाद जब संविधान सभा की समय सीमा पूरी होगी उस समय की स्थिति काफी महत्वपूर्ण होगी।

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