
‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ संस्कृत भाषा के इस शब्द का अर्थ होता है कि इस धरा पर वास करने वाले एक ही कुटुम्ब यानि परिवार के वासी है। यह शब्द पूरे विश्व में एकीकृत भावना के लिए माना जाता हैं। परन्तु पूरे विश्व के देशो और निवासियों को शायद ही कोई ड़ोर इस शब्द से ज़ोड सकती है। बहुत सोचने के बाद एक ब़ात समझ आती है, जिससे इस विश्व की एक भावना माना जा सकता है। वह ब़ात यह है कि भले यह विश्व कई देशों, विभिन्न धर्मो, संप्रदायों, रूप-रंग में विभक्त हैं। परन्तु यह विश्व आधी आबादी मानी जाने वाली महिलाओं के शोषण और उनके प्रति अपराधों में एक समान है।
हमारे देश में महिलाओं से बलात्कार, कन्या भू्रण हत्या, यौन शोषण जैसे मामलें तो अक्सर हमारे अखबारो में भरे ही रहते हैं। साथ ही यहां के धर्म के पदो पर बैठे लोगो के बारे में सुनने में आता ही रहता है। इसके साथ ही कभी आनर किलिंग तो कभी इमराना और गुडिया जैसे मामलो से हमारे समाज में पुरूषत्व की कू्रर प्रधानता को दर्शाता है। यह हाल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में खुले रूप से है। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान से हमारे चाहें कोई विचार ना मिलते हों परन्तु महिलाओं पर अत्याचार के मामलें में समानता के साथ्-साथ बढ़त भी बनायें हैं। यहां हद्दू कानून लागू है जिसकी सबसे मशहुर शिकर मुख्तारन माई हैं। जिनेको हाल में ही पाकिस्तान के सुप्रीम र्कोट तक से न्याय ना मिल पानें का मलाल साल रहा है। हद्दू कानून के तहत सामूहिक बलात्कार का शिकार हुईं मुख्तारन माईं ने बीबीसी को दिये इंटरव्यू में पाकिस्तान में न्याय ना होन पर अफ़सोस ज़ता चुकी हैं। ऐसे ही पाकिस्तान में सेना से लेकर कस्बो में बैठने वाली जिरगा पंचायतो द्वारा हो रहे शोषण में महिलाओं को एक भेाग वस्तु से ज्यादा नही समझा जाता है। ऐसे ही हाल अरब देशेों में हैं। जहां मौलानाओं के नये-नये फ़रमान आते रहते हैं। कुछ समय पहले अरब के एक मौलाना ने फ़रमान जारी किया था कि कामक़ाज़ी महिलायें अपने पुरूष सहयोगी का अपना दूध पिलायें जिससे वह उनके बेटे जैसे हो जायें। इस तरह के ऊल-जुलूल फ़रमान यह दिखाते हैं कि महिला की स्थिति पुरूषवादी समाज़ में कैसी है। महिला शोषण के मामलें आंतरिक गृह युद्ध से जलते श्रीलंका और कम्यूनिस्ट चीन में भी कम नही हैं।
ऐसा नही है कि महिला शोषण केवल अल्प शिक्षित और विकासशील माने जाने वाले एशिया में हैं। महिला शोषण का सबसे बडा और बदनुमा दाग यानि वेश्यावृत्ति अतिशिक्षित, सभ्य और विकसित यूरोप और अमेरिका से लेकर पूरे विश्व में फैला है। फ्रांस और ज़र्मनी जैसे देश जो प्रगति का दम भरते हैं, उन्होंनें अपने यहां वेश्यावृत्ति को कानूनी ज़ामा पहना रखा है। विश्व के अधिकतर देशों में अश्लील फिल्मों का सबसे बडा कारोबार अमेरिका और रूस जैसे देशो से प्रमुखता से होता है। हर देश के विज्ञापनो में महिला का इस्तेमाल एक शो-पीस के रूप में होता है। लडकियों को कम कपडे पहनाकर फिल्मों में ग्ल्ैामर पैदा किया ज़ाता है। पूरे विश्व में किसी ना किसी रूप से महिलाओं का शोषण बदस्तूर ज़ारी है। अमेरिका जैसे देश में बलात्कार के मामलें बढ़ते जा रहें हैं। एमेनस्टी इण्टरनेशल की रिर्पोट के अनुसार महिलाओं के प्रति पूरे विश्व में हिंसा और शोषण का अनुपात कम नही हो रहा है।
म्हिलाओं के शोषण में आम आदमी से लेकर देशों के प्रमुख व्यक्ति तक शामिल हैं। अभी हाल में ही विश्व मुद्रा कोष के अध्यक्ष पद पर रहते हुए फ्रांसीसी नेता डामनिक स्ट्रास केन्ह पर वाशिंग्टन के टाइम स्कवायर होटल में एक अफ्रीकी मूल की महिला के यौन शोषण का आरोप लग चुका है। इसी प्रकार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिण्टन और व्हाइट हाउस की कर्मचारी मोनिका लेंवेंस्की का प्रकरण पूरी दुनिया जानती ही है। इसी प्रकार इटली के राष्ट्र प्रमुख बर्लुस्कोनी पर भी कई यौन शोषण के कई आरोप लग चुके हैं।
म्हिलाओं के दैहिक और मानसिक शोषण को लेकर पूरे विश्व में एकरूपता बनी हुई है। आज़ हम ज़ब कहतें हैं कि हम विकसित और समृद्ध हुए हैं। तब यह धटनायें हमें सोचने पर मज़बूर कर देती हैं। इसीलिए यह कहने के लिए मज़बूर होना पड़ता है कि पूरे विश्व में वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना र्सिफ़ महिला शोषण में ही दिखती है।
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