Wednesday, January 2, 2013

अब जिलों में मर गई है या रोज़ मारी जा रही है स्थानीय पत्रकारिता.



जिलों के स्तर पर होने वाली स्थानीय पत्रकारिता से सोच समझ और किसी भी विजन की उम्मीद तो कभी मिली ही नहीं. लेकिन पत्रकारिता के नाम पर जो तमाशे अक्सर देखने को मिलते हैं वह उसके बारे में मौजूद हर किताबी या पढ़ी लिखी बातों को झुठलाते नज़र आ रहे हैं. वायस आफ वायसलेस यानी जिनकी आवाज़ सत्ता प्रतिष्ठानों तक ना पहुँच रही हो उनकी आवाज़ बनना पत्रकारिता का मूल सिद्धांत माना जाता है. इसी सिद्धांत के बदौलत पत्रकारिता को वह मुकाम हासिल हुआ कि उसे लोकतंत्र के चौथे खम्भे के रूप में गिना या माना जाता है.

इसी लोकतंत्र की सबसे प्रथम इकाई के रूप में गाँव, क़स्बा और जिला आता है. जहाँ की आवाजें अक्सर अनसुनी रह जाती है जिनको मुकाम या जगह दिलवाना पत्रकारिता का कर्म होना चाहिए. लेकिन आज जिन हालातों में जिला पत्रकारिता कम से कम हिंदी पट्टी में चल रही उससे घिन के अलावा और कुछ कहा सोचा व समझा नहीं जा सकता. किसी धरने प्रदर्शन में या किसी भी पीड़ित की आवाज़ को सुनने के बजाय पत्रकारिता के नाम पर नाम भुनाने वाले वहां मौजूद पुलिस या प्रशासन के अधिकारियों से हाथ मिलाते या फिर उनके साथ चिपकते नज़र आते हैं. जिसे वह अपनी शान मानते हैं जो कुछ भी हो लेकिन पर पत्रकारिता तो नहीं ही कही जानी चाहिए.
31 दिसंबर की शाम को बहराइच जनपद के पानी टंकी चौराहे पर अचानक पुलिस की भींड पहुँच जाती है. जिसमें सीओ स्तर के अधिकारी भी मौजूद रहते हैं. और उसके बाद वहां उस चौराहे पर मौजूद ठेले वालों या वहां कुछ समान खरीद आम से दिखने वाले या सीधे शब्दों में कहूँ तो कमजोर दिखने वालों को पुलिस चेकिंग के नाम परेशान किया जाना शुरू होता है. इस प्रकार के अचानक हुए कार्यवाही के तमाशे को भोगकर आस पास और रोज उसी इलाके में खरीदारी करने वाले लोग या दुकानदार थोडा डर और आश्चर्य से चौंक पड़ते हैं. पुलिस की यह सारी कवायद 31 दिसंबर के नाम पर होने वाले शोर शाराबे और उद्दंडता को रोकने की ओर उठाया गया कदम बताया जाता है. लेकिन इस उद्दंडता को रोकने के नाम पर हुई कार्यवाही काफी समय तक लोगों को एक अजीब से आतंक में डालता दिखी.

खैर इसी बीच लगातार कैमरे के फ्लैश चमकते हुए जाने कहाँ कहाँ से तरह तरह के कैमरों के साथ कुछ लड़के पहुचंते हैं. और इस पुलिसिया कार्यवाही की फोटो लेने लगते हैं. पता चलता है कि यह पत्रकार हैं और पुलिस के इस घटनाक्रम को कवर करने आयें हैं. इससे फिलहाल तो एक संतोष जन्म लेता है कि चलिए यह पत्रकार आ पहुंचे है तो कम से कम पुलिस आम जनता को अपनी चेकिंग से परेशान नहीं करेगी. लेकिन परिस्थितियां एकदम अंदाज़े से उलट नज़र आती है. जब यह तथाकथित पत्रकार लोग सिपाही, दरोगा, कोतवाल व सीओ तक मौजूद हर अधिकारी से अपने अपने अखबार और संपर्क के नाम पर हाथ मिलाने में जुट जाते हैं. और बिना किसी पूर्व सूचना के ठेले या होटल मौजूद व्यक्तियों के जेबों में हाथ डालकर चेक कर रही पुलिस के इस कारनामे को उनकी सक्रियता के नाम पर महिमा मंडित करते हुए फोटो खींचकर अपनी पत्रकारिता पूरी करते रहे. इस तथाकथित पत्रकारिता झुण्ड में देश में नामचीन बताने वाले अखबारों से लेकर कल परसों तक बने अखबारों के प्रतिनिधि मौजूद होते है. जिनका मुख्य उद्देश्य केवल पुलिस की झुण्ड में अपनी पहचान बताना ही नज़र आता है.


इस तरह की पत्रकारिता देखकर मन यह कोफ़्त जरूर उठता है कि क्या ऐसे लोगों को पत्रकार माना जाए. और अगर माना न जाए तो आप कर क्या लेंगे, कुछ ऐसी ही स्थिति इस समय जिला स्तरीय स्थानीय पत्रकारिता की हो रही है. जिलों में काम करने के नाम पर जितने कम पैसे और संसाधन दिए जाते हैं और उसके बावजूद बढ़ रही असंख्य संख्या कम से शुचिता वाली पत्रकारिता की ओर तो नहीं ही ले जा सकती है. लेकिन यह जो कुछ भी पत्रकारिता के नाम पर हो रहा है उसे क्या कहा जाए. लोगों की आवाज़ बनने वाली पत्रकारिता उसी आवाज़ को दबाने वाले अधिकारी वर्ग की चापलूसी में जुटी हुई है.

अखबार लेखनी क्षमता नहीं एजेंसी विज्ञापन देखने लगे हैं. न्यूज़ चैनल कैमरा और मुफ्त में जितना ज्यादा मिल सके उतनी फुटेज को खोज रहे हैं. ऐसे में पत्रकारिता में समझ रखने वाले का स्थान कम से कम जिला स्तरीय पत्रकारिता में नहीं है. अपनी लगभग 2 साल और 15 जिलों की स्थानीय पत्रकारिता को समझकर और कहीं कहीं तो उनके बीच घुसकर रिसर्च करने के दौर में पाया कि अधिकाँश जगह तो अब पत्रकारिता साफ हो चुकी है. इक्का दुक्का जो लोग वाकई पत्रकारिता को मानते हैं उन्हें स्थानीय पत्रकारिता की यह बाढ़ एक बेकार की वस्तु से ज्यादा नहीं मानती है. और उनका मुकाम हाशिया पर बना दिया गया है. अब तो जिला स्तरीय पत्रकारिता में अखबार या चैनल की लग्गीयाँ एक औज़ार है जिनसे अधिकारियों और नेताओं में पकड़ बनाई जाए. मजे की बात तो यह देखने को मिलती है कि जिन जिला स्तरीय पत्रकारों के पास खुद लिखने पढ़ने की समझ नहीं है और जो इसका प्रयोग केवल हित साधने के लिए करते हैं. उनके पास लडको की कमी नहीं है जो पत्रकार बनने या यूँ कहिएं कि इसी हाथ मिलाने वाली पत्रकारिता के एक अंग बनने को व्याकुल हैं.

 
सरकारी अधिकारियों में अब वही पत्रकार है जो रोज सुबह शाम उनके यहाँ दरबार लगाता है, और जैसे पुराने जमाने में दरबारी फायदा उठाते वैसे ही फायदा उठाने और कानाफूसी करने का काम स्थानीय पत्रकारिता की आत्मा बन चुका है. इस तरह की स्थितियां दुःख तो देती है, लेकिन सच्चाई भी यही है. बहरहाल बहराइच के एक चौराहे पर लगे पत्रकारिता के मजमे को देखकर समझ नहीं आता है कि क्या कहा जाए. अब जिलों में मर गई है या रोज़ मारी जा रही है पत्रकारिता.

Wednesday, December 12, 2012

पत्रकारिता विहीन पत्रकार बनाने की परंपरा हमें कहाँ ले जायेगी.

कुछ कहने सुनने से पूर्व एक बिन मांगी सलाह उन सबको देना चाहूँगा जो “पत्रकारिता” करने के लिए पत्रकारिता में उतरना चाहते हैं. जो नहीं करना चाहते हैं वह केवल अपनी नौकरी या जो कुछ भी सोच समझकर पत्रकार बनने का शौक पाले हैं, वहीँ करें क्योंकि उनका ही बहुमत हो चुका है और रहने वाला भी है. खैर जो बात कहनी थी वह यह है कि दिल्ली नॉएडा जैसे देश के किसी भी जगह में अखबारों व चैनलों के न्यूज़ रूम में बैठकर ज्ञान झाड़ने से पहले एक बार अपने यानी इस देश में चल रहे मीडिया कारखाने का पूरा चक्कर जरूर लगाना चाहिए. मतलब यह है गाँव, क़स्बा और जिला स्तरीय पत्रकारिता के साथ रहकर और उसे कायदे एक बार समझने के बाद ही किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर बात करना ज्यादा अच्छा रहेगा. इससे सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अपनी असलियत और प्रभाव का अंदाजा लगता रहेगा.

खैर इन्ही सबके बीच एक पारिवारिक पडोसी के विवाह समारोह में अपने पत्रकारिता के जलवे के कारण बुलाये गये “शब्द शब्द संघर्ष” टैग लाइन के जिला संवाददाता अपने गुरु के साथ मिल जाते हैं. और वहां उनसे बात शुरू होती है. शब्द संघर्ष वाले जिला संवादाता महोदय ऐसी बातें करने लगते हैं जिससे उनके पत्रकारिता तो छोडिये सामान्य ज्ञान पर भी संदेह होने लगता है. जिला स्तर की पत्रकारिता को केवल अपने धंधों से सींचने वाले लोग पूरी मीडिया के पेशेवर व्यवहार के बारे में उल जलूल तर्क देने लगते है, जिस बारे में उन गुरु चेले को शायद ताउम्र ना पता चले. लेखनी में भी पैसा है और पैसा कैसे हैं कैसे किस जगह क्या लिखा जाना चाहिए यह सब बातें उन्हें जिले स्तर से आगे पता ही नहीं है. उन्हें केवल इतना पता है कि जो लखनऊ या दिल्ली में है वह तनख्वाह पाता है बाकी पत्रकार केवल “धंधो” में जुटा है. रिटेनरशिप और कांट्रेक्ट पर काम करने के बारे में इनके ख्याल पूछने पर इन्हें समझ ही नहीं आता है कि यह होता क्या है, यह अलग बात है कि वह जिले के “जिला संवाददाता” है और खुद लकदक सुविधासंपन्न स्टाफ से भरा पूरा दफ्तर चलाते हैं.

और समझ के इतने कमजोर कि उन्हें यह भी नहीं पता कि दिल्ली और लखनऊ में भी स्ट्रिंगर और उनके जैसे ऐसे वैसे एवइं टाइप लोग भी होते है. पत्रकारिता में चंद नाम उछालकर अपने को महान सिद्ध या यूँ कहने थोपने वाले इन लोगों को देख सुनकर कोफ़्त होती है लेकिन साथ ही तरस भी आता है कि क्या यही पत्रकारिता है जिसका आज समझ के साथ कोई रिश्ता नहीं रह गया है. गुरु चेले की इस जोड़ी जैसे स्थानीय पत्रकारिता के सैम्पल तहलका और इंडिया टुडे जैसी नामवर मैगजीनों के नाम ऐसे लेकर सामने वाले को सुनाते हैं कि गोया यह सब कोई अजूबा हैं. जिनमें कोई इनके पूछे बिना किसी की भर्ती नहीं हो सकती या इनके अलावा कोई लिख नहीं सकता. हाँ यह भी एक अलग बात है कि इन्ही लोगों ने शायद ऐसे जगहों के सिर्फ नाम भुनाए हो तो यह उनके लिए पूज्य होंगे  ही.

स्थानीय पत्रकारिता की समझ में स्थानीय पत्थर इतने ज्यादा भरे पड़े हैं जिससे इन्हें केवल यही समझ आता है कि दुनिया बस मेरे इस जिले में है जो मैं कर रहा हूँ वही है अन्यथा सब बेकार. इन लोगों को देखकर सुनकर कुएं के मेढक की कहानी की सत्यता आसानी से पता चल जाती है.

आज के दौर में जब पत्रकारिता और पत्रकार खास तौर पर पहली कड़ी वाले पूरी तरह से संदिग्ध होने के कगार पर खड़ी हैं. वहां “शब्द शब्द संघर्ष” को इस तरह बेमानी करने वाले लोगों और उनकी समझ को क्या कहा जायेगा. मजे की बात यह है कि यह लोग कहते हैं कि अब हम कितना पढ़ें यानी पत्रकार हैं और अखबार मैगज़ीन पढ़ना नहीं चाहते हैं. इस तरह आँख बंद करके अपनी ध्वस्त सोच अगर यह पत्रकारिता करते होंगे तो क्या लिखते होंगे यह सोचकर ही मन डरने लगता है. इसी तरह के कम्पायमान हो चुकी साख को इस तरह के शाब्दिक महारथी कितना धोते होंगे इसका अंदाजा मुश्किल नहीं है.

कुल मिलाकर आज पत्रकारिता का वह दौर है खास तौर पर हिंदी पट्टी में जहाँ संदिग्धता ही हावी है. इसीलिए चाहे न चाहे यह कहना और मानना पड़ता है कि अंग्रेजी पत्रकारिता अपने क्षेत्र और दायरे में काफी बेहतर है. संयोग से मिले इस जोड़ी इस चर्चा को याद करके मन यही कहता है कि यह पत्रकारिता विहीन पत्रकार बनाने की परंपरा हमें कहाँ ले जायेगी.

Thursday, December 6, 2012

जय एफडीआई "वाद"।

चलिए अच्छा हुआ नेताजी की पार्टी ने बता दिया कि वह साम्प्रदायिक ताकतों के साथ वोट नहीं देंगे. अब कुछ नासमझ लोग पूछने लगे कि देश में रोज़ी रोटी का सवाल और पूरी व्यवस्था में मिल रहा रोज़गार कैसे "साम्प्रदायिक" हो गया. खैर नेताजी के पास अपने चश्मे हैं. अचानक टाइम मशीन में जाने का मौका मिला तो दिखा कि 2003 में उत्तर प्रदेश की उस समय विधानसभा में वोटिंग किसी साम्प्रदायिक पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधि और अध्यक्ष करा रहे हैं. और उसमें सरकार गलत वोटिंग के बड़े आरोपों के बीच समाजवादी (शब्द के लिए माफ़ी) चोला ओढकर नेता जी का नेतृत्व हासिल कर रहे हैं. साथ ही गठन के बाद भी वही साम्प्रदायिक तरफ वाले स्पीकर महोदय काफी समय तक दायित्व निर्वाह करते रहे. मजा देखिये कि उस दौर में एक बार भी सरकार छोड़ने का विचार या विधानसभा भंग कराने का भी कोई ख्याल तक नहीं आया कि इसका गठन और संचालन साम्प्रदायिक पार्टी के सदस्य की अध्यक्षता में हुआ. चलिए छोडिये इस बात को और बात करते हैं कि कैसे बाबरी मस्जिद के लिए जी जान लगाने वाले नेताजी ने एक झटके में इसके "दोषी" "गुनाहगार" को एक झटके में "शुद्ध" करके अपने में विलय कर लिए (बाद में सियासी अपच के कारण उगलना पड़ा वह अलग बात है). अब इतनी शुद्ध सेक्युलर राजनीति करने वाले कैसे साम्प्रदायिक ताकतों के साथ वोटिंग करते यह तो समस्या थी ही. अरे लेकिन किसी को याद हो तो बता दूँ कि वाम पार्टियां भी इसी तरफ खड़ी थी शायद नेताजी ने उन्हें भी साम्प्रदायिक करार दे दिया हो (उनके एक सांसद कह भी रहे थे कि वाम के राज्य में मुसलमान नीचे गया है, यह अलग बात हैं कि उनके राज्य में 9 दंगे हो चुके हैं). अब एक बात तो पक्का हो गया की झकाझक शुद्ध वाला सेक्युलरवाद केवल नेताजी के ही पास है बाकी सब नक्काल. वैसे अमेरिकी न्युकिलियर डील के समय और अब एफडीआई के तरफ जिस तरह अमेरिका की तरफदारी की गई है उससे सेक्युलरिज्म को नए आयाम मिले हैं. अब कुछ लोग अमेरिका पर कई देशों में विवाद करवाने का दोषी मानते हों तो माने. कुछ भी हो नाक भी रहे और हजामत हो जाये ऐसी खूबसूरत राजनीति केवल "वादी" दाँव से ही आती है. ना यकीन हो तो न्युकिलियर डील, बाहर से समर्थन के बाद तत्काल बढ़ा पेट्रोल और गैस की राशनिग या अब एफडीआई की मंजूरी से लगा सकते हैं....शेष विशेष

Sunday, October 21, 2012

शौचालय निर्माण के जरिये अपहरण, बलात्कार और छेड़-छाड़ से मुक्ति के स्वप्न दिखाती नौकरशाही।


महिलाओं के साथ छेडछाड, बलात्कार और अपहरण जैसे हो रहे जघन्य अपराधों की रोकथाम बताने वाले उल जलूल बयान व फरमान अक्सर सुनाई देते रहते है। जिनमें परोक्ष रूप से महिलाओं को ही निशाना बनाकर इन अपराधों को रोकने के फरमान दिए जाते हैं। इसी कड़ी में इन अपराधों को नियंत्रित करने की नई और अजीब व्याख्या अब उत्तर प्रदेश की नौकरशाही से सुनने को मिल रही है। केन्द्र सरकार की निर्मल भारत योजना जिसके तहत गांवों में शौचालयों का निर्माण कराया जाना है। इसको लेकर अधिकारी कितने उत्साहित है उसका अंदाजा बहराइच की जिलाधिकारी की बातों से लगाया जा सकता है। जिलाधिकारी किंजल सिंह जो स्वयं एक महिला हैं वह इन महिला अपराधों को शौचालयों के निर्माण द्वारा रोके जाने की बात कहती है। बहराइच जनपद में शुक्रवार 12 अक्टूबर को निर्मल भारत योजना पर आयोजित अपनी एक प्रेस वार्ता में उन्होंने पत्रकारों को बताया कि गांवों में शौचालय के बन जाने के बाद से क़ानून व्यवस्था की स्थिति सुधरेगी और छेडछाड, बलात्कार, अपहरण जैसी घटनाए नियंत्रित हो जायेंगी। जिलाधिकारी किंजल सिंह शौचालयों की आवश्यकता को बताते हुए यह समझाना भूल गई कि अगर इन अपराधों को रोकने की दवा शौचालय बन जाना भर हैं तो यह अपराध उन इलाकों में क्यों होते हैं जहाँ शौचालय पहले से मौजूद हैं। शहरी इलाकों में तो महिलाओं को सबसे अधिक सुरक्षित होना चाहिए जहाँ घर में कम से एक नहीं तो अधिक भी शौचालय मौजूद रहते हैं।
केन्द्र सरकार की निर्मल भारत योजना के तहत गाँव गाँव में शौचालय निर्माण के लिए व्यवस्था दी गई है। जिसमें सरकार से निर्माण हेतु प्रोत्साहन राशि दस हज़ार रूपये है और इसके साथ ही ग्राम, ब्लाक और जिला स्तरीय अधिकारियों द्वारा इस पूरे कार्यक्रम को सफल बनाने की योजना बनाई जा रही है। इसमें ध्यान देने की बात यह है कि जिस योजना के तहत शौचालय बनाकर स्वच्छता से लेकर क़ानून व्यवस्था तक सुधारने के दावे हो रहे हैं। उस योजना को संचालित करने वाली वही नौकरशाही है जिसकी मनरेगा और तमाम ग्रामीण योजनाओं में भ्रष्टाचार की शिकायतों से जिले और राज्य स्तर में फाइलें भरी पड़ी हैं। ऐसे में क़ानून व्यवस्था और उसमें भी खास तौर पर महिला अपराधों को रोकने के सपने इन योजनाओं के जरिये कैसे देखे जा सकते हैं।
यही नहीं जिलाधिकारी द्वारा ग्रामीणों के बौद्धिक स्तर के विकास के लिए शौचालय को जरूरी बताया गया। इस सिद्धांत के अनुसार जिस भी घर में शौचालय हों वहां बौद्धिकता का प्रवाह होना चाहिए। इस थ्योरी के अनुसार शहरी इलाके और कस्बे बौद्धिकता के शिखर और ग्रामीण इलाके कूप मंडूक होने चाहिए। 15 अक्टूबर से जिले में हैंडवाश डे या जिला प्रशासन द्वारा अनुवादित हाथ धुलाई दिवस से चल रहे निर्मल भारत अभियान के तहत अधिकारी शहर के नजदीकी गाँव में एक खास ब्रांड के साबुन से हाथ धोने का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो स्वच्छता से ज्यादा ब्रांडिंग का मामला लग रहा है। जिलाधिकारी के द्वारा निर्मल भारत अभियान को लेकर जो खास उत्साह दिख रहा है। वह एक एलिट नौकरशाही का सन्देश आम जन में पहुंचा रहा है। जहाँ दिल्ली केंद्रित सोच पिछड़े जिले में एकदम से लागू करने की बात बन रही है।
अखिलेश सरकार द्वारा प्रदेश में अनुभवहीन नए अधिकारियों की तेज़ी से उच्च पदों पर नियुक्ति की गई है। इन अधिकारियों का अभी जमीनी हकीकत से बहुत दूर होना ही ऐसे बयानों को जन्म देता है। यह नई नौकरशाही ग्रामीण जनता को सिर्फ इतना ही जानती है जितना उसने हिंदी अखबारों में पढ़ रखा है। जहाँ शौच के लिए गई युवती या महिला के साथ अपहरण और बलात्कार व छेड़छाड़ की खबरें मिल जाती हैं। इस प्रकार के अपराधों में पूरी ग्रामीण व्यवस्था की दबंगई और क्यों सिर्फ महिलाओं के ही साथ ही यह घटनाएं होती हैं। उसे समझने के स्थान पर शौचालय के ना होने को ही इन अपराधों का उत्तरदाई मानकर इसके निर्माण से ही इन अपराधों को रोकने की बात करना नौकरशाही की हवाई सोच दिखाती है। पर यह लोग इस पर सोचना भूल जाते हैं कि खुले में शौच तो पुरुष भी जाते हैं। लेकिन उस समय वहाँ हत्या और मार पिटाई जैसे अपराध क्या उनके साथ नहीं होते हैं। महिला अपराधों को रोकने की सोच से पहले इन अधिकारियों को अपराध के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है।
शौचालय निर्माण करके महिला अपराधों को नियंत्रित करने जैसे दिवास्वप्न देखने वाली नौकरशाही जिसका मात्र एक उदाहरण बहराइच की जिलाधिकारी का बयान है। जबकि ऐसे जमीन से दूर की सोच के अधिकारियों की संख्या प्रदेश में अधिक है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तैनात की गई यह नई उच्च वर्गीय नौकरशाही जमीनी स्तर पर कितनी दूर है। इसका अंदाजा सरकार को लगाना पड़ेगा अन्यथा पिछली बसपा सरकार की तरह नौकरशाही के हवा हवाई कारनामों की तरह इस सरकार को फजीहत उठानी पड़ सकती है।

Saturday, June 23, 2012

बधाई दें या मातम करें इन नए नौकर “शाहों” की कुर्बानियों का.


हर वर्ष की तरह इस बार भी जब संघ लोक सेवा आयोग की नौकरियों यानी सिविल सेवा में चयनित हुए लोगों की सूची निकली तो प्रतिभागियों में तो खुशी का माहौल था ही, मीडिया भी काफी दिनों तक इन चयनित नौकरशाहों के बारे में एक से एक जानकारी सामने लाकर इन्हें आदर्श बनाया ही जाता रहा. सिविल सेवा में चुने गए इन लोगों में कोई डाक्टर थे तो कोई इंजिनियर, ऐसे लोग जिनके पास वह पढ़ाई करने का मौका था जो शायद इस देश के अधिकतर बच्चों का सपना होता है. फिर क्या कारण हो जाते हैं कि मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी उपयोगी और व्यावसायिक शिक्षा के रास्ते को छोड़कर यह लोग सरकारी नौकरियों में चले आ रहे हैं.
इस प्रश्न पर एक धड़ा बहुत खुश होता है और कहता है कि देश की सरकारी सेवा में आकर इन उच्च शिक्षित लोगों के द्वारा नए आयाम बनाए जायेंगे. सिविल सेवा पर हर्षित गान करने वाले यह लोग तमाम तरह के उद्धरणों से इन नए नौकर शाहों का अभिनन्दन राष्ट्रनायकों की तरह करने लगते हैं. परन्तु बात की जाए देश की आवश्यकता की तो देश में एक सरकारी महिला अधिकारी की अपेक्षा सबसे अधिक आवश्यकता एक डाक्टर वह भी महिला डाक्टर की है. परन्तु इस वर्ष संघ लोक सेवा आयोग की टापर जो महिला भी हैं और डाक्टर भी उन्होंने अपना पेशा नहीं चुना आखिर क्या कारण थे. इन सारे गानों धूम के बीच कुछ ऐसी ही बातें सोचने पर मजबूर कर देती है कि यह नए लोग वही होंगे जो हर वर्ष ऐसे ही हर्ष गान के बीच ही चुने जाते हैं और उसके बाद देश की सर्वोच्च नौकरशाही के पदों पर बैठने के बाद जनता के उतने ही बड़े शोषक हो जाते हैं जैसे कभी औपनिवेशिक दौर में अंग्रेज अधिकारी होते थे. अगर इन बातों पर हज़ारों उद्धरणों के बीच कुछ पर ध्यान दें तो चाहें उत्तर प्रदेश करोडो रूपये के एनआरएचएम घोटाले में पकडे गए अपने लोक सेवा बैच के टापर आईएएस प्रदीप शुक्ल हो यां छत्तीसगढ़ में एक आदिवासी महिला सोनी सोरी के साथ अमानुषिक व्यवहार करने वाले आईपीएस अंकित गर्ग हों. यह सब इन्ही संघ लोक सेवा आयोग की नौकरियों से निकले भूरे अंग्रेज हैं. तो फिर नौकरशाही में सफलता को लेकर इतना उत्साह क्यों मनाया जाए.
अगर जनता के मांस की बात करें तो इस देश में नौकरशाही के इस वर्ग में शामिल होने को लेकर बहुत अधिक उत्साह हमेशा से रहा है. भारतीयों में अंग्रेज ज़माने के अधिकारियों के प्रति काफी भय और सर्व शक्तिशाली होने की जो छवि बनी उसी के साये में भारत की स्वतंत्रता के बाद की नौकरशाही चली और चलती ही गई. मनोवैज्ञानिकों का एक सिद्धांत इस पर ठीक बैठता है कि मनुष्य जिस भी संस्था या व्यक्ति द्वारा शोषित होता है या डर महसूस करता है वह उसी संस्था या व्यक्ति के रूप को पाना चाहता है. नौकरशाही को लेकर पीढ़ियों से ऐसी ही मानसिकता विरासत में मिलती चली आ रही है. आज भी देश के हर कोने में तमाम लोग मिल जायेंगे जो आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को राजा या बादशाह की उपाधि आसानी से दे देंगे और इस दबदबे में शामिल होना चाहेंगे.
तमाम तरह की उपमाओं से दूर अगर इन अधिकारी बनने को लालायित वर्ग के बारे में ही देखा जाए तो साफ़ पता चलेगा कि किसी भी जिले में तैनात एक डाक्टर जो व्यावसायिक शिक्षा के सबसे अच्छी जरूरत को पूरा करता है जिसकी मनुष्य को सबसे अधिक जरूरत है, वह जिले के कलेक्टर के सामने हाथ बांधे खड़ा होता है. कलेक्टर सर्वोच्च हो जाता है और डाक्टर जो मानवों को जीवन देता है या दे सकता है वह उसका अधीनस्थ. यही हाल इंजीनियरिंग में दक्ष लोगों का भी है, तो ऐसे में इन सभी का झुकाव इस नौकरी के प्रति होना वैसे भी स्वाभाविक है.
इसी के साथ भारतीय समाज में परिवार का सामाजिक स्तर उठाने की ग्रंथि में भी इस सेवा का अहम योगदान हो जाता है. किसी परिवार का लड़का या लड़की अगर इन सेवाओं में चुन लिया जाता है तो उसके पास चापलूसों मुसाहिबों की भींड लग जाती है साथ ही सिफारिशी खत और रिश्तेदारों में नयी नौकरशाही का ऐसा जन्मोत्सव मनाया जाता है जैसे प्राचीन काल में किसी देश को जीतने पर मिला करता था.
ऐसे माहौल में बधाइयों के तमाम प्रवचनों के कुछ वर्ष के बाद यह अधिकारी वर्ग वैसा ही होता है जैसे इन सेवा के पूर्वज अंग्रेज रहे थे. गरीब से गरीब परिवार से आने वाला आईएएस कभी यह सवाल नहीं उठाता है कि क्यों पूरे सेवा काल में उसका एक सेवक उसके राशन कार्ड में जगह पाने का हक़दार हो जाता है, कभी कोई आईपीएस सवाल नहीं उठाता है कि उसके लिए इतने फालोवर नौकर किसलिए रखे जाते हैं. भारतीय संविधान का विधान इन नौकरशाहों के दरवाजों पर क्यों दम तोड़ देता है जहाँ इनके लिए समता का अधिकार रखने वाला दूसरा भारतीय जनता की सरकार के टैक्स के पैसे से मिलने वाली तनख्वाह को पाने के लिए इनकी गुलामी करता है. क्या इन नए अधिकारीयों को मिलने वाली सरकारी गाडियां मेमसाहबों को खरीददारी कराने और बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना बंद कर देंगी, क्या इन अधिकारीयों के दफ्तरों में यह कुर्सी पर और जनता सामने जमीन पर फ़रियाद करती दिखना बंद कर देंगी. अगर यह सब नहीं हुआ और ना ही होगा तो फिर क्यों बधाई दें इन नए नौकरशाहों का क्यों ना मातम करें इनकी इन कुर्बानियों का.

Thursday, February 23, 2012

आखिर क्यों प्रयोग करूँ अपने मत? अगर हमारा अधिकार तो हमें ही सोचकर प्रयोग करने दीजिए?


उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान नेताओं के भाषणों और अपने अपने वादों तथा उनके समीकरणों से ज्यादा शोर अगर किसी बात का था तो वह शोर मतदान करने के लिए होने वाली जागरूकता का ही था. तमाम होर्डिंग्स, बैनर पोस्टर, टीवी चैनलों तथा जिलों-जिलों, कस्बों-कस्बों में मतदान जागरूकता रैलियां और अभियान चलाये गए. सरकारी गैर सरकारी तथा प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के हर समूहों द्वारा इस मतदान में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जा रहा था. लगातार चल रहे इन कार्यक्रमों के द्वारा ऐसा महसूस कराया जा रहा था जैसे अगर आपने मतदान नहीं किया तो कोई बहुत बड़ा पाप कर देंगे या अपना अधिकार खो देंगे. मतदान कराने के लिए इतनी सक्रियता का दिखाई देना एक तरफ तो अच्छा लगता है. परन्तु दूसरी तरफ यह बिलकुल ऐसा लगता है जैसे हम बाजार में खड़े हैं और कम्पनी अपने उत्पाद को बेचने के लिए अपनी ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रही है. आखिर क्या हो गया जो चुनाव आयोग जिसका काम निष्पक्ष चुनाव करना है वह और पक्षपात से भरी सारी पार्टियां एकदम से मतदान कराने के लिए कमर कसकर तैयार हो गईं. सारे दलों के एक साथ एक सुर से चुनाव आयोग के साथ मिलकर खड़े होने की स्थिति बिलकुल वैसे ही लगती है कि जब बाजार में ग्राहक आये ही ना और दुकाने खुली हुई हों इसीलिए उस समय संतुलन के लिए सारे व्यवसाई एक जुट होकर ग्राहक को बाजार में लाने के लिए हर सुविधा देने को तैयार हों, और ग्राहक के लिए सारी सुविधा दे रहे हों.

इन सारे अभियानों के साथ ऐसा भी नहीं है कि चुनाव आयोग ने सारी तैयारी पूरी कर रखी हो और देश के हर कोने में सबको मतदाता पहचान कार्ड मिल गए हों और सही मिल गए हों. दूसरों की बात क्या कहें अभी तक हमें खुद अपना मतदाता पहचान पत्र नहीं मिला है जबकि कई बार कोशिश कर चुका हूँ, कुछ ना कुछ गलतियाँ मिल ही जाती हैं. इसी तरह लाखो लोग ऐसे हैं जो या वोटर लिस्ट में मरे दर्शाये गए हैं जबकि उनकी आत्मा सदेह पोलिंग बूथ पर टहलती मिली, इसी प्रकार का एक उदाहरण चर्चित हुआ जब वाराणसी के कैंट विधानसभा के प्रत्याशी अफलातून के प्रस्तावक जब वोट डालने गए तो वह ही वोटर लिस्ट में मृत मिले जबकि वह सदेह पोलिंग एजेंट थे. ऐसी तमाम गडबडियों को किनारे करते हुए बस हर तरफ बस एक ही शोर कि आपने मतदान किया आपने वोट दिया. इस तरह की जल्दबाजी यह सोचने पर मजबूर करती है ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों इतना प्रचार किया जा रहा है?

चुनावों में जो भी दल मैदान में उतरे हैं उनमे चाहें सपा हो बसपा हो भाजपा या कांग्रेस हो हर दल ने कभी ना कभी सरकार बनाई है या सरकार में शामिल रहा है, और साथ ही हमेशा से कई चुनाव क्षेत्रों से उनके लोग सांसद या विधायक रहे हैं. इसी के साथ राजनीति के जड़ में घुस चुका भ्रष्टाचार, गुंडई, काला धन जैसे मुद्दों का कीड़ा सबमे वही छेद छोटे या बड़े आकार में कर चुका है. यहाँ आकार से मतलब उनकी संख्या के अनुसार आकार से है. अब जब राजनीति के परिदृश्य में यही कलाकार हैं जो सब के सब अंदर से खोखले है और मजे की बात यह है की जनता में चुनाव लड़ने सम्बन्धी कोई जागरूकता नहीं है. यानी किसी भी ऐसे प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता है जिसको ईमानदार या शरीफ कहा जाए. ऐसे में केवल मतदाता को जागरूक करने से क्या हो जायेगा? जागरूकता के नारे में साफ़ कहा जाता है कि आप अपने मत का प्रयोग कीजिये नहीं तो गलत आदमी चुन लिया जाएगा. अब इस सारे कार्यक्रमों में यह नहीं बताया जाता है कि जब सब गलत है तो फिर वोट करने का क्या मकसद रह जाएगा और क्यों मजबूरी है कि गलत लोगों में से कम गलत को चुना जाए. वोटर जागरूकता अभियान से कभी कभी मन में यह ख्याल आता है कि अगर कभी चुनना पड़े तो भांग, धतूरे, सिगरेट, तम्बाकू, शराब, ड्रग्स में से कौन सा नशा अच्छा नशा है इसका चुनाव कैसे करूँगा.

खैर हम तो मानते हैं कि यह सब जागरूकता अभियान क्यों हुए इसके कारण तलाशने के लिए ज्यादा परेशान होने कि जरूरत नहीं है, क्योंकि कारण आसानी के साथ ही दिख जाता है. देखा जाए तो इस बार के चुनावों में कांग्रेस मजबूत होकर अपने लिए मतदाता तलाश रही तो सपा कांग्रेस के बढ़ने से बने कारण से अपने परम्परागत वोट बैंक घटने पर परेशान है. वहीँ बीजेपी के मुख्य वोट बैंक माने जाने वाले सवर्ण मतदाता का बहुत कम संख्या में घर से निकलना और खास तौर पर सवर्ण महिला मतदाताओं को घर से न निकलना बड़ी चिंता का विषय है, जबकि सवर्ण मतदाता के पास कांग्रेस का विकल्प हो. मायावती जो सबसे सुरक्षित होकर अपने कैडर के वोट बैंक के सहारे हमेशा आगे बढती है उन्हें भी अन्य जातियों का सहयोग तो चाहिए ही होगा. अब अगर ऐसी ही परिस्थितियाँ सामने हो तो उस समय सारे दल जो राजनीति के दलदल में सरकार का पुल बनाकर उस पार जाना चाहते हैं उन्हें दलदल भरने के लिए वोट चाहिए और चूँकि सबके दलदल का आकार एक ही बराबर हैं तो जाहिर सी बात है की मतदाताओं या गड्ढे में गिरने वालों की संख्या तो चाहिए ही होगी. अब इसी संख्या की तलाश में हर पार्टी नए मतदाताओं को बढ़ाना चाह रही तो इसी अंदरखाने में मची राजनैतिक एकजुटता के लिए ही तमाम मतदाता जागरूकता अभियान चल रहे हैं और लोगों को वोट डालने के बारे में बताया जा रहा है. जैसा की प्रचलित में इन अभियानों में वोट ना डालने को बड़े गुनाह के रूप में दर्शाने की छुपी कोशिश हो रही है.

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परन्तु विचारों के अनुसार ही माने तो अगर कोई भी व्यक्ति वोट नहीं डालता है तो यह लोकतंत्र के प्रति कैसे गलत हो जाएगा. जिस राजनैतिक व्यस्वथा सोच की जगह सत्ता हावी है. ऐसी व्यवस्था जहाँ प्रत्याशी घोषित करने से पहले कोई भी पार्टी जो बड़ी जनहितैषी बनती है वह कभी किसी जनता से नहीं पूछती है कि बताओ इसे तुम्हारा प्रतिनिधि बना रहे हैं, यह बनने लायक है भी या नहीं. यानी कोई प्रत्याशी तय करने का तरीका नहीं है. बस चार लोगों को थोप दिया गया और चुनने के लिए जबरदस्ती धकेला जाने लगा. तो भाई इसी पर हमारा यह सवाल है. आखिर क्यों प्रयोग करूँ अपने मत? अगर हमारा अधिकार तो हमें ही सोचकर प्रयोग करने दीजिए? सोचिये हो सकता है यही सवाल सबके मन में भी कहीं ना खिन तो उठ ही रहा होगा.

Thursday, February 16, 2012

कितना सफल हो सकता है कांग्रेस का यू.पी. में बेनी प्रसाद वर्मा पर लगा दाँव.


उत्तर प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस पार्टी के खोये वैभव को पाने के लिए कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी जबरदस्त चुनावी दौरों और एक ही दिन में कई कई जनसभाओं को संबोधित कर रहे हैं इसी के साथ ही वह अपने मंच पर तमाम नेताओं को लेकर दिखते हैं जिनके द्वारा चुनावों के समीकरण साधे जा सकते हैं. इन्ही दिखने वाले चेहरों में सबसे प्रमुख रूप से जिस नेता का नाम सामने आता है वह केंद्रीय इस्पात मंत्री और कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य बेनी प्रसाद वर्मा का नाम है. बेनी प्रसाद वर्मा पर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने इस 2012 के विधानसभा चुनावों में काफी ज्यादा विश्वास दिखा रहे हैं. राहुल गांधी की चुनाव यात्राओं के दौरान विशेष रूप से पूर्वांचल और अवध तथा बुंदेलखंड के इलाकों में बेनी प्रसाद वर्मा की मौजूदी आवश्यक रूप से बनी रहती है, साथ ही मंच से बेनी प्रसाद वर्मा के भाषणों और उनके सञ्चालन के तरीकों पर भी काफी छूट रहती है. कांग्रेस पार्टी के पूर्वांचल और अवध के इलाकों में चुनावों में उम्मीदवारों की घोषणा में बेनी प्रसाद वर्मा का पूरी तरह से प्रभाव बना रहा जिससे उनके मनपसंद लोगो को ही कांग्रेस का चुनावों में प्रत्याशी बनाया गया. टिकट बंटवारे में बेनी प्रसाद वर्मा के वर्चस्व के चलते पार्टी कार्यकर्ताओं का गुस्सा सडको और यहाँ तक की राहुल गांधी की सभाओं में भी खुलेआम हो चुका है.

समाजवादी पार्टी से बगावत करके और अपने स्वयं की पार्टी बनाकर 2007 के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह पराजित हो चूके बेनी प्रसाद वर्मा जो अपने समर्थकों में बेनी बाबू के नाम से प्रसिद्ध हैं, उन पर अब कांग्रेस को इस विधानसभा चुनाव में विजयश्री दिलाने और खास तौर पर राहुल गांधी के विश्वास की जबरदस्त जिम्मेदारी दिखाई पड़ रही है. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले बेनी प्रसाद वर्मा कांग्रेस ने अपनी राजनीति की शुरुआत ही कांग्रेस के एकछत्र राज्य के विरोध से जन्मी जयप्रकाश नारायण की राजनैतिक विचारधारा से की थी. कांग्रेस विरोध की इस विचारधारा को काफी समय तक संभाले रहने वाले बेनी बाबू ने 1974 से लेकर 1992 तक भारतीय क्रांति पार्टी, जनता पार्टी, भारतीय लोक दल, लोकदल और जनता दल तक सोशलिस्ट आंदोलनों के विभिन्न मंचों पर साथ रहे और यहीं उनकी दोस्ती पश्चिम उत्तर प्रदेश के एक और जमीन से जुड़े सोशलिस्ट नेता मुलायम सिंह यादव से हुई. जहाँ इन दोनों दोस्तों ने जनता दल और अन्य सोशलिस्ट दलों के लोगो के साथ मिलकर 1992 में समाजवादी पार्टी की नींव रखी और साथ इस नई पार्टी को सजाया और उत्तर प्रदेश की राजनीति में गर्म धर्म की राजनीति को अपने अनुकूल किया. 1974 से 1992 तक बेनी प्रसाद वर्मा उत्तर प्रदेश की विधानसभाओं के सदस्य रहे और इस बीच दो बार सोशलिस्ट सरकारों में मंत्री भी रहे. 1992 में मुलायम सिंह यादव के साथ अब्ने नए दल समाजवादी पार्टी के साथ बेनी बाबू ने मुलायम सिंह यादव के मुस्लिम यादव समीकरण को विस्तृत करते हुए पिछडों की अन्य जाति कुर्मी को भी इसमें जोड़ा.

बेनी प्रसाद वर्मा और मुलायम सिंह यादव की इस जोड़ी ने 1993-94 दलित वर्ग के दल के रूप में उभरी बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर प्रदेश में गैर बीजेपी की सरकार बनाई और हिन्दुत्ववादी राजनीती के दुसरे विकल्प बने. इस सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे बेनी प्रसाद वर्मा पर तब तक क्षेत्रवाद के आरोप लगने लगे और लोक निर्माण मंत्री रहते हुए प्रदेश के सड़कों के अधिकतर पैसे को अपने गृह जनपद और चुनाव क्षेत्र बाराबंकी में सडको के जाल बिछाने के लिए लगाने का आरोप लगा और अपने क्षेत्र को प्रदेश से ऊपर मानने के आरोप में वह घिर गये. इसके बाद तो प्रदेश की राजनीति से ऊपर देश की राजनीति की ओर बढ़ रही समाजवादी पार्टी के केन्द्रीय चेहरे के रूप में बेनी प्रसाद वर्मा ने 1996 में बहराइच जनपद की कैसरगंज लोकसभा से चुनाव जीतकर 11 वी लोकसभा में पहुँच गये. जहाँ कांग्रेस की खराब हालत ने गठबंधन और कई छोटे बड़े दलों के साथ मिलकर सरकार बनी जिसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था. यह वह दौर था जब 1991 से गाँधी परिवार कांग्रेस से दूर हो गया था. इस बीच दो बार प्रधानमंत्री बदले जाने और कुल दो साल चली इस लोकसभा में बेनी प्रसाद वर्मा ने कई मंत्रालयों के साथ ही केन्द्रीय कैबिनेट संचार मंत्री का भी पद संभाला. जिसके बाद उन्होंने अपने क्षेत्र कैसरगंज और बाराबनी कन्पद में संचार सुविधाओं का जल बिछा दिया. 1998 में सरकार गिरने और मध्यावधि चुनाव के बाद भले ही बेनी प्रसाद वर्मा दुबारा मंत्री नहीं बन पाए, लेकिन वह लगातार 1998 से 2004 तक 12 वीं, 13 वीं और 14 वीं लोकसभा में समाजवादी पार्टी से कैसरगंज लोकसभा से चुने जाते रहे. इस दौर में बेनी प्रसाद वर्मा की भूमिका बहुत हद सीमित हो चुकी थी या यूँ कहें की उन्होंने स्वयं को बाराबंकी और बहराइच के बीच ही सीमित कर लिया था.

बेनी बाबू की राजनीती में सबसे बड़ा बदलाव 1993-94 के बाद 2004 में दुबारा मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव और दूसरी बार प्रदेश की सत्ता में आई समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान आया. इसी सरकार के दौरान पुराने दोस्तों मुलायम और बेनी के रिश्ते में खटास आने लगी और मुखर राजनीति से दूर हो चुके बेनी प्रसाद वर्मा को समाजवादी पार्टी में उनसे काफी बाद में प्रवेश पाए लोगों के बड़े नेताओं के बढते कद और अपने को पीछे छूटने के फर्क ने बेनी बाबू और समाजवादी पार्टी में दरार को बढाने में भूमिका निभाई. अमर सिंह, आज़म खान, और स्वयं मुलायम सिंह यादव के परिवार के लोगों में उनके भाइयों रामगोपाल यादव और शिवपाल यादव फिर उसके बाद उनके पुत्र अखिलेश यादव के बढ़ रहे रुतबे ने समाजवादी पार्टी संस्थापकों में रहे बेनी बाबू को कहीं पीछे छूट जाने का दर्द दे दिया. हालाँकि मुलायम सरकार में बेनी वर्मा के बेटे और पहली बार विधायक बने राकेश वर्मा को कैबिनेट मंत्री का पद मिल गया, परन्तु यह सबकाफी कुछ वैसा नहीं रहा जैसा हो सकता था.

इस खटास के बीच ही बेनी वर्मा के राजनैतिक क्षेत्र बहराइच में 2005 एक क्षेत्रीय समाजवादी नेता की हत्या ने बेनी बाबू को राजनैतिक चुनौती दे दी. इस हत्याकांड हो अपनी प्रतिष्ठा से जोडते हुए बेनी प्रसाद वर्मा ने समाजवादी पार्टी से बहराइच सदर विधानसभा से विधायक और तत्कालीन मुलायम सरकार के काबिना श्रम मंत्री डॉ० वकार अहमद शाह पर इस हत्या में शामिल लोगो को बचाने के आरोप लगते हुए उन पर परोक्ष रूप से इसमें शामिल होने तक के आरोप लगाये. इस पहले आरोप के बाद शुरू हुए आरोपों और प्रत्यारोपों के सिलसिले ने एक लंबा समय लिया. इसी बीच राजनीति में अपने से काफी जूनियर श्रम मंत्री वक़ार अहमद शाह को उनके लगातार विरोध के बाद भी पार्टी से ना निकाले जाने और अन्य कई मुद्दों पर बढ़ रहे अपमान को महसूस करते हुए बेनी प्रसाद वर्मा ने बागी तेवर अपना लिए और अपने लिए नए ठिकाने और पानी ताकत को दिखाने के लिए समाजवादी क्रांति दल के नाम से एक नए राजनैतिक पार्टी का गठन किया.

उत्तर प्रदेश में पिछडों की राजनीति में यादव बिरादरी के 13% मतों के बाद 12% मत के साथ कुर्मी बिरादरी ही दूसरी सबसे बड़ी बिरादरी और राजनैतिक ताकत है. परन्तु जहाँ एक ओर यादवों के नेता के रूप में मुलायम सिंह यादव जाने जाते हैं वहीँ दूसरी ओर अभी तक कोई भी ऐसा बड़ा सर्वमान्य नाम सामने नहीं आ सका है जिसे कुर्मी बिरादरी का नेता माना जा सके. अपनी इसी कुर्मी बिरादरी की राजनैतिक शक्ति को साथ लेकर 2007 के विधानसभा चुनावों में बेनी प्रसाद वर्मा ने समाजवादी पार्टी के अपने करीबियों को तोड़कर बनाये गये समाजवादी क्रांति दल के साथ उतर गये. बेनी बाबू ने डॉ० वकार को हराने के लिए एक और पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान जिनका बहराइच की मुस्लिम राजनीति के साथ जिले के राजनैतिक धरातल पर अच्छी पकड़ के लिए जाने जाते हैं को भी अपने साथ लिया. आरिफ मोहम्मद खान की पत्नी रेशमा आरिफ को बहराइच विधानसभा से प्रत्याशी भी बनाया गया. इसी के साथ ही बेनी ने स्वयं फैजाबाद जनपद की अयोध्या विधानसभा से अपनी नई पार्टी से चुनाव भी लड़ा. परन्तु सारे प्रयत्नो के बेकार जाते हुए बेनी प्रसाद वर्मा का समाजवादी क्रांति दल पूरी तरह से इन चुनावों में हार गया. जिसमे स्वयं बेनी प्रसाद वर्मा और उनके पुत्र राकेश वर्मा तथा बहराइच से रेशमा आरिफ सहित सारे उम्मीदवार बुरी तरह से चुनाव हार गये. इस करारी हार के बाद राजनैतिक हलकों में बेनी प्रसाद वर्मा के राजनैतिक समाप्ति की भविष्यवाणी होने लगी और बेनी भी नेपथ्य में कहीं चले गये.

राजनीति के पुराने मंझे हुए खिलाड़ी बेनी प्रसाद वर्मा ने कुछ समय अज्ञातवास में रहने के उपरान्त अचानक ही कांग्रेस पार्टी में जाने का फैसला कर लिए. जीवन भर जिस कांग्रेस की राजनीति के खिलाफ खड़े रहे बेनी बाबू के कांग्रेस में जाने को लेकर काफी चर्चा भी हुई. कांग्रेस में शांत पड़े बेनी प्रसाद वर्मा को उनके मनमाफिक चुनाव क्षेत्र कैसरगंज की जगह जब कांग्रेस ने गोंडा लोकसभा से 2009 के लोकसभा चुनावों का प्रत्याशी बनाया तो भी उनके ना जीत पाने की चर्चा फैली. लेकिन कांग्रेस सर्कार द्वारा चुनाव से पूर्व हुई किसानो की ऋण माफ़ी और मनरेगा की लहर पर सवार होकर बेनी बाबू सहित आस पास के कई क्षेत्रों में कांग्रेसियों की जीत हुई. इसी जीत के बाद बेनी प्रसाद वर्मा की राजनीति की नई पारी शुरू हुई. उत्तर प्रदेश में वापसी का सपना देख रही कांग्रेस और उससे भी बढ़कर बिहार में राहुल गांधी की असफलता के बाद उनके राजनैतिक मैनेजरों ने बेनी प्रसाद वर्मा की उत्तर प्रदेश में अनुकूलता को अपनाने का दाँव खेला. इसी के साथ ही कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने बेनी वर्मा को अपने यू.पी. मिशन 2012 में पूरी तरह अपना लिया. जिसके साथ ही उन्हें पूर्व में मिले राज्यमंत्री के पद को बढाकर कैबिनेट तक पहुँचाया गया इसी के साथ उनका प्रवेश कांग्रेस वर्किंग कमिटी में भी हुआ.

राहुल गांधी के मिशन 2012 में प्रमुख रणनीतिकार बनकर उभरे बेनी प्रसाद वर्मा विभिन्न दलों में मौजूद अपने ताकतवर नेताओं को कांग्रेस में जोड़ा और इसके साथ ही उन्हें विधानसभा में उम्मीदवारी भी प्रदान कर दी गई. इन नेताओं के जीतने के जज्बे और हौंसले के साथ इस विधानसभा में कांग्रेस को सीटों की बढोत्तरी के रूप में दिलवाने का दावा भी राहुल के सामने आया. परन्तु ऐसा नहीं है की बेनी प्रसाद वर्मा के इस कदम का हर तरफ स्वागत हुआ. कांग्रेस पार्टी में जब राहुल गांधी ने अपनी नवंबर में दुसरे चरण की यात्रा शुरू की तो बाराबंकी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर और सिद्धार्थनगर तक हर जनपद की कई विधानसभाओं में पुराने या यूँ कहें जड़ से कांग्रेसी नेताओं ने राहुल की हर सभा के रास्ते और सभा मंच पर टिकट बंटवारे के खिलाफ प्रदर्शन किये. बहराइच में तत्कालीन कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने बेनी प्रसाद वर्मा पर तमाम आरोप भी लगाये थे जिसके चलते उन्हें बाद में पार्टी से निकाल भी दिया गया. इसी प्रकार बलरामपुर की उतरौला जनसभा में कार्यकताओं ने इतना विरोध किया कि बेनी प्रसाद वर्मा को मंच से उतरना ही पड़ा, उन्हें बोलने का मौका ही नहीं मिला. कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इस प्रकार का रोष आज भी बरकरार है और कई बार कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के समुख दिख भी चूका है. बेनी प्रसाद वर्मा के पूर्वी उत्तर प्रदेश में मिले अधिक प्रभाव से कई नेता जहाँ अंदर खाने में नाराज़ हैं वहीँ यह भी चर्चा है कि कही बेनी कांग्रेस का हाल अपने पुराने दल समाजवादी क्रांति दल के जैसे ना कर दें.

बहरहाल कुछ भी हो बेनी प्रसाद वर्मा पर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी का पूरा भरोसा दिख रहा है. कांग्रेस को इन विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत का दारोमदार तो है ही इसी के साथ ही बेनी पर कांग्रेसियों को खास तौर पर निचले कार्यकर्ताओं में विश्वास बढाने की जरूरत है. अन्यथा जिस तरह से कार्यकताओं की जगह बेनी के पसंद के लोगों कों पार्टी में प्राथमिकता दी जा रही है उससे कहीं कांग्रेस का बेनी प्रसाद वर्मा पर लगा यह दाँव उल्टा ही ना पड़ जाए.