यह वह स्वर हैं जिनको बोलने की छूट हर जगह नहीं होती. यह स्वर अक्सर या तो सुने ही नहीं जाते या कोई सुनने ही नहीं देता है. हमसे यहाँ इस मेल पर संपर्क किया जा सकता है. harishankar.shahi@gmail.com
Sunday, November 6, 2011
अन्तराष्ट्रीय परिदृश्य पर राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण हो रहे नेपाल के तराई के जिलों में दूतावासों के द्वारा शुरू हो रहा है राजनैतिक खेल।
Sunday, September 4, 2011
नेपाल की सत्ता पर एक बार फिर पहुँचे पूर्व माओवादी सैन्य कमांडर।
भारत के पडोसी और सबसे करीबी मित्र देश नेपाल में रविवार 28 अगस्त को डॉ० बाबुराम भट्टराई ने प्रधान मंत्री पद की शपथ ली. डॉ० भट्टराई के प्रधान मंत्री बनने के साथ ही नेपाल के राजनैतिक इतिहास में दूसरी बार किसी माओवादी नेता की ताजपोशी हुई है। डॉ भट्टराई भारत के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रह चुके हैं. जिससे भारत-नेपाल के लगातार तल्ख हो रहे रिश्ते और इसके पीछे मौजूद चीन की साये के मद्देनजर उनका प्रधान मंत्री बनना बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. डॉ० बाबुराम भट्टराई एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए थे. जिन्हें नेपाल की अधिकतर पार्टियों और यहाँ तक मधेशी दलों का भी पूरा समर्थन मिला. उन्हें मिले समर्थन के आधार पर उन्होंने नेपाल संसद में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी नेपाली कांग्रेस के नेता रामचन्द्र पौड्याल को 105 वोटों से हरा दिया. डॉ० बाबुराम भट्टराई को 594 सदस्य वाली नेपाली संसद में 340 सांसदों का समर्थन प्राप्त हुआ.
25 अप्रैल 2005 के बाद जब माओवादियों ने नेपाल में 200 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही की समाप्ति के बाद अपने हथियार रखकर चुनाव प्रक्रिया को अपनाया था, तब से यह दूसरा मौका है जब किसी पूर्व माओवादी सैन्य कमांडर ने प्रधानमंत्री का पद प्राप्त किया है. डॉ० बाबुराम भट्टराई से पूर्व नेपाली माओवादी के सुप्रीम कमांडर पुष्प कमल दहल प्रचंड भी नेपाल के प्रधानमंत्री बन चुके हैं. प्रचंड के कार्यकाल से ही माओवादियों और नेपाल के अन्य राजनैतिक दलों में सत्ता को लेकर खींचतान जारी थी. नेपाल में राजशाही के समाप्ति होने के बाद से ही नए गणतांत्रिक संविधान और स्थायी सरकार के निर्माण को लेकर अन्तर्विरोध जारी रहे हैं. जून में हुई संविधान सभा की बैठक के बाद 3 महीने का समय निर्धारित किया गया था जिसमे सरकार की स्थापना और संविधान के पहले मसौदे को पेश करने की सहमति बनी थी. अब आम सहमति से सरकार के गठन हो जाने के कारण नेपाल की नई सरकार और प्रधानमंत्री की पहली परीक्षा अब संविधान के निर्माण को लेकर ही होगी.
नेपाल के सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस बार वहां हुए चुनावों में भारत की भूमिका बिलकुल शून्य ही रही. जिसका कारण भारत में अन्ना हजारे के अनशन को माना जा रहा है. देश में मचे हल्ले के कारण भारत का नेपाल में प्रधानमंत्री चुनाव में कोई खास ध्यान नहीं रह पाया. नेपाल में नवनियुक्त भारत के राजदूत जयंत प्रसाद प्रधानमंत्री चुनाव से मात्र 4 दिन पूर्व ही नेपाल पहुंचे थे. जिससे कारण वह कुछ खास करने में असफल रहे. नेपाल के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार भारत की और से पहली पसंद नेपाली कांग्रेस के नेता और प्रधानमंत्री पद के दावेदार रामचन्द्र पौड्याल थे. जयंत प्रसाद इस बार भारत की और से खास माने जाने वाले मधेशी दलों को भी ठीक से नियंत्रित कर पाए और मधेशी दलों ने इस बार एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) का साथ दिया जिससे डॉ० बाबुराम भट्टराई का प्रधान मंत्री बनना तय हुआ. नेपाल के चुनावों में मिली जीत के साथ ही इस माओवादी अग्रणी सरकार में मधेशी दलों को पूरा साथ लिया गया है. मधेशी लोकतांत्रिक फोरम जो तराई के मधेशी दलों का एक प्रमुख संगठन हैं. उसके नेता विजय कुमार गच्छदर को प्रधानमंत्री के साथ ही उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री की शपथ दिलाकर माओवादियों ने भारत के राजनैतिक रसूख को एक बड़ा झटका दिया है.
गौरतलब है विजय कुमार गच्छदर ने पिछली बार प्रधानमंत्री पद की दावेदारी भी पेश कर दी थी. जिसके पीछे नेपाल में यह चर्चा जोर पकड़ रही थी कि यह सब भारत के इशारे पर हुआ था. परन्तु इस बार सारी उम्मीदों को किनारे करते हुए माओवादियों से हमेशा विरोध की राजनीति करने वाले लोकतांत्रिक मधेशी फोरम के नेताओं ने इस चुनाव में एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) का साथ दिया. मधेशी दलों के इस रूख ने नेपाल में सकारात्मक इशारा किया है. मधेशी दलों के इस प्रकार साथ आने को लेकर नेपाल के धडों में यह माना जा रहा हैं कि भारत का नेपाल पर प्रभाव कम हुआ है.
नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद भी डॉ० भट्टराई अपनी गाडी स्वयं ही चलाकर ले गए जिससे नेपाल के हलकों में उनकी साम्यवादी सोच के स्पष्ट झलक मिल गई. डॉ० भट्टराई और माओवादी सुप्रीम कमांडर प्रचंड के बीच पिछले कुछ दिनों में एक शीत युद्ध जारी था. जिसका असर एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के द्वारा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार चुने जाने पर भी दिखा. परन्तु एन मौके पर पार्टी के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों ने डॉ० भट्टराई का समर्थन कर उनकी राह आसान कर दी. पार्टी के अंदरूनी हल्कों में और डॉ० भट्टराई के बीच का विवाद समर्थकों और जनता के बीच भी आ चुका है. डॉ० भट्टराई नेपाल में एक निष्पक्ष राष्ट्रवादी के तौर पर देखे जाते हैं. जिनका मुख्य ध्येय नेपाल का विकास और संरक्षण करना माना जा रहा है. नेपाल में प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी डॉ० भट्टराई के लिए आसान नहीं होगी. खास तौर पर तब जब एशिया की दो बड़ी महाशक्तियां भारत और चीन नेपाल में अपने प्रभावों के संवर्धन में लगी हैं. वहीं एशिया में अपने शक्तिसंतुलन के लिए छटपटा रहे अमेरिका का भी नेपाल में बढ़ता रुझान भी कुछ और परिस्थितियां खड़ी कर सकती है. अब नेपाल के नए भविष्य के लिए प्रतीक्षा करने होगी.
यह न्यूज़ श्री प्रभात रंजन दीन के निर्देशन में साप्ताहिक अखबार "कैनविज़ टाइम्स" में छप चुकी है.
Saturday, August 20, 2011
इस आंदोलनकारी लोकपाल में क्यों हैं कुछ खास तंत्रों को छूट?
अन्ना हजारे अपने लोकपाल को देश में उसी रूप से लागू करवाने के लिए अनशन कर रहें हैं जिस रूप या मसौदे के साथ उनके साथियों की टीम ने इसे बनाया है. इस लोकपाल बिल में जहां पटवारी से लेकर प्रधानमंत्री तक और दफ्तरों से लेकर न्यायपालिका तक सबको इस दायरे में लाने की बात कहकर इसका प्रचार किया जा रहा है. वहीं इस पर एक प्रश्न उठता है कि इन सबके बीच अन्ना के लोकपाल में एनजीओ, कारपोरेट निजी क्षेत्र और मीडिया को क्यों बाहर रखा गया है? लोकतंत्र में सबसे बड़ी अवधारणा विधाईका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की होती है. यानी जब लोकतंत्र के यह सारे तंत्र अन्ना के “जनलोकपाल” के सामने हाथ बांधे खड़े होंगे, उस समय यह तीन यानी एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया ही किस हैसियत से हाथ खोलकर अछूती रहेगी?
अन्ना हजारे के पहले अनशन के बाद जब सिविल सोसाइटी यानी जनसाधारण के प्रतिनिधि चुनने की बात आई तो अन्ना के पांच साथियों ने स्वयं को ही चुना. यानी एक तरह से लोग जबरदस्ती भारत की जनता के मनमाने प्रतिनिधि हो गए. इन लोगो ने सरकार के साथ बैठके की और लोकपाल को अंतिम रूप देने की तैयारी की खबरे आम हो गई. जब सब कुछ चल रहा था, तभी अचानक प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाये जाने के लिए सरकार और तथाकथित सिविल सोसाइटी के सदस्यों के बीच खींच तान शुरू हो गई. बहस तो न्यायपालिका के लोकपाल के दायरे में लाए जाने की बात को भी लेकर उठी थी लेकिन फिर सारा मामला प्रधानमंत्री को लोकपाल यानी टीम अन्ना वाले “जनलोकपाल” के दायरे में लाये जाने पर आकर रुक गई. टीम अन्ना के लोग इस बात पर हल्ला मचाने लगे की हम प्रधानमन्त्री को लोकपाल के दायरे में जरूर लायेंगे. वह लोग बताने लगे की अगर प्रधानमन्त्री इस दायरे में नहीं आये तो भ्रष्टाचार को नहीं रोका जा सकता. यानी सारा बवाल पूरे लोकतंत्र के हर हिस्से को लोकपाल के सामने झुकाने के मुद्दे पर फ़ैल गया.
अब सवाल यह उठता है कि जब जनतंत्र में विधाईका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी मूल व्यवस्था टीम अन्ना के लोकपाल के सामने झुक सकती है. तब इस लोकपाल के दायरे से इन तीन तत्वों एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया को दूर क्यों रखा गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि जब देश के सारे न्यूज़ चैनल इस टीम अन्ना के आंदोलन के भोंपू बनकर हर बात की कवरेज कर रहें हैं. तब उन लोगो ने इस प्रश्न को क्यों नहीं चर्चा या परिचर्चा में उठाया है. या इस बात को जानबूझ बाहर नहीं आने देने के पीछे क्या कुछ निहित स्वार्थ हो सकते हैं?
अगर अन्ना के इस अनशन को शुरू से देखा जाए तो यह पूरा आंदोलन ही अपनी-अपनी एनजीओ चलाने वाले लोगों ने प्रस्तावित किया है. साथ ही इसके जो भी मुख्य चेहरे हैं वह एनजीओ के ही कर्ता-धर्ता हैं. यानी इस सारे हल्ले के जन्म दाता. इस अनशन या आंदोलन जो भी कहा जाए उसको जितने भव्य और आधुनिक रूप से चलाया जा रहा है उसके लिए पैसे दान के रूप में विभिन्न कंपनियों के द्वारा मिल रहें हैं. जिंदल और जे.के. जैसे बड़े व्यापारिक घराने और सीआईआई तथा फिक्की जैसे बड़े व्यापारिक संगठन खुले हाथ से पैसे दान के रूप में इस पूरे कार्यक्रम को दे रहे हैं. इन पैसों से अन्ना के कार्यक्रम स्थल पर पंडाल, डीजे म्यूजिक और साथं ही अन्ना और उनके साथियों के पीने के लिए हाई क्लास ग्लूकोज और सेलाइन वाटर का इंतज़ाम हो रहा है. कारपोरेट सेक्टर जो अधिकतर स्वयं भ्रष्टाचार का पोषक है और पुराने मामलों को छोडकर केवल अभी हाल में ही हुए टू जी घोटाले को देखें तो पता चलेगा इसमें फंसने वाले अधिकतर लोग और कंपनियां कारपोरेट सेक्टर के ही थे. यानी भ्रष्ट तंत्र के लोग भ्रष्टाचार मिटाने के अभियान को चलाने के लिए पैसे दे रहे हैं, बात कुछ समझ में नहीं बैठती है कि ऐसा वह क्यों करेंगे. अब अगर मीडिया को देखा जाए तो वह भी आर्थिक भ्रष्टाचार की तरह समाचार भ्रष्टाचार से पीड़ित दिखती है. किसी भी दर्शक को अन्ना-अन्ना के जाप के अलावा मीडिया ना तो कुछ भी दिखाना चाहती है और ना ही मनवाना. मीडिया के हर रिपोर्टर और प्रस्तुतिकर्ता की कोशिश यही है की हर दर्शक के मन में केवल अन्ना भर दिया जाए. आज हर चैनल और रिपोर्टर खबर की जगह अन्ना के कार्यकर्ता बनकर प्रचार प्रसार कर रहा है. इस तरह मीडिया केवल इस टीम अन्ना के आंदोलन के प्रचार प्रसार में जी जान से जुटी है.
इस प्रकार अगर देखा जाए तो टीम अन्ना के आंदोलन को इतना बड़ा करने में एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया का ही सबसे अहम रोल है. सिविल सोसाइटी के सदस्य और अन्ना के अन्य साथी एनजीओ के कर्ता धर्ता हैं और अब कारपोरेट और मीडिया के सहारे यह लोग देश में इतने बड़े कद के हो गए हैं की यह लोग प्रधानमंत्री और देश की चुनी सरकार के साथ संसद को भी किनारा करते हुए गैर संवैधानिक तरीके अपने कानून को लादना चाहते हैं. तो ऐसे में यह सवाल उठाना आवश्यक है कि क्या अन्ना के इस लोकपाल अनशन में एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया के योगदान के मुआवजे में उन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया है?
भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में कानून बनाने की संसदीय और संवैधनिक प्रक्रिया को एक तथाकथित जन उन्माद के सामने ध्वस्त कर देना क्या उचित होगा. वह भी तब जब इन लोगो की मंशा केवल लोकतंत्र को बंधक बनाने की हो. अगर इन लोगो की मंशा साफ़ होती तो इन लोगो ने केवल अपने समर्थन के नाते एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया जैसे तत्वों को बाहर नहीं किया होता.
आज यह अनशन वाले लोग अपने को इतना बड़ा मान चुके हैं की चुनी हुई सरकारों के औचित्य पर ही प्रश्न उठा देते हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के भाषण के मंच से एक एनजीओ वाले आंदोलन के कार्यकर्ता कहते हैं “पटना के गलियों से आवाज़ आती है भैंस, बकरी चराने वाले सरकार चला रहे हैं”, और इसी तरह अन्य लोग जगह-जगह कहते हैं की यहाँ तो चुनाव पैसे से जीते जाते हैं. इस तरह के शब्द क्या लोकतंत्र के लिए घातक नहीं है? क्या आज कमजोर वर्ग के लोगों को सरकार में बैठने का हक नहीं है? क्या इनकी नज़र में हर आम भारतीय वोटर घूसखोर है?
अन्ना के इस आंदोलन में मिल रहे जनतंत्र को पंगु बनाने के समर्थन पर सिर्फ एक सवाल उठता है. जब लोकतंत्र के सारे अंग लोकपाल के सामने झुक सकते हैं, तो क्यों केवल एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया को ही इन आदोलन वालों ने दूर रखा है? क्या कुछ छुपा हुआ मुद्दा भी है क्या इसके पीछे?
अन्ना के समर्थक या अन्नाई वैचारिक आतंकवादी.
अन्ना हजारे के आंदोलन के कई समर्थक हैं. यह समर्थक अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने के साथ-साथ अन्ना के आंदोलन के सम्बन्ध में किया जा रहे किसी भी सवाल या विचारक वाद-विवाद को रोकने के लिए भी तत्पर हो गए हैं. कहीं किसी भी मंच पर अगर चाहें वह फेसबुक, ब्लॉग या किसी भी वेबसाईट जैसे वर्चुअल मंच हो या ग़ली कूचे पर अन्ना के आंदोलन के विरुद्ध कोई भी लोकतांत्रिक टिपण्णी होते ही अन्नावादियों का पूरा हुजूम व्यक्तिगत गाली गलौज पर उतर आता है. अन्ना के आंदोलन जिसके उद्देश्य क्या हैं इसी पर संशय बरकरार है. पहला सवाल ही यही उठता है कि अन्ना अपने एनजीओ वाले मित्रों के लोकपाल को असंसदीय और अलोकतान्त्रिक तरीके से देश पर थोपना चाहते हैं. क्योंकि कानून बनाने का अधिकार सिर्फ संवैधानिक व्यवस्था में संसद के पास होता है. तो यह आंदोलन देश विरोधी है या देश हित में यह एक सवाल उठता है. जब इस आंदोलन पर इतना बड़ा सवाल खड़ा है. तब कैसे कोई कह सकता है कि अन्ना का आन्दोलन लोकतान्त्रिक है.
अन्ना हजारे लोकतांत्रिक भारत देश में अनशन कर रहें हैं. इस अनशन के लिए जगह और अनुमति ना देने को लेकर सरकार पर छींटाकशी हो रही है. कोई इसे लोकतंत्र के विरोधी बता रहा है, तो कोई कुछ और कह रहा है. हर और लोकतंत्र की दुहाई अन्ना के समर्थक दे रहे हैं. लोकतंत्र का सबसे बुनियादी हक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या अपनी बात कहने का हक होता है. इसी हक के तहत आंदोलन वगैरह भी किये जाते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जरिये ही हम किसी भी ऐसे मुद्दे या आंदोलन पर भी सवाल कर सकते हैं जो जन आंदोलन की शक्ल में किया जा रहा हो. इस प्रकार के सवालों को लोकतंत्र में आवश्यक माना जाता है. परन्तु तानाशाही में इस प्रकार के प्रश्नोत्तर अवैध या अराजक होते हैं. इसी प्रकार तानाशाही अराजकता की तरह अन्नावादियों जो आतंकवादियों की तरह ही वैचारिक आतंक फैलाने में जुटे गए, अन्ना के आंदोलन पर सवाल करने वालों को यह लोग हर तरीके से समूह में डराने में जुटे हैं.
अन्ना के आंदोलन के निहितार्थ जानने की चेष्टा या कोई वैचारिक बात रखने पर सबसे पहले सवाल करने वाले को भ्रष्ट और कांग्रेस का चमचा घोषित कर दिया जाता है. कुछ लोग तो और बढ़कर कहते हैं की “जो अन्ना के साथ नहीं हैं वह भाड़ में जाएँ”. इस तरह कि स्वम्भू आताताई टिपण्णी करके यह अन्नावादी क्या साबित करना चाहते हैं कि हर कोई उनके साथ है, और जो नहीं है उसे हम कुचल देंगे. गांधी और गांधीवाद से तुलना करके खुश होने वाले अन्नाई, अपने द्वारा लोगो पर लगाये जा रहे वैचारिक प्रतिबंधो को किस श्रेणी में रखेंगे. क्या यह हिंसा नहीं है? कोई व्यक्ति आवाज़ ना उठा सके क्या यह तानाशाह प्रकार का तांडव नहीं है.
पिछले दो दिन से देश के हर न्यूज़ चैनल पर अन्ना और उनके आंदोलन को लेकर कवरेज की ऐसी होड मची है कि अब टीवी देखने का मन ही नहीं कर रहा है. न्यूज़ चैनलों के लिए क्या देश में बलात्कार बंद हो गए जिसको लेकर कुछ दिन पहले तक वह होड मचाये हुए थे.देश में किसी जगह कोई हत्या नहीं हो रही है. हर चैनल के अन्ना-अन्ना ऐसा परोस रहा है जैसे पत्रकार ना होकर अन्ना के पीआर एजेंट हो गए हैं. अगर अन्ना के द्वारा देश में अपना कानून लाये जाने पर न्यूज़ चैनल इतना सपोर्ट कर रहें हैं तो क्यों नहीं मणिपुर की इरोम शर्मीला चानू के आंदोलन को सपोर्ट करते हैं. समाचार दिखाने का दावा करने वाले चैनल अब समर्थक की भूमिका में आ चुके हैं. वह देश में अन्नाई को इतना भड़का रहें हैं कि वह लोग अपने आप को हर तंत्र और हर प्रश्न से ऊपर मानने लगे हैं. हर बात का जवाब अन्ना अन्ना करके देते हैं. सरकार को भ्रष्ट कहते हैं परन्तु जब इन चैनलों से पूछा जाए की किस आधार यह अपने स्ट्रिंगरो की नियुक्ति करते हैं. स्ट्रिंगरो को सैलरी नहीं मिलती कैमरा नहीं दिया जाता है. यह सब कुछ स्ट्रिंगर खुद इक्कट्ठा करता है और बाद में इसी के सहारे वसूली करता है और चैनल के बड़े पदों की मस्का पालिश करता है. जब चैनल खुद ही वसूली और भ्रष्टाचार को पैदा कर रहें है तो किस मुहँ से लोगो को राय दे रहे हैं कि सरकार भ्रष्ट है और अन्ना सही.
इलेक्ट्रोनिक मीडिया को अब संदेहास्पद नज़र से देखता हूँ और इस अन्नावाद के बाद तो न्यूज़ चैनल शायद ही देखने की हिम्मत हो. हाँ प्रिंट मीडिया जिसे नवदलाल पुराना माध्यम कहते हैं उसने ही पत्रकारिता की साख बरक़रार रही है. अखबार में ही दोनों पक्षों की जानकारी मिल जाती है. अखबार ही हैं जहां पत्रकार और विचारक अन्ना के पक्ष में और विपक्ष में दोनों तरफ के विचार रखते हैं. फिर यह दारोमदार पाठकों पर होता है कि वह किस ओर जाना चाहते हैं. पत्रकारिता अगर जीवित है तो प्रिंट में ही जीवित है और इस बात के लिए प्रिंट मीडिया बधाई की पात्र है.
अन्नावादियों ने इस तरह से विचारों का कर्फ्यू लगाना शुरू कर दिया है कि जैसे अब इस लोकतंत्र पर अन्ना ही हावी होने जा रहें हैं. मौलिक अधिकारों का हनन यह अन्नावादी बहुत खूब कर रहे हैं. इन अन्न्वादियों के भींड में वही तत्व नज़र आ रहें हैं जो भ्रष्टाचार का खुद ही पोषण करते हैं. जिलों में जहां कमीशन देकर ठेका लेने वाले ठेकेदार अन्ना का झंडा थामे हैं. वहीं व्यापार कर से लेकर आयकर तक की चोरी करने करने वाले बड़े सेठ और अधिकारी राजधानियों में अन्ना का झंडा उठाये हैं. अन्नावाद के इस जुलुस में समाज का वही तत्व दिख रहा है, जो राजनीति और पत्रकारिता में सिर्फ अधिकारियों पर दबाव बनाकर अपना काम कराने की जुगत में होता है. जिस तरह के अन्ना वाले तत्व है वह उसी तरह का काम भी कर रहें हैं हर विचार और हर तर्क को यह लोग अन्ना की महानता बखानते हुए रोकना चाहते हैं.
अन्नाई या वैचारिक आतंक का पर्याय बन चुके अन्नावादियों ने एक डर का माहौल पैदा कर दिया है. अन्ना के आंदोलन जिसमे संसद को धता बता हुए अपना क़ानून मनवाना मुख्य उद्देश्य है उसके प्रति किसी भी देशवासी की टिप्पणी इन्हें बर्दाश्त नहीं. अन्ना के अन्नाई देश में एक ऐसा आतंकी माहौल बनाना चाहते हैं जैसे तानाशाहों ने अपने ज़माने में किया. अन्ना का आंदोलन अगर सफल हो गया तब के दौर में अन्नाई के वैचारिक दंगों की कल्पना से ही मन काँप जाता है. अन्ना के समर्थकों आपके अन्नाई वैचारिक आतंकवाद से डर लगता है. अन्ना कृपया इन्हें समझाएं की हम भी देशवासी हैं हमें ना डराएं. समझ नहीं आता यह कौन हैं अन्ना के समर्थक या अन्नाई वैचारिक आतंकवादी.
Saturday, June 4, 2011
यह है बाबा रामदेव, योग गुरु, एक नेता या ड्रामा करने वाले नाटककार.

जनता की इसी छटपटाहट को भुनाने और जनता में चेहरा चमकाने को बाबा रामदेव निकल पड़े। उन्होंने पुरे देश में जमकर यात्राएं की इन यात्राओं के पीछे बाबा ने योग सिखाने के नाम पर एक नकाब ओढा और योग सीखकर निरोग होने आई जनता को उन्होंने अपने गुरु के रूप में दिए भाषणों में घुट्टी पिलाना शुरू कर दिया। बाबा रामदेव धीरे धीरे पुरे देश में भ्रष्टाचार के विरोध में खड़े होने वाले अकेले योद्धा के रूप में दिखने लगे थे। तभी अचानक अन्ना हजारे ने बीच में आक़र बाबा के सारे पके पकाए कार्यक्रम में सेंधमारी कर दी। अन्ना ने भ्रष्टाचार की मारी आम जनता को भ्रष्टाचार मिटाने का शिगूफा छेड दिया। जनता ने अन्ना का जाप करना शुरू कर दिया और उन्हें महान मानना शुरू कर दिया। बाबा रामदेव जो इस मुद्दे को लेकर पूरी तैयारी कर रहे थे जनता में उतरने के लिए उन्हें पीछे हटना पड़ा। अन्ना हजारे भ्रष्टाचार मिटाने के सबसे बड़े नायक बन गए, और जनता उन्हें तारणहार के रूप मानने लगी। परन्तु लोकपाल विधेयक जिसके सहारे अन्ना देश से भ्रष्टाचार मिटाना चाहते थे। वह एक दुरूह प्रक्रिया में फंसकर कहीं हल्का हो गया और जनता ने उसे भूलना भी शुरू कर दिया।
लोकपाल की देरी और जनता के द्वारा इसको भूलते जाने की बातों ने बाबा रामदेव को नया मौका दे दिया। बाबा रामदेव अपने पुराने भ्रष्टाचार मिटाओ के मुद्दे के जिन्दा होने की संभावना को लेकर दुबारा मैदान में कूद गए। अब चूँकि भ्रष्टाचार का मुद्दा अन्ना पहले ही ले उड़े तो उस मुद्दे में खुच खास ना बचा होने के कारण बाबा ने दूसरी ओर नज़र डाला। यहाँ पर उनको एक ऐसा मुद्दा दिखा जिसको लेकर पूरा देश काफ़ी समय से बातें कह रहा है। वह मुद्दा था स्विस बैंको में जमा काला धन। तो बाबा ने अब देर ना करते हुए अपने इसी मुद्दे को तूल देते हुए ४ जून के धरने का एलान कर दिया। बाबा के पीछे खड़ी उनके शिष्यों की फौज और हाल में ही अन्ना की मार झेल चुकी सरकार ने बाबा से बचने के लिए हर प्रकार का मन मनौवल करना शुरू कर दिया। परन्तु इस मुद्दे से मसीहा बनने की इच्छा रखने वाले रामदेव ४ जून को अनशन में आ जुटे। सुबह ४ बजे के योग से शुरू हुए इस अनशन में प्रतिपल बाबा का नजरिया बदलता रहा कभी सरकार के साथ तो कभी सरकार के विरोध में बाबा दिखाई दिए।
इस सारे ड्रामे के बीच असली रोमांचक क्षण तो तब आया जब केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने शाम को पत्रकारों को बाबा रामदेव की वह चिट्ठी दिखाई जिसमे सरकार द्वारा उनकी मांगे मान लेने की सूरत में यह अनशन केवल प्रतिकताम्क रूप से करने और दोपहर तक समाप्त करने का वायदा किया गया। अब रामदेव के इस चिट्ठी के जारी होते ही हडकंप मचा गया। जो न्यूज़ चैनल सुबह से उन्हें मसीहा बनाने में तूले थे वह उन्हें इस चिट्ठी के बाद झूठा कहने में उतनी ही तन्मयता से जुट गए। केंद्र सरकार के मंत्रियों के इस प्रकार के बाबा के चिट्ठी खोल देने से बाबा कैम्प में बौखलाहट मच गयी। जब हर ओर यह सवाल उठने लगे कि अगर बाबा ने पहले से ही अपने अनशन को फिक्स कर रखा था तो यह बात जनता को बाबा ने स्वयं क्यों नहीं बताई। बाबा के ऊपर इस प्रकार के बढते दबाव से बाबा रामदेव की बौखलाहट बढती गयी और बाबा ने अनशन बढाने और तरह की धमकियाँ मंच से सरकार को दें डाली। बाबा की बौखलाहट यह साफ़ बता रही है की मामला तो कुछ और ही है।
बाबा का यह सारा अनशन का ड्रामा केवल उनके महिमामंडन के लिए था काले धन के लिए कम। क्योंकि इतना तो बाबा रामदेव भी जानते हैं विदेशो से काला धन लाना इतना आसान तो नहीं है। लेकिन प्रचार के भूखे बाबा जो खुद अपने संगठन में बिकवाली और भ्रष्टाचार को रोक नयी पाए वह देश के भ्रष्टाचार को क्या रोकेंगे। यह बात समझ से परे है.
अगर भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर खूब तमाशा होता है, तो भ्रष्टाचार अच्छा है ना.

वाशिंग पाउडर के विज्ञापन ने इस समय देश के बड़े नारे को बहुत बेहतरीन आइडिया दिया है। वह नारा है "भ्रष्टाचार मिटाओ और काला धन देश में लाओ" इस नारे को लेकर कोई साबुन कंपनी तो नहीं परन्तु देश में दो तारणहार लोगो ने अपना नाम खूब फैलाया (उत्पाद के रूप में बेचा)। कुछ दिन पहले जब भारत में विश्व कप का जूनून उतरा ही था और आईपीएल का चढ़ने वाला था उसी समय टाइमिंग का ध्यान रखकर एक बुज़ुर्ग सज्जन अवतरित हुए जिन्होंने भ्रष्टाचार को धुलकर मिटाने का प्रण लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया। यह सज्जन यानी श्री अन्ना हजारे जी के अनशन को लेकर देश में जबरदस्त लहर चली। आखिर चले भी क्यों ना उस समय जनता २ जी, कामनवेल्थ गेम, आदर्श हाउसिंग जैसे तमाम घोटाले के दाग को लेकर उबल ही रही थी। तब अन्ना जी इन दागो को धोने के लिए अपने पाउडर यानी जनलोकपाल को जनता के सामने पेश किया। जनता भी उस टी०वी० वाले बच्चे की तरह पाउडर कंपनी की बातों को मानकर दाग से खेलने लगी की अब तो पाउडर है ही भ्रष्टाचार धो जाएगा। इसी तरह सरे दाग वाले बच्चे जंतर-मंतर जो उस समय बहुत बड़ा कपडे धोने का घाट बना था वहां इकठ्ठा हो गए। इसी के साथ तरह तरह के नारे देश भर में लगने लगे। अन्ना जी के पाउडर जन लोकपाल को लेकर सरकार जो तैयार बैठी उसने अन्ना जी को लोकपाल पाउडर बनाने के लिए न्योता दे दिया और अन्ना जी अपने कंपनी के कुछ चुनिन्दा डाइरेक्टरो के साथ उस पाउडर बनाने के लिए चले गए। अन्ना जी के पाउडर के बनने में काफ़ी समय लगने और केवल उनके चुनिन्दा बन्ना लोगो के उनके साथ होने से जनता धीरे धीरे भ्रष्टाचार रुपी दाग के साथ फिर से जीने की आदि होती चली गयी। साथ एक अनंत इन्तेज़ार में डूब गयी की कब अन्ना आयेंगे और लोकपाल पाउडर लायेंगे और भ्रष्टाचार मिटायेंगे।
इस भ्रष्टाचार के दाग को धोने के लिए आज यानी ४ जून से बाबा रामदेव ने नया पाउडर लाने को कहा है। साथ बाबा ने नए दाग यानी विदेशो से काला धन लाने को भी धो देने को बताया है। रामदेव के सारे कार्यक्रम या यूँ कहे भ्रष्टाचार मिटाने के उनके कारनामे का सारा विज्ञापन एक आधुनिकतम स्टूडियों में चल रहा है। जहां उन्होंने भ्रष्टाचार मिटाने के उत्पाद के साथ अपने पुराने या मदर उत्पाद योग को भी बेचना जारी रखा हैं। रादेव यह जानते हैं कि अगर वह अपने मदर उत्पाद को छोड देंगे तो जनता भी छूट जायेगी इसीलिए रामदेव अपने उस उत्पाद को हमेशा साथ लेकर ही चलते हैं। बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार मिटाने के अभियान में उन्होंने यह नहीं बताया की जो काले धन का दाग विदेश में हैं यानी दूसरे देश में हैं उसे भारत में वह कैसे मगायेंगे। उस देश पर क्या बाबा हमला करवाएंगे या कुछ और क्योंकि वहां का सारा पैसा तो वहां के बैंकिंग नियमों से बंधा है। भारत में तो उनकी कंपनी चूँकि योग के उत्पाद बेचती है और उनका पूरा बाजार कुछ ऐसे ही लोगो पर निर्भर जिन्हें अपने कपड़ो में भ्रष्टाचारी दाग लगवाना अच्छा लगता है। यानी विज्ञापन के वह बच्चे जो दाग को पसंद करते हैं पाउडर के साथ। बाबा के पुरे संगठन को हमेशा से ऐसे भ्रष्टाचार पसंद लोगो का ही समर्थन मिला है। दूसरी तरफ उनके संगठन के सारे पदाधिकारी भी सेठो के ही किनारे घूमकर अपने कपडे भी भ्रष्टाचारी दाग से गंदे करवाकर वह आनंद लेना चाहते हैं जैसा इस वाशिंग पाउडर के विज्ञापन में कंपनी बच्चे को दिलवाती है।
हमारे देश में भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर जो इस वाशिंग पाउडर की कंपनी की तर्ज़ पर आंदोलन चल रहे हैं। उससे भ्रष्टाचार कितना मिटेगा यह तो नहीं कह सकते परन्तु हाँ यह जरूर हैं दाग को अच्छा बताकर भ्रष्टाचार में लिप्त होना और बाद में पाउडर बेचकर नाम कमाना ही इस सारे काम के पीछे दीखता है। यानी जब भ्रष्टाचार के नाम पर खोब तमाशा होकर नाम बिकता ही है तो भ्रष्टाचार अच्छा है ना।
Wednesday, June 1, 2011
यह क्या नौटंकी चालू है भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर.
भारत में भ्रष्टाचार है और पूरे देश में काफ़ी गहरे तक इसकी पकड़ है। यह पकड़ यहाँ तक है की भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार बनने की राह पर है। कई उत्साही विचारकों ने तो अब भ्रष्टाचार वैधता प्रदान करने के बारे में समर्थन करने लगे हैं। ऐसे भ्रष्टाचार के दोराहे पर पहुंचे हमारे देश में आजकल भ्रष्टाचार मिटाने का वायरस काफ़ी जो पकड़ रहा है। वर्ल्ड कप क्रिकेट के बाद हमारे देश में एक बुज़ुर्ग समाजसेवी ने दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना शुरू कर दिया। और उन्होंने अन्न जल सब त्यागकर आमरण अनशन को करने का संकल्प लिय कि जब तक सरकार भ्रष्टाचार को मिटाने की सबसे बड़ी छड़ी यानी जन लोकपाल बिल नहीं बनाएगी तब तक वह अनशन नहीं तोड़ेंगे। अन्ना जी ने उस समय जन लोकपाल को लेकर इतना तांडव करवाया की आम जनता को लगने लगा बस अब लोकपाल आया नहीं की भ्रष्टाचार गायब। परन्तु आज इतने दिन बीतने के बाद भी जनलोकपाल बिल का कहीं अता पता नहीं चला सका है जिससे कुछ निराशा भी लोगो में तेज़ी से बढ़ रही थी और आम आदमी फिर से भ्रष्टाचार को अपनी नियति मानकर जीने को मजबूर था।
इसी माहौल में बाबा रामदेव ने कल ४ जून से दिल्ली में एक अनशन का एलान करके पुरे देश में शोर मचा दिया है। देश भर के न्यूज़ चैनल दिखाने में जुटे हैं कि बाबा रामदेव कितने बड़े मसीहा है। रामदेव भी गला फाडकर चिल्लाने में जुटे हैं कि कैसे वह भ्रष्टाचारी को जेल में भेजेंगे और विदेशो का काला धन वापस मंगाएंगे। बाबा के इस चिल्लाहट पर सारी मीडिया इकट्ठी हो गयी और बाबा के योग वाले कार्यक्रमों की टी०आर०पी० को देख सारे चैनल इसी को भूनाने में जुट गए हैं। हर तरफ शोर हो रहा है कि बाबा से सरकार दरी फलां मंत्री बात करने आये। बाबा का पंडाल तैयार कल से शुरू होगा आमरण अनशन यही सब चोंचलेबाजी न्यूज़ के नाम पर जारी थी।
बाबा रामदेव के अनशन को लेकर सरकार से बात चल रही है। सरकार भी बाबा के साथ उभरे जनसमर्थन को देखकर नतमस्तक है और टी०वी० पर जुटी जनता भी बाबा को ठीक उसी तरह संकटमोचक मान रही है जैसे उसने अन्ना को मान लिया था। इस सारे मुद्दे यह मुद्दे कहीं खो जाते हैं कि कैसे विदेशो में जमा काला धन जो उनके देशों के बैंकिंग सेवा नियमों से बंधे हैं भारत वापस आयेंगे। बाबा और उनके गला फाडू चिल्लाहट से तो कहीं यह लगने लगता है कि भारत स्विस देशो पर हमला करके वहां से पैसा लाएगा। जबकि ऐसी कोई बात संभव नहीं है तब इस प्रकार का ड्रामा क्यों रचा जाता है। बाबा रामदेव जब स्वयं यात्रा पर निकले थे उनके जिलों में कार्यकर्ताओं ने उनके रुकने और ठहरने की जगहों तक बोली लगाई थी जिससे पैसे कमाए गए। बाबा के आज संगठन का सारा दारोमदार उन टैक्स चोर सेठो के जिम्मे हैं जो गरीबो का हर प्रकार का शोषण करते हैं। बाबा की सारी फार्मेसी और इनके जितने भी पदाधिकारी हैं वह इन्ही सेठो के आगे पीछे घुमते हैं। जब बाबा स्वयं भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले सेठो के सहारे खड़े हैं तो वह कैसे खुद भ्रष्टाचार को मिटाने के मसीहा बनने को कह रहे हैं। देश देश चिल्लाने वाले बाबा रामदेव खुद ही देश के आम गरीब से मिलने का रास्ता नहीं निकालते हैं बल्कि खुद ही धन्ना सेठो के आस-पास खड़े रहने वाले बाबा का ड्रामा कल से कैसा रंग लाएगा यह देखने वाला है। वैसे भी मदारी के तमाशाप्रिय हमारे देश में ऐसे आंदोलन तर्क से नहीं भावना से बड़े हो जाते हैं.
Tuesday, May 31, 2011
नेपाल के संविधान सभा का कार्यकाल 3 महीने बढ़ाया गया।

नेपाल में संविधान के र्निमाण के लिए बनी संविधान सभा की समय सीमा गत 28 मई को समाप्त हो गई। संविधान सभा के कार्यकाल में संविधान का कोई मसौदा तैयार ना हो पाने की स्थिति में नेपाल के सभी दलो के सभासदों की बैठक में इस संविधान सभा का कार्यकाल 3 माह के लिए बढ़ाये जान का फ़ैसला हुआ। इस सभा की समयसीमा समाप्त हो जाने और संविधान का कोई मसौदा ना तैयार हो पाने के कारण नेपाल के राजनीतिक दलों के सामने एक प्रश्न चिन्ह लग गया था। 28 मई को नेपाल के समयनुसार सुबह 8 बजे शुरू हुई बैठक मध्य रात्रि से अधिक समय तक चलती रही। इस बैठक में ने0क0पा0 (माओवादी), ने0क0पा0 (एमाले), नेपाली कांग्रेस, मधेशी दल सहित सारी पार्टियों के सभासद उपस्थित रहे।
अंत में 29 मई की सुबह 5 बजकर 30 मिनट पर बैठक की समाप्ति के बाद प्रमुख दलो के नेताओं की ओर से हस्ताक्षर के साथ एक पांच बिंदुओं वाला समझौता पत्र जारी किया गया। इस समझौते में पहले बिंदु में नेपाल में तीन महीने में शान्ति व्यवस्था को बहाल करने के बारे में कहा गया है। दूसरे बिंदु में तीन महीने के कार्यकाल में संविधान सभा को नेपाल के बनने वाले नये संविधान का पहला मसौदा देश के सामने रखना होगा। तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण बिंदु में नेपाली सेना में समायोजन की उचित व्यवस्था के बारे में कहा गया है, जिसमें मधेशी लोगों का भी उचित प्रतिनिधित्व हों। यहां गौरतलब है कि नेपाल में पूर्व राजशाही के विद्रोही माओवादी सेना के करीब 19200 लड़ाकुओं को अब नेपाल सेना में शामिल करने को लेकर असमंजस बरकरार है। चैथे बिंदु में संविधान सभा के वर्तमान में समाप्त हो रहे कार्यकाल को तीन महीने के लिए बढ़ाने की मंजूरी दी गई है। पांचवे और अंतिम बिंदु में राष्ट्रीय सहमति से देश में सरकार का गठन और प्रधान मंत्री का र्निवाचन करने की बात कही गई है। इस समझौते पर ने0क0पा0 (माओवादी) की ओर से पुष्प कमल दहाल ‘‘प्रचण्ड़’’, नेपाली कांग्रेस की ओर गिरिजा प्रसाद कोईराला और ने0क0पा0 (एमाले) की ओर प्रधानमंत्री झलानाथ खनाल से अपने हस्ताक्षर किये हैं।
नेपाल में संवैधानिक संकट का दौर काफ़ी समय से चला आ रहा है। यहां के राजनैतिक माहौल में काफ़ी अनिश्चितता बनी हुई है। माओवादीयों के द्वारा संविधान लागू करने और शांति कायम करने में लगातार असफ़ल रहने के कारण अब आम ज़नता में उनके प्रति विश्वास काफ़ी कम हो गया है। नेपाल के सबसे बड़े दल नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) के र्शीर्ष नेताओं में ही टकराव इतना बढ़ चुका है कि अब वह खुले रूप से दिखने लगा है। नेपाल मीड़ीया की रिर्पोट के अनुसार नेपाल सेना में माओवादी लड़ाकुओं के शामिल करने को लेकर भी सेना के बड़े अधिकारियों और माओवादीयों के र्शीष नेतृत्व में भी मतभेद बना हुआ है।
Saturday, May 28, 2011
नेपाल के राजनैतिक हालात में अस्थिरता की संभावना, 28 मई के बाद शुरू होगा नेपाल की सड़को पर राजनैतिक घमासान।

भारत के सबसे करीबी और सबसे सौहार्दपूर्ण पड़ोसी देश नेपाल के अंदरूनी राजनैतिक हालात बिगड़ने की संभावना सच होने के कगार पर पहँुच चुकी है। नेपाल में माओवादीयों के लम्बे आंदोलन के बाद 200 वर्ष से ज्यादा पुरानी राज़शाही का समापन तो हो गया। परन्तु माओवादीयों के पास प्रजातंत्र के कुशल संचालन के लिए कोई ढा़ंचा ना होने से आज नेपाल में सत्ता संचालन का संकट खड़ा हो गया है। नेपाल में संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा का र्निमाण किया गया था। जिसके समय को बार-बार बढ़ाया जाता रहा था। इस संविधान सभा की अंतिम तिथि 28 मई है। परन्तु अभी तक ना तो कोई संविधान का मसौदा सामने आया है, और ना ही जल्द आने की कोई उम्मीद है। इस बार नेपाल के दलों ने इस संविधान सभा के कार्यकाल को पुनः बढ़ाये ज़ाने से स्पष्ट इंकार कर दिया है। इससे वहां के राजनैतिक माहौल में गर्मी बढने के आसार नज़र आ रहें हैं।
नेपाल की संसद में सबसे अधिक सभासद वाले दल एकीकृत नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (यू0एन0सी0पी0एन0) के नेताओं में आपस में ही काफी मतभेद बने हुए हैं। यह मतभेद अब खूनी रूप लें सकनें को तैयार हैं। नेपाल के सूत्रो से प्राप्त जानकारी के अनुसार हाल ही में एक यूएनसीपीएन कार्यकर्ता ने यह कहकर सनसनी फ़ैला दी थी कि माओवादीयों के र्शीष नेता प्रचण्ड अपनी ही पार्टी के ही वरिष्ठ नेता बाबूराम भट्टाराई को जान से मारवाना चाहतें हैं। माओवादी नेताओं के अन्दरूनी सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार अब माओवादी अन्दर ही अन्दर तीन धडो में बंट चुके हैं। जिसमें प्रचण्ड, मोहन वैद्य और बाबूराम भट्टाराई के अलग गुट आकार ले चुके हैं। प्रचण्ड़ भट्टाराई को भारत के ऐजेण्ट के रूप में देखते हैं, तो माहन वैद्य को संगठन पर कब्जा करने वाले के रूप मानते हैं।
इसी प्रकार नेपाल की सेना में कम्यूनिस्ट पार्टी की जनयुद्ध के समय बनी पीपुल्स आर्मी के समायोजन को लेकर एक नई छिड़ी हुई है। नेपाल की सेना में 19200 के करीब पीपुल्स आर्मी के लोगों के समायोजन से सेना के उच्चाधिकारी सहमत नहीं हैं। नेपाल की सेना जो राष्ट्र समर्पित सेना मानी जाती है। उस सेना में देश के अतिरिक्त पार्टी को प्राथमिकता देने वाले लोगों की भर्ती से सेना की व्यवस्था चरमराने की आशंका बलवती हो जायेगी। इसी के साथ ही नेपाल की सेना में चीन के तरफ़ झुकाव रखने वाले लोगों की बढ़त से भारत की सुरक्षा को भी पर्याप्त खतरा उत्पन्न हो सकता है। अभी हाल ही में माओवादी सरकार द्वारा बुलावे पर चीन के एक जनरल ने नेपाल का दौरा भी किया था। नेपाल की सेना के प्रति कुछ लोग यह भी आरोप लगाते रहते हैं कि नेपाल सेना के जनरल को भारत का भी मानद जनरल होता है। अतः नेपाल की सेना को भारत अपने नियंत्रण में चाहता है। साथ सेना का भी झुकाव भारत के प्रति ही अधिक माना जाता है।
नेपाल राजनैतिक और भैगोलिक रूप से दो सबसे प्रबल विरोधियों के बीच बसा हुआ एक शान्त देश है। राजनीति के हिसाब से बफ़र स्टेट का दर्ज़ा प्राप्त इस देश की स्थिति भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अतः 28 मई के बाद जब संविधान सभा की समय सीमा पूरी होगी उस समय की स्थिति काफी महत्वपूर्ण होगी।
Thursday, May 26, 2011
जाली नोटो का काला खेल है जारी.
भारत में आने वाले जाली नोटो को उनके देश में आने के रूट और स्तर के अनुसार तीन श्रेणियो में बांटा जा सकता है। प्रथम श्रेणी के नोट जिन्हे इन्ही विदेशी छापेखानो में छापा जाता है जिनमे भरतीय नोट छापे जाते है, अथवा भारतीय नोट छापने में प्रयुक्त होने वाले कागजो ओर इंक के सहारे दूसरे देशो के छापेखानो में छपते है। प्राप्त जानकारी के अनुसार पाकिस्तान के लाहौर, करांची और इस्लामाबाद तथा सिंगापुर में प्रथम श्रेणी के यह नोट छापे जाते है। इन नोटो की छपाई काफी अच्छी होती है। इनमें और असली नोटो में फर्क कर पाना काफी मुश्किल होता है। इन नोटो पर लागत भी अधिक होती है 100 रूपये के इस जाली नोट पर लागत 60 रूपये आती है। इन नोटो को मुख्यतः जम्मू कश्मीर के रास्ते भारत में आने वाले आतंकियो को दिया जाता है। जिसे यह लोग अपने झुण्ड के साथ बैग में लादकर लाखो की जाली मुद्रा देश में लाते है। यही प्रथम श्रेणी के नोट अटैचीयों के द्वारा दूतावास के कर्मचारी पाकिस्तान से बांग्लादेश और नेपाल पहँुचाते हैं। जहाँ मौजूद आई0एस0आई0 के ऐजेण्ट इन्हे 70 रूपये प्रति सौ की दर से बेचकर भारत में चलाने के लिए भेज देते है। बांगलादेश में मौजूद ऐजेण्ट इन्हे बांगला देशी घुसपैठीयो को देकर भारत भेज देते वहीं नेपाल में तराई के 22 जिलो और पश्चिम बंगाल सीमा से सटे इलाको से यह भारत लाये जाते है। नेपाल में यह नोट पाकिस्तान, मलेशिया, श्रीलंका, यू0ए0ई0 और बहरीन के रास्ते लाये जाते है। जाली नोटो के खेल के मुख्य अड्डे भारत में मालदा, सिलीगुडी, तिनसुखिया, रक्सौल, सोनौली, बढनी और रूपईडीहा तथा नेपाल में थापा, वीरगंज, विराटनगर, नेपालगंज और गुलहरिया है।
द्वितीय श्रेणी में वह जाली नोट आते है जिनकी छपाई कहीं बाहर ना होकर भारत-नेपाल और भारत-बांगलादेश के सीमावर्ती क्षेत्रो में होती है। इन दूसरी श्रेणी के नोटो छापने के लिए डाई, उच्च स्तर की इंक और कागज आई0एस0आई0 के ऐजेण्टो के द्वारा लडकियो के मार्फत छपाई के केन्द्रो पर भेजे जाते है। इस प्रकार छपे नोटो की गुणवत्ता काफी कम होती है। यह नोट 40 रूपये प्रति 100 रूपये की दर पर तैयार होते है। इन नोटो को 50 रूपये प्रति 100 रूपये की दर पर ऐजेण्ट चलाने के लिए बेचते है। यह नोट उत्तर प्रदेश, बिहार, आसाम और पश्चिम बंगाल के बांग्लादेश और नेपाल सीमा से सटे क्षेत्रो से स्थानीय लोगो और ट्रक ड्राइवरो के जरिये पूरे देश में पहुँचता है। इस प्रकार के नोटो की सर्वाधिक खपत इन राज्यो में लगने वाले जानवरो की बाजार और ग्रामीण बाजारो में होती है। अधिकतर ग्रामीण जनता इन नोटो को पहचान नही सकती है, और इसका विनिमय आसानी से हो जाता है।
तृतीय श्रेणी में वह नोट आते हैं जिनको स्थानीय स्तर पर धोखेबाज लोग कम्प्यूटर, स्कैनर और स्कैनर के सहारे बनाते है। यह ज्यादातर ठगी में प्रयुक्त होते है जिसे असली नोटो के बंडलो के बीच में लगाकर लोगो को ठगते है।
प्रथम और द्वितीय श्रेणी के जाली नोट का मुख्य मार्ग नेपाल और बांगलादेश की सीमा होती है। पाकिस्तान में छपने वाले जाली नोट नेपाल के काठमाण्डू में लगातार पकडे जाते रहे है। नेपाल टी0वी0 के मालिक और पूर्व मंत्री रहे सलीम मियां अंसारी का पुत्र युनुस अंसारी अपने ड्राइवर और एक पाकिस्तानी नागरिक के साथ 25 लाख की जाली भरतीय मुद्रा के साथ पकडा जा चुका है। इसी प्रकार नेपाल के पूर्व राजकुमार राजकुमार पारस का नाम भी जाली नोटो के मामले में सामने आ चुका है। नेपाल में डी कम्पनी के खास रहे र्मिजा दिलशाद बेग के दाहिने हाथ के रूप में विख्यात रहे नकली भारतीय नोटो के मुख्य ऐजेण्ट माजिद मनिहार और उसके बेटेे विक्क्ी ने भी पारस को इस खेल में शामिल बताया था। माजिद मनिहार का नेपाल सीमा पर जाली नोटो का अच्छा नेटवर्क था। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर के पलिया, बहराइच के मिहींपुरवा और रूपईडीहा, सिद्र्धाथनगर के बढनी गोरखपुर के सोनौली, महराजगंज के नौतनवा से लेकर बिहार के रक्सौल के भारत‘नेपाल बार्डर तक जाली नोटो का मुख्य ऐजेण्ट रहा है माजिद। माजिद के बेटे विक्की की 28 अगस्त 2009 के गिरफ्तार होने के बाद होने वाले खुलासे के डर के कारण माजिद को भी कुछ माह उपरान्त अक्टूबर 2009 में माजिद की नेपालगंज के एक होटल में गोली मारकर हत्या कर दी गई। माजिद के तार पाकिस्तान से लेकर खाडी के देशो तक फैले हुए थे और कहा जाता है कि माजिद के पास डी कम्पनी के जाली नोटो से संबंधित काफी सारे राज होने कारण ही उसकी हत्याा की गई। माजिद के बाद नेपाल में जाली नोटो के नये ऐजेण्ट की ताजपोशी को लेकर काफी सर्तकता बरती जा रही है।
जाली नोटांे का यह खेल अब केवल आई0एस0आई0 और उनके ऐजेण्टो तक ना सीमीत रहकर अब नये रूपो में आ गया है। अब आई0एस0आई0 के लोगो ने इस जाली नोटो के नेटवर्क को और सुचारू रूप से चलाने के लिए बैंको के जल्दी अमीर बनने की लालसा रखने वाले लोगो को अपने इस देश विरोधी खेल में शामिल कर लिया है। सिद्र्धाथनगर के डुमरियागंज की स्टेट बैंक की शाखा के कैशियर सुधाकर त्रिपाठी को पुलिस ने गिरफ्तार किया था तथा इस बैंक के मुख्य कोष से करीब 70 लाख रूपये की जाली मुद्रा बरामद की थी। इसी प्रकार पुलिस ने बहराइच जनपद के इलाहाबाद बैंक के महरू मुर्तिहा शाखा के प्रबंधक को भी जाली नोट के मामले में ही गिरफ्तार किया था। बहराइच के ही एक बैंक की बडनापुर ब्रांच से और नानपारा के एक ब्रांच से एस0एस0बी0 के एक जवान को जाली नोट मिलने की घटना सामने आ चुकी है।
भारत में जाली नोट के नेटवर्क से देश विरोधी ताकते देश को कमजोर करने में जुटी हुई है। इन नोटो को देश में चलाने में भारतीय लोगो की संलिप्तता भी अब बढती जा रही है। नेपाल में भारतीय मुद्रा के साथ कई बार कई व्यक्ति पकडे जा चुके हैं। सितम्बर 2009 में काठमाण्डू के त्रिभुवन हवाई अड्डे पर पाकिस्तानी नागरिक अब्दुल गफ्फार 24 लाख 3 हजार 5 सौ की जाली भारतीय मुद्रा के साथ पकडा गया। अक्टुबर 2009 में नेपाल के काभ्रे की कविता वर्मा 27 लाख 32 हजार की जाली भारतीय मुद्रा के साथ पकडी गई। दिसम्बर 2009 में नेपाल टी0वी0 के अध्यक्ष व पूर्व मंत्री सलीम मिया अंसारी का बेटा युनुस अपने ड्राईवर और एक पाकिस्तानी के साथ त्रिपुरेश्वरी होटल में जाली नोट के मामले में पकड़ा गया । जनवरी 2010 में पाकिस्तान एअरलाइन्स से काठमाण्डू आये पाकिस्तानी मोहम्मद सज्जाक और माहम्मद इकबाल 25 लाख की जाली भारतीय मुद्रा के साथ पकडे गया। मार्च 2010 में काठमाण्डू के त्रिभुवन हवाई अड्डे पर पाकिस्तानी नागरिक मरियम 30 लाख की जाली भारतीय मुद्रा के साथ पकडी गया। अप्रैल 2010 में नेपालगंज के न्यूरोड स्थित होटल क्लासिक में नेपाल पुलिस ने छापा मारकर मोहम्मद हामिद सहित 5 पाकिस्तानी और नेपाल के बारा निवासी विनोद मेहता को 9 लाख 98 हजार की जाली भारतीय मुद्रा के साथ पकडा गया। मई 2010 में काठमाण्डू के त्रिभुवन हवाई अड्डे पर पाकिस्तानी नागरिक जीमल मोहम्मद 15 लाख की जाली भारतीय मुद्रा के साथ पकडा गया। जुलाई 2010 में दुबई से 29 लाख की नकली भारतीय मुद्रा लेकर आये बांगलादेशी नागरिक मोहम्मद रफीक जाली भारतीय मुद्रा के साथ पकडा गया। अगस्त 2010 में पाकिस्तान के करांची निवासी विकलांग मोहम्मद फारूक अपने व्हील चेअर में छिपाकर 25 लाख की जाली भारतीय मुद्रा ला रहा था।
Tuesday, May 24, 2011
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का उत्तर प्रदेश में हो रहा बंटाधार, भ्रष्टाचार से पूरी योजना नष्ट होने की कगार पर।

केन्द्र सरकार द्वारा किसानो की उन्नति और कृषि के विकास के लिए चलाई जा रही ‘‘राष्ट्रीय कृषि विकास योजना’’ आज बरबाद हो चुकी है। उत्तर प्रदेश के 71 जिलो के लगभग 840 ब्लाको में इस योजना के द्वारा किसानो को उत्तम कृषि तकनीकी ज्ञान देने की व्यवस्था थी। परन्तु अगर इस योजना के बारे में जानने के लिए उत्तर प्रदेश के 71 जिलों में कोई चिन्ह नहीं मिलेगा। इस बहुउद्देशीय योजना में लगे पैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ गये हैं।
केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय उद्यानिकी के तहत अपने कार्यक्रमो को पूरा करने के लिए 11 वीं योजना में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का पदार्पण किया। इस योजना के अनुसार पूरे देश में 2500 करोड रूपये के बजट के साथ इस योजना को आरंभ किया था। इस योजना के तहत किसानो को विशिष्ट रूप से तकनीकी ज्ञान देने की कार्ययोजना बनाई गयी थी।
उत्तर प्रदेश में इस योजना के तहत चलाये जाने वाले कार्यक्रमो के लिए कृषि निदेशालय को सबसे पहले जिम्मेदारी सौंपी गई। परन्तु कृषि निदेशालय ने तकनीकी क्षमता के ना होने और तकनीक कुशल व्यक्तियों की अनुपलब्धता के कारण इस योजना को किसी अन्य को देने का निर्णय लिया। ‘‘भारतीय कृषि वित्त निगम’’ के कृषि क्षेत्र में किये जा रहे कार्यो और इसके केन्द्र सरकार की एक डीम्ड संस्था के रूप में पहचान होने के कारण राज्य सरकार ने इस योजना का सारा दायित्व इस संस्था को दे दिया। चूंकि भारतीय कृषि वित्त निगम केन्द्र सरकार की एक डीम्ड संस्था थी इसीलिए इसे राष्ट्रीय कृषि विकास योजना को उत्तर प्रदेश में लागू करने के लिए बिना किसी टेण्डर प्रक्रिया के जिम्मेदारी दी गई।
इस राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में भारतीय कृषि वित्त निगम द्वारा की जा रही घोर अनियमितता का पता उत्तर प्रदेश के कई जनपदो जैसे बहराइच, गोण्डा, बलरामपुर आदि का दौरा करने पर लगता है। यहां यह पता चलता है कि भारतीय कृषि वित्त निगम इस योजना को नही चला रहा है, बल्कि आई0टी0एस0 नामक दिल्ली की एक अपेक्षाकृत काफी छोटी फर्म इस योजना इस योजना को चला रही है। सरकार द्वारा भारतीय कृषि वित्त निगम को राष्ट्रीय कृषि विकास योजनाकी जिम्मेदारी मिलने के बाद इस संस्था को कैसे इस इतनी बडी योजना की जिम्मेदारी मिल गई। इस आई0टी0एस0 संस्था के बारे में सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार यह संस्था भारतीय कृषि वित्त निगम के बडे पदो पर बैइे लोगों की एक जेबी संस्था है। इस संस्था के द्वारा भारतीय कृषि वित्त निगम में सर्वोच्च पदो पर बैठे लोग इस योजना के तहत आने वाले रूपये से अपनी जेबे भरने में लगे है।
इस आई0टी0एस0 संस्था के कोई अधिकारी या कार्यालय उत्तर प्रदेश में नही है। साथ इस दिल्ली की संस्था को उत्तर प्रदेश के किसानो के बारे में जानकारी की भी कोई व्यवस्था नही हैं। केन्द्र सरकार द्वारा इस कृषि योजना को चलाने का उद्देश्य किसानो की बुनियादी जरूरतो को समझना था। साथ ही किसानो की स्थानीय स्तर पर समस्याओ को समझना और उन्हे विशेषज्ञो द्वारा विशेष रूप से तैयार करना भी था। जिससे किसानो की आय में वृद्धि हो तथा उनके जीवन स्तर में सुधार हो। जिसके लिए इस योजना की कार्यदायी संस्था को किसानो की उपज का उचित मूल्य दिलवाना और उनके उपज का उचित मार्केटिंग कराना भी संस्ािा की जिम्मेदारी थी। साथ ही साथ मौसम, कीटो और फसल के रोगो के संबंध में भी जानकारी दिलवाना संस्था का काम था। इस सारे कार्यो के लिए करोडो रूपये उपलब्ध कराये गये थे।
इस राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत हो रहे कार्यो के बारे में जब गांवो में जाकर पता लगाया गया तो पता चला कि ना तो आई0टी0एस0 और ना ही भारतीय कृषि वित्त निगम के अधिकारियों ने कभी क्षेत्र में जाकर कोई जानकारी ली है और ना ही कार्य किया है। इस योजना में विषय विशषज्ञो की क्षेत्रो मे कहीं नियुक्ति की ही नही गई है और यदि कहीं नियुक्ति हुई भी है तो वहां उन विशेषज्ञो को वेतन ही नही दिया गया जिससे उन लोगो ने भी अपना का म बंद कर दिया है। विषय विशेषज्ञो और किसानो को ट्रेनिंग के नाम पर आने वाले सारे पैसे को भारतीय कृषि वित्त निगम और आई0टी0एस0 के अधिकारियों ने मिल बांटकर लगातार खा रहें हैंै।
इस योजना के तहत विषय विशेषज्ञो को को गांवो का दौरा करना होता है। जिसमे वह लोग किसानो की समस्याओ को को समझने का प्रयास करते है और एक चुने हुए दिन को किसानो को बुलाकर जानकारी देना होता है। एक ब्लाक में प्रत्येक माह में कम से कम 18 ऐसे शिक्षण कार्यक्रम जो कम से कम 2 से 3 घंण्टे के होते हैं, उसे आयोजित करने की व्यवस्था इस योजना में है। इनक कार्यक्रमो में किसानो को पम्पलेट और किताबे भी बांटी जाती है। परन्तु जब इस योजना के बारे में किसानो ने बात की गई तो उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नही है। यह सारे कार्यक्रम केवल कागजो पर होते हैं जिससे सारा पैसा भारतीय कृषि वित्त निगम के उच्च पद वाले लोगो के जेब में जाता है। इस बारे में जनपद स्तरीय अधिकारियो को भी इस योजना के बारे मे कोई जानकारी नही है।
भारतीय कृषि वित्त निगम के द्वारा करोडो रूपये की इस लूट से उत्तर प्रदेश का कृषि विभाग अनजान बना हुआ है। जानकारी के अनुसार कृषि विभाग के कुछ उच्च पद वाले रिटायर लोग भारतीय कृषि वित्त निगम और आई0टी0एस के साथ जुडकर इस लूट में शामिल हैं। इस भारतीय कृषि वित्त निगम वित्त निगम ने प्रदेश में किसानो को तकनीकी ज्ञान देने के नाम पर करोडो रूपयो के फंड बिना उचित जांच के व्यापारिक संस्थाओ का दे दिये है। जिसके बारे में निगम के अधिकारियों ने चेताया भी था। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के नाम पर भारतीय कृषि वित्त निगम द्वारा की जा रही इस लूट को बंद होना चाहिए अन्यथा यह लूट लगातार चलती रहेगी।
Monday, May 23, 2011
महिला शोषण में ही जाने क्यों मिलती है वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना।

‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ संस्कृत भाषा के इस शब्द का अर्थ होता है कि इस धरा पर वास करने वाले एक ही कुटुम्ब यानि परिवार के वासी है। यह शब्द पूरे विश्व में एकीकृत भावना के लिए माना जाता हैं। परन्तु पूरे विश्व के देशो और निवासियों को शायद ही कोई ड़ोर इस शब्द से ज़ोड सकती है। बहुत सोचने के बाद एक ब़ात समझ आती है, जिससे इस विश्व की एक भावना माना जा सकता है। वह ब़ात यह है कि भले यह विश्व कई देशों, विभिन्न धर्मो, संप्रदायों, रूप-रंग में विभक्त हैं। परन्तु यह विश्व आधी आबादी मानी जाने वाली महिलाओं के शोषण और उनके प्रति अपराधों में एक समान है।
हमारे देश में महिलाओं से बलात्कार, कन्या भू्रण हत्या, यौन शोषण जैसे मामलें तो अक्सर हमारे अखबारो में भरे ही रहते हैं। साथ ही यहां के धर्म के पदो पर बैठे लोगो के बारे में सुनने में आता ही रहता है। इसके साथ ही कभी आनर किलिंग तो कभी इमराना और गुडिया जैसे मामलो से हमारे समाज में पुरूषत्व की कू्रर प्रधानता को दर्शाता है। यह हाल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में खुले रूप से है। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान से हमारे चाहें कोई विचार ना मिलते हों परन्तु महिलाओं पर अत्याचार के मामलें में समानता के साथ्-साथ बढ़त भी बनायें हैं। यहां हद्दू कानून लागू है जिसकी सबसे मशहुर शिकर मुख्तारन माई हैं। जिनेको हाल में ही पाकिस्तान के सुप्रीम र्कोट तक से न्याय ना मिल पानें का मलाल साल रहा है। हद्दू कानून के तहत सामूहिक बलात्कार का शिकार हुईं मुख्तारन माईं ने बीबीसी को दिये इंटरव्यू में पाकिस्तान में न्याय ना होन पर अफ़सोस ज़ता चुकी हैं। ऐसे ही पाकिस्तान में सेना से लेकर कस्बो में बैठने वाली जिरगा पंचायतो द्वारा हो रहे शोषण में महिलाओं को एक भेाग वस्तु से ज्यादा नही समझा जाता है। ऐसे ही हाल अरब देशेों में हैं। जहां मौलानाओं के नये-नये फ़रमान आते रहते हैं। कुछ समय पहले अरब के एक मौलाना ने फ़रमान जारी किया था कि कामक़ाज़ी महिलायें अपने पुरूष सहयोगी का अपना दूध पिलायें जिससे वह उनके बेटे जैसे हो जायें। इस तरह के ऊल-जुलूल फ़रमान यह दिखाते हैं कि महिला की स्थिति पुरूषवादी समाज़ में कैसी है। महिला शोषण के मामलें आंतरिक गृह युद्ध से जलते श्रीलंका और कम्यूनिस्ट चीन में भी कम नही हैं।
ऐसा नही है कि महिला शोषण केवल अल्प शिक्षित और विकासशील माने जाने वाले एशिया में हैं। महिला शोषण का सबसे बडा और बदनुमा दाग यानि वेश्यावृत्ति अतिशिक्षित, सभ्य और विकसित यूरोप और अमेरिका से लेकर पूरे विश्व में फैला है। फ्रांस और ज़र्मनी जैसे देश जो प्रगति का दम भरते हैं, उन्होंनें अपने यहां वेश्यावृत्ति को कानूनी ज़ामा पहना रखा है। विश्व के अधिकतर देशों में अश्लील फिल्मों का सबसे बडा कारोबार अमेरिका और रूस जैसे देशो से प्रमुखता से होता है। हर देश के विज्ञापनो में महिला का इस्तेमाल एक शो-पीस के रूप में होता है। लडकियों को कम कपडे पहनाकर फिल्मों में ग्ल्ैामर पैदा किया ज़ाता है। पूरे विश्व में किसी ना किसी रूप से महिलाओं का शोषण बदस्तूर ज़ारी है। अमेरिका जैसे देश में बलात्कार के मामलें बढ़ते जा रहें हैं। एमेनस्टी इण्टरनेशल की रिर्पोट के अनुसार महिलाओं के प्रति पूरे विश्व में हिंसा और शोषण का अनुपात कम नही हो रहा है।
म्हिलाओं के शोषण में आम आदमी से लेकर देशों के प्रमुख व्यक्ति तक शामिल हैं। अभी हाल में ही विश्व मुद्रा कोष के अध्यक्ष पद पर रहते हुए फ्रांसीसी नेता डामनिक स्ट्रास केन्ह पर वाशिंग्टन के टाइम स्कवायर होटल में एक अफ्रीकी मूल की महिला के यौन शोषण का आरोप लग चुका है। इसी प्रकार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिण्टन और व्हाइट हाउस की कर्मचारी मोनिका लेंवेंस्की का प्रकरण पूरी दुनिया जानती ही है। इसी प्रकार इटली के राष्ट्र प्रमुख बर्लुस्कोनी पर भी कई यौन शोषण के कई आरोप लग चुके हैं।
म्हिलाओं के दैहिक और मानसिक शोषण को लेकर पूरे विश्व में एकरूपता बनी हुई है। आज़ हम ज़ब कहतें हैं कि हम विकसित और समृद्ध हुए हैं। तब यह धटनायें हमें सोचने पर मज़बूर कर देती हैं। इसीलिए यह कहने के लिए मज़बूर होना पड़ता है कि पूरे विश्व में वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना र्सिफ़ महिला शोषण में ही दिखती है।
आज़ जीवित बचने का भी अफ़सोस हो रहा है, हो रहा है कयामत का इंतजार।

इंसान पूरी ज़िंदगी मरने से डरता है। परन्तु अंत में मौत से उसे मिल जाना ही होता है। लेकिन अगर इंसान या यूँ कहें की सामूहिक रूप से इंसान मौत का इंतज़ार करे तो अजीब लगेगा ही। यह अजीब किन्तु सत्य ब़ात इसी दुनिया में हो रही है, तथा रोज़ मौत का इंतजार करने वाले भी कोई अलग नही हम ही हैं। मौत का यह इंतजार हम लोग खुद से नही कर रहे हैं। अपितु कई लोगों द्वारा उतरोत्तर की जा रही मौत की भविष्यवाणियों से रोज़ मौत़ का एक नया दिन तय होता है।
21 मई को भी एक ऐसा ही दिन तय हुआ था। अमेरिका के क्रिश्चियन रेडियो ‘‘फैमिली रेड़ियो’’ के एनाउन्सर हेराल्ड कैम्पिंग ने अपने बाइबिल के अध्यन से यह घोषणा कर दी कि 21 मई को एक बडा भूकम्प आयेगा और दुनिया नष्ट हो जायेगी। कैम्पिंग ने यह घोषणा बाइबिल के अनुसार की थी। परन्तु इनकी इसी घोषणा को क्रिकश्चयन समुदायों के चर्चों ने ही पहले ही खारिज़ करते हुए रविवार 22 मई को चर्च की प्रार्थना सभाओं का हमेशा की तरह आयेाजन कर रखा था। इस सारी कवायद का अमेरिका में जो असर हुआ हो ना हुआ हो। भारत में इस सारी घोषणाओं का असर साफ़-साफ़ दिखाई पड़ा। इस असर दिखने में कहीं से भी हेराल्ड का हाथ तो नही था। परन्तु एक तरह से उनके भारतीय सहयोगी बनकर उभरा एक न्यूज़ चैनल उनकी सारी उल्टी सीधी भविष्यवााणियों को सीधे भारत की जनता को परोस रहा था।
सारे देश में इस चैनल और जाने कहां से आई फैमिली रेडियो के पोस्टरों ने सनसनी पैदा कर दी। फैमिली रेडियो के यह पोस्टर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और भारत की राजधानी दिल्ली में बहुतायत में रातो रात लग गये ।इन पोस्टरो की चर्चा से जब माहौल गर्म हुआ तब ज़ाकर स्थानीय प्रशासन जागा और यह पोस्टर हटाये गये। कुल मिलाकर इस प्रकार के डर के माहौल को खड़ा करने में सबका कमोबेश जान-बूझकर या अन्जाने में योगदान बना रहा।
यूं तो मौत का डर हर इंसान में होता है। परन्तु अगर यह मौत बिक्रि का सामान बन जाये तो क्या कहा जायेगा। भारत में ज्यादातर चैनल या तो दुनिया के अंत बताने में मशगूल हैं। या तो किसी भी ऐसे आदमी की भविष्यवाणी के प्रचार में जुटी है जो अंत की घोषणा करता है। इन चैनलो से बढ़कर दोषी हैं हम लोग जो इन चैनलो कोि देखकर चर्चा करते है और ऐसी खबरो का तिरस्कार करने के बज़ाय इनको देखकर इन खबरो की टी0आर0पी0 बढ़ाते हैं। अगर हम इन चैनलों को देखें नही या ऐसी भविष्यवाणियों को सुने ही नहीं। तो इनका वजू़द अपने आप ही समाप्त हो जायेगा। इन ड़र बेचकर नाम और पैसा कमाने वालों से हमें सावधान रहना होगा। यही एकमात्र तरीका हैं इन लोगो से बचने का।
Monday, May 16, 2011
बहुत कुछ सड़ रहा है जिलों की पत्रकारिता में, जानें क्यों अंजान है जिम्मेदार।


भ्रष्टाचार को लेकर एक बार उच्चतम न्यायालय ने एक टिप्पणी की थी जिसमें उसने कहा था कि निचले कार्यालयों में कुछ सड़ रहा है। उच्चतम न्यायलय की यह टिप्पणी जिलों में पत्रकारिता के नाम पर जो कुछ चल रहा है, उस परिपेक्ष्य में काफी खरी उतरती है। किसी भी व्यवस्था या कार्यप्रणाली में जिले को एक प्राथमिक ईकाई के रूप में माना जाता है। परन्तु जब बात लोकतंत्र के अन्दर की किसी व्यवस्था की हो तो उस उस समय जिलों का महत्व काफी बढ़ ज़ाता है। इसी लोकतंत्र के चैथे खम्भे के रूप में विख्यात पत्रकारिता के गिरते स्तर खास तौर पर जिलों में गिरते स्तर और अवांछित लोगो की बढ़त से यह खम्भा अब घुनता जा रहा है।
जिलों में आज पत्रकार के नाम पर जो लोग दिखाई पड़ते हैं। उनमें से अधिकतर को पत्रकारिता या तो अपने धंधों के ऊँच-नीच को बचाने का माध्यम होती है। या अधिकारियों के पास बैठ उठकर दलाली करने का आसान तरीका। इस प्रकार के लोगो के बीच, जो बचे-खुचे शुद्ध शाश्वत पत्रकार होते हैं उन्हे इन दलालो और सेठो के बीच अपनी पहचान के लिए एक अलग जद्दोज़हद करनी पड़ती है। पत्रकारिता के र्शीष पदो पर बैठे लोग खास तौर पर इलेक्ट्रानिक चैनलो के लोग जिलों को एक बेकार की चीज समझकर अपने पत्रकार बनाने के अधिकार ऐसे लोगो को देना पसंद करते हैं जो पत्रकारिता को छोड़कर अधिकतर चीजों में माहिर होते हैं।
पत्रकार बनने के लिए जहां चैनलो और अखबार के अधिकारियों चापलूसी को प्रमुखता दी जाती है। वहीं अखबार के लोग अखबार अपने जिलें में मंगाने के लिए ऐजेंसी लेने का दबाव डालकर पैसे लेते हैं। तो वहीं इलेक्ट्रानिक चैनल में आई0डी0 देने की सिक्यूरीटी के नाम पर पैसे लिए जाते हैं। आज की दुनिया में जब लोग अपने परिवार पर पैसे खर्च करने में नफ़ा-नुक्सान देखते हैं। तो पत्रकार बनने के लिए कोई क्यों पैसे लेने की जगह पैसे देगा। इस प्रकार के पैसे देकर पत्रकार बनने वाले लोग क्या पत्रकारिता के मापदण्डो को पूरा कर सकते हैं। एक बार एक ऐसे ही तथाकथित पत्रकार जो एक ऐसे अखबार के नाम से जुड़े हैं, जो आज मात्र विज्ञापन छापने के लिए निकलता है। उन्होनें हमें बताया कि लखनऊ चलकर अखबार लेकर आना है अगर कोई 30 हजार मांगेगा तो मैं 50 हजार देकर अखबार ले आऊँगा। यानि जितना बड़ा अखबार उतना पैसा खर्च करने को यह सज्जन तैयार थे। ऊपर से बड़ी बात यह कि इन्होने अपने जीवन में सूचना विभाग की विज्ञप्ति छोड़कर कभी कोई समाचार स्वंय नही लिखा है। पैसे की इस प्रकार बोली लगने के बाद इससे कमाई का रास्ता भी देखा जाता है।
जिलों की पत्रकारिता में अब समाचार की समझ का नितांत अभाव साफ नजर आता जा रहा है। खबर के नाम पर या तो दुर्घटना या क्राइम से संबंधित वही चीजें दिखती है या इन पत्रकारो द्वारा दिखाईं जाती है, जिनसे प्रशासन पर दबाव बन सके। पत्रकार अब खबर को र्सिफ इसलिए पकड़ते हैं कि जिलों के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के चैम्बरों में बैठने को मिले। इसमें प्रिन्ट मीडीया के कुछ लोग तो थेाड़ा ही सही कार्य करते हैं या उपर के दबाव के चलते उनको करना पड़ता है। परन्तु इलेक्ट्रानिक चैनेल के नाम पर तो अधिकतर वीडीयोग्राफी करके पैसा कमाया जाता है। जो कल तक शादी विवाह में वीडीयो कैमरे चलाकर पैसे कमाते थे आज वह पत्रकार बनकर थानेदारो से ट्रांसफर पोस्टिंग का पैसा वसूलते हैं। चैनल के पत्रकार अपना एक गठजोड़ बनाकर आलाअधिकारियों के पास बैठकर काम करवाते हैं। साथ ही अब गठजोड करके यह लोग जिलों में भूमाफियाओं को भी कहीं कहीं मात करने में जुट जाते हैं। जहां भी कहीं कीमती जमीन का मामला होता है यह लोग दबाव बनाकर कमाने की कोशिश में लग जाते हैं। ऐसा नही है यह सारे कार्यो की उपर के लोगो को खबर नही होती। एक बार ऐसे ही एक स्ट्रिंगर के बारे में हमने अपने एक परिचित उसी चैनल के बड़े प्रदेश चीफ जो निश्कलंक पत्रकारिता का दम भरते हैं उनको बताया तो कार्यवाही तो दूर उन्होंनें उससे कुछ पूछा भी नहीं।
इन सब बातो से एक चीज जो सबसे अधिक उठकर ऊपर आती है कि जिलों में पत्रकारिता का स्तर इतना गिर चुका है कि अब आम लोग इसे पत्रकारिता कम दलाली अधिक मानने लगे हैं। जिलों के यह तथाकथित पत्रकार इलेक्ट्रानिक और अखबार के माध्यम से ठेको और सरकारी कार्यों में खुले-आम हस्तक्षेप करके उसे अपने पक्ष में करते हैंे। अखबारो और चैनलो के प्रबंधको द्वारा जिले पर पत्रकारो को उचित पारिश्रमिक ना देना भी इस पेशे में दलालांे के आने को प्रोत्साहित करता है। जहां इलेक्ªानिक चैनलों के द्वारा अपने स्ट्रिंगरो को पैसा ना के बराबर दिया जाता हैं। वहीं विसुअल लेने और घटना कवर करने के नाम पैसा खर्च भी कराया जाता है। इतना खर्च के बाद भी जिलों में इलेक्ट्रानिक पत्रकारो की बाढ़ जन जागरण को नही थानो और अधिकारियों के बीच इन इलेक्ट्रानिक पत्रकारो की धमक की पहचान हैं। इलेक्ट्रानिक चैनलो के पत्रकार बनने के लिए ना तो उचित समझ चाहिए, बस 40 हजार का कैमरा और चैनल के प्रमुखो को देने के लिए पैसा चाहिए। इन तथाकथित पत्रकारो की प्रश्न पूछने की समझ को देखकर अच्छे -अच्छे लोगो इनके पत्रकार होने की समझ पर ही शंका हो जाती है।
ऐसा नही है यह हाल र्सिफ इलेक्ट्रानिक मीड़ीया का है। कमोबेश यही स्थिति प्रिन्ट पत्रकारिता में भी हाजिर हैं। यहां पत्रकारिता का मूल गुण अखबार का र्सकुलेशन और विज्ञापन होता है। इन दोनो से कोई भी अखबार अछुता नही हैं। कम र्सकुलेश वाले अखबार के पत्रकार तो मात्र विज्ञापन के कमीशन को मेहनताने के रूप में पाते हैं। साथ ही इन्हे अखबार की ऐजेंसी भी लेनी पड़ती है, जिससे अखबार जिले में आये। छोटे अखबारों के यह महान पत्रकार लेाग खबर की कटिंग से व्यवस्था के तहत होने वाली कार्यवाही से डराकर अधिकारियों से विज्ञापन और अपना फायदा वसूलते हैं। ऐसे ही एक पत्रकार बंधु के दफ्तर में लिखी जा रही खबर के वाक्यो और शब्दो में सांमजस्य ना होने पर हमने टोका तो उन्होंने जवाब दिया अरे भाई कुछ भी लिखो क्या करना है खबर पर अधिकारी कार्यवाही कर ही देते हैं। इससे ज्यादा क्या चाहिए। यह तो छोटे अखबारो की बात है परन्तु बड़े अखबार भी इनसे कम नही हैं। इसके पत्रकार अपने अखबार की पहँुच और प्रभाव के चलते कई बड़े धडो या यू कहें लेागो को प्रसिद्ध करने के नाम पर भी झोली भरते हैं। साथ ही दबाव बनाकर अपने अनेक गलत सही काम कराये जाते है। इन बडे अखबारो में भी पत्रकारो की सैलरी चर्तुथ श्रेणी कर्मचारी से भी कम होती हैं।
यह सब बातें एक चीज साफ दिखती है कि अख्बार या चैनलो के प्रमुख लोग पत्रकारिता में बढ़ रही संडाध के जिम्मेदार हैं। एक बार एक अखबार में काम मांगने गये एक पत्रकार को अखबार के एक सज्जन ने कहा जिलों में अखबार ले जाओ और लूटो-खाओ। इसी प्रकार जिले में पत्रकारो का एक सशक्त ग्रुप पूरे जिले के पुलिस महकमें को कब्जे में रखने की पत्रकारिता करता है। इस प्रकार की मानसिकता और कार्यप्रणाली क्या पत्रकारिता को लकवासग्रस्त नही करेगा। अन्त में यही कहा जा सकता है कि बहुत कुछ सड़ रहा है जिलों की पत्रकारिता में।